Showing posts with label स्वार्थ. Show all posts
Showing posts with label स्वार्थ. Show all posts

Thursday, August 15, 2013

कर्त्तव्य निभाना है

जनवरी २००५ 
कर्म हमें बंधन में डालते हैं, पर कर्म हम करते ही क्यों हैं ? साधक तो इस बात के लिए सजग रहता है कि उसके नये कर्म न बनें, वह तो ध्यान के द्वारा पुराने कर्मों को काट रहा है. मोह, स्वार्थ, स्वभाव तथा कर्त्तव्य चार कारणों से हम कर्म करते हैं. प्रथम तीन हमें बांधते हैं, पर चौथा सहज भाव से किया गया कर्म हमें बांधता नहीं, मोह अथवा स्वार्थ में पड़कर हम अकर्म कर डालते हैं. स्वभाव वश कर्म करने से हानिकारक कर्म भी हो जाते हैं. कर्त्तव्य कर्म करने नहीं होते सहज ही होते हैं, उनका होना ही उनकी शक्ति है, जब हमें कर्त्तव्य कर्मों का ज्ञान होगा तब सप्रयत्न कुछ नहीं करना होगा, हमारा होना ही पर्याप्त होगा जैसे इस दुनिया के सभी कार्य सहज रूप से अपने आप ही हो रहे हैं.


Thursday, July 25, 2013

भीतर जाकर ही वह मिलता

पदार्थ से अपदार्थ की ओर तथा पर से परम की ओर हमें जाना है . परम ही ब्रह्म है, वही शिव है. सबसे बड़ी बाधा भीतर की होती है, हमारे पूर्वाग्रह, मान्यताएं, रुचियाँ तथा अपेक्षाएं, नकारात्मक भावनाएं और हमारा स्वार्थ. हम कुछ भी नहीं हैं जिस क्षण यह भाव दृढ हो जाता है, कृपा का अनुभव तत्क्षण होने लगता है. जब कुछ हैं ही नहीं तो कुछ चाहिए भी नहीं, कोई आग्रह भी नहीं. हम इस विशाल सृष्टि के नियंता का अंश हैं, बूंद सागर से अलग तो नहीं, जब हम कुछ नहीं हैं तो इसका अर्थ हुआ हम वही हैं, जब वही हैं तो सब कुछ हमारा पहले से ही है. केवल हम ही नहीं सारे प्राणियों की यही सच्चाई है, तो हममें भेद कहाँ रहा, भेद गया तो सारे द्वंद्व भी मिट गये और सारा का सारा विषाद छू मंतर हो गया. फिर एकमात्र जो शेष रहा वह वही है, अनंत सुख का स्रोत, ज्ञान का स्रोत. दृश्य से हमें द्रष्टा में लौट आना है, द्रष्टा को देखने वाले बनते ही सहजता का अनुभव होता है. हमारा जीवन जब सहज होता है सारा जगत अपना घर लगता है, सारे प्राणी अपने लगते हैं, मन तब सारे द्वन्द्वों से परे होता है. अपने भीतर जिसे जाना आ गया वह बाहर कहीं भी जा सकता है, वह निर्भय हो जाता है.


Thursday, December 20, 2012

चाह गयी चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह


ईश्वर के प्रति अनन्य विश्वास कितना सहज है एक भक्त के लिए पर कितना कठिन है एक अभक्त के लिए, जो हवा, धूप और जल की भांति सहज उपलब्ध है, जो है तो हम हैं, बल्कि वही है जो स्वयं को विभिन्न रूपों में प्रकट कर रहा है, वह लीला प्रिय है. वह स्वयं को भक्त के वश में होने देता है. सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, विशाल से भी विशाल वह अप्रमेय है. उसकी कृपा होते ही मन अपनी सीमाएं तोड़ देता है, क्षुद्र स्वार्थ की सीमाएं, परमार्थ की बात सोचने लगता है. धीरे-धीरे मन अमनी भाव में आ जाता है. तब कोई चाह नहीं रहती, प्रकृति भक्त के साथ हो जाती है, उसके द्वारा अर्थपूर्ण काम होने लगते हैं, भीतर की छिपी शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं. जगत के अधिपति का प्रिय पात्र बन जाने पर जगत का जोर चल भी कैसे सकता है.

