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Sunday, August 11, 2019

स्वयं का ही जो शासन माने



अपने सुख-दुःख के लिए जब हम स्वयं को जिम्मेदार समझने लगते हैं, तब अध्यात्म में प्रवेश होता है. जब तक हमारा सुख-दुःख व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति पर निर्भर है, तब तक हम संसार में रचे-बसे हैं. संसारी होने का अर्थ है पराधीन होना, अपनी ख़ुशी के लिए दूसरों की पराधीनता को स्वीकार करना ही अधार्मिकता है. 'दूसरे' में व्यक्ति, वस्तु और परिस्थति तीनों ही आ जाते हैं. तुलसीदास ने कहा है, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...इसलिए स्वतंत्र प्रकृति का व्यक्ति जगत में अपनी राह खुद बनाता है, अपने भाग्य का निर्माता स्वयं बनता है. ऐसा व्यक्ति कर्मयोगी बन सकता है, ज्ञानी बन सकता है, भक्त बन सकता है, तीनों बन सकता है. निष्काम कर्मयोग के द्वारा परमात्मा को सब प्राणियों में देखा जा सकता है, ज्ञान के द्वारा परमात्मा को स्वयं में देखा जा सकता है और भक्ति के द्वारा कण-कण में देखा जा सकता है. सत्संग के द्वारा ही हम सभी अध्यात्म में प्रवेश के अधिकारी बनते हैं.

Saturday, November 15, 2014

प्रेम गली अति सांकरी

अप्रैल २००७ 
संत कहते हैं हम लाख चाहें, शब्दों से अपनी बात समझा नहीं सकते, जो काम मौन कर देता है वह शब्द नहीं कर पाते. हम अपने व्यवहार से, भीतर छिपी करुणा से किसी हद तक अपने विरोधी को भी प्रभावित कर सकते हैं. भीतर जो प्रतीक्षा है उसी में सारा रहस्य छिपा है. आतुरता, प्यास यही साधना की पहली शर्त है. ज्ञान को जितना भी पढ़ें, सुनें, गुनें, तृप्ति नहीं मिलती. वह परमात्मा कितना ही मिल जाये ऐसा लगे कि मिल तो गया है फिर भी मिलन की आस जगी रहती है. प्रेम में संयोग और वियोग साथ-साथ चलते हैं. इसलिए भक्त कभी हँसता है कभी रोता है, वह ईश्वर को अभिन्न महसूस करता है पर तृप्त नहीं होता, फिर उसे सामने बिठाकर पूछता है, पर दो के बीच की दूरी भी उसे सहन नहीं होती. वह स्वयं मिट जाता है केवल ईश्वर ही रह जाता है. ज्ञानी भी एक है, और कर्मयोगी के लिए यह सारा जगत उसी एक का स्वरूप है. एक का अनुभव ही अध्यात्म की पराकाष्ठा है.

Wednesday, June 22, 2011

कर्म


जून २०००
 किसी कर्मयोगी ने ठीक ही कहा है, कर्म ही पूजा है. कर्म के द्वारा ही हम अपने तथा अपने आस-पास के वातावरण, परिस्थितियों तथा स्तर में सुधार ला सकते हैं. कर्मयुक्त जीवन उहापोहों से भी दूर रहता है. किन्तु कर्म सद्कर्म हो, ऐसा कर्म जो नैतिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता के दायरे के अंतर्गत ही हो, जो स्वार्थ युक्त न हो. ऐसा कर्म अपने आप ही भक्ति बन जायेगा. ईश्वर पर विश्वास किये बिना मानव का काम चल ही नहीं सकता, उसी का बनाया हुआ यह मायाजाल है, सो शेष सब कुछ, यानि फल आदि उसी पर छोड़ कर चिंतामुक्त रहने में ही भलाई है.  

Thursday, May 19, 2011

मन


                        जनवरी २०००
नाम-रूप ही जगत है और उसके भीतर जो छिपा है, वह है ब्रह्म ! उसे ढूंढने के लिये पहले मन को देखना होगा. जब मन चाह रहित होगा तभी उसका रूप स्पष्ट होगा, उस रूप का इस बाहरी नाम-रूप से कोई सम्बन्ध नहीं है.
                                                                    
इंसान के पास करने को कुछ न हो तो कैसा व्याकुल हो उठता है, अपना आप भी उसे बेमानी लगने लगता है. तभी श्रीकृष्ण भगवतगीता में कर्मयोगी बनने का उपदेश देते हैं. कर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है. प्रत्येक मनुष्य को कर्म करने का अधिकार मिलना ही चाहिए, अन्यथा उसके शरीर के साथ-साथ मन को भी जंग लग जायेगा.

मानव मन की कोई थाह नहीं, सोचने बैठो तो प्याज की परतों की तरह खुलता चला जाता है, कभी लगता है सब कुछ अपने वश में है और तभी अचानक यह अपना संतुलन खो बैठता है, डगमगाने लगता है. लेकिन विवेक की लगाम इसे गिरने से बचा भी लेती है... वास्तव में मन शक्तिशाली है और कभी विचलित भी न हो यदि भावनाएँ जो आधारहीन होती हैं उसे कमजोर न बनाएँ. मजबूती से विवेक रूपी लगाम को थामे हुए जो क्षुद्र भावनाओं के ज्वार को पार कर जाये, चाह को पनपने से पूर्व ही कुचल डाले, चाह जो बंधन में डालती है, तब वह निर्द्वन्द्व हो अपना मार्ग तलाश लेगा.