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Tuesday, September 20, 2011

माया और मायापति


कृष्ण आदि देव