Thursday, January 5, 2012

कृतज्ञता ही भक्ति है



परमात्मा हमें हर पल दे रहा है. उसके प्रति कृतज्ञता तो हमें जाहिर करनी ही चाहिए, अन्यथा हम केवल उनसे लेते ही लेते रहेंगे. उसके नाम का स्मरण और उच्चारण करने से भी यह कृतज्ञता व्यक्त हो सकती है, उस समय हम उसी के सान्निध्य में होते हैं. क्योंकि ईश्वर और उसका नाम एक ही हैं. सच्ची प्रार्थना भी वही है जिसमें यही चाह हो कि मन में निज स्वार्थ की कोई चाह न उठे. उसके प्रति प्रेम मन में बढ़ता रहे और बढ़ते-बढ़ते इतना विशाल रूप ले ले कि सभी प्राणी उसकी गिरफ्त में आ जाएँ. जब सारे प्राणियों के अंतर में वही परम पिता दिखाई देने लगें. तभी समझना चाहिए कि भक्ति का उदय हृदय में हुआ है.

Wednesday, November 16, 2011

आसक्ति


जुलाई २००२ 

हमारे दुखों का कारण है गहन आसक्ति, अन्यथा हम शाश्वत सुख के अधिकारी हैं. ईश्वर के सिवा इस जगत में कुछ भी शाश्वत नहीं है. आसक्ति मिटते ही मन विश्रांति का अनुभव करता है. जिससे सामर्थ्य की उत्पत्ति होती है, और सहज ही हम अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हो जाते हैं व उन्हें करने में सक्षम भी होते हैं. दूसरों की पीड़ा में भागी भी हो पाते हैं. अंतर में प्रेम हो तभी यह संभव हैं, अन्यथा तो दूसरों की पीड़ा हमें ऊपर से छू कर निकल जाती है. स्वयं को यदि ज्ञान में स्थिर रखना है तो उसका लक्ष्य सबके प्रति प्रेम रखना होगा, अन्यथा यहाँ भी स्वार्थ ही है. अपनी आत्मा का विकास मात्र स्वयं के लिये, अपने सुख के लिये, नहीं, अपने ‘स्व’ का विस्तार करते जाना है, सबको अपना सा देखना है, तभी मुक्ति संभव है.

Monday, July 11, 2011

भूलभुलैया


अक्टूबर २००० 
हम दुनियावी बातों में इस कदर उलझे रहते हैं कि सर उठाकर यह देखने की फुरसत भी नहीं निकाल पाते कि इस उलझाव से परे भी कोई दुनिया है. हम इस बात से बेखबर ही रहते हैं कि कहीं कोई उलझन भी है. इसी उलझाव को जिंदगी मानकर जिए चले जाते हैं. जैसे पतंगों को दीये की लौ में जल जाना ही जीवन का परम उद्देश्य लगता है वैसे ही हमें भी इन रोजमर्रा के साधारण से दिखने वाले कामो में अपनी सारी ऊर्जा, (शारीरिक, मानसिक और आत्मिक) खपाते रहते हैं. इस ऊर्जा का कोई और उपयोग भी हो सकता है हम सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं करते. ईश्वर से की गयी प्रार्थनाएं भी स्वार्थ से परिपूर्ण होती हैं, हम यही चाहते हैं कि इन झंझटों में वृद्धि हो कि हम इनमें और उलझे रहें, मदहोश रहें, ताकि बड़े प्रश्नों से बचे रहें, ऐसे प्रश्न जो मन को झकझोरते हैं, आत्मा को कटघरे में खड़ा करते हैं. हम इसी भूलभुलैया में मग्न रहना चाहते हैं.

Saturday, June 25, 2011

यज्ञ


जैसे स्वप्न में हम एक से अनेक बन जाते हैं, ऐसे ही एक मूल से सारा जगत बना है. हम जहाँ से आये हैं जब उस मूल को भूल जाते हैं, अपने को एक अलग इकाई मान बैठते हैं, इससे स्वार्थ उत्पन्न होता है. स्वार्थ ही दुःख का कारण है. जीवन को एक यज्ञ मान कर यदि हम सामूहिक चेतना का विकास करें, अपनी समृद्धि का लाभ अपने आस-पास के लोगों को भी मिले ऐसा भाव रखें. समत्वभाव से सुख-दुःख का सामना करें, तो जीवन एक उत्सव बन सकता है.

Wednesday, June 22, 2011

कर्म


जून २०००
 किसी कर्मयोगी ने ठीक ही कहा है, कर्म ही पूजा है. कर्म के द्वारा ही हम अपने तथा अपने आस-पास के वातावरण, परिस्थितियों तथा स्तर में सुधार ला सकते हैं. कर्मयुक्त जीवन उहापोहों से भी दूर रहता है. किन्तु कर्म सद्कर्म हो, ऐसा कर्म जो नैतिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता के दायरे के अंतर्गत ही हो, जो स्वार्थ युक्त न हो. ऐसा कर्म अपने आप ही भक्ति बन जायेगा. ईश्वर पर विश्वास किये बिना मानव का काम चल ही नहीं सकता, उसी का बनाया हुआ यह मायाजाल है, सो शेष सब कुछ, यानि फल आदि उसी पर छोड़ कर चिंतामुक्त रहने में ही भलाई है.