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Wednesday, July 24, 2013

वसुधैव कुटुम्बकम

नवम्बर २०१३ 
हमारे समाज में बहुत विषमता है, कुछ सोने के चम्मच से खाते हैं, कुछ के पास भोजन ही नहीं है. इसका एक कारण सामुदायिकता की चेतना का अभाव भी है. यह चेतना कैसे व्यापक हो इसका हल वेदांत के पास है. वेदांत के अनुसार ब्रह्म एक है, सभी के भीतर मूल संस्कार एक से हैं पर इसका भान नहीं है. जब हमें अपने भीतर आत्मा का भास होने लगता है तो दृष्टिकोण विशाल हो जाता है, जीवन शैली बदलने लगती है, व्यवहार बदलने लगता है, सारा समाज, सारा देश, सारा विश्व हमारा परिवार बनने लगता है. साधकों के लिए यह अत्यंत जरूरी है कि व्यक्तिवादी मनोवृत्ति को बढ़ावा न मिले, सभी के भीतर उसी चेतना को देखने का अभ्यास हो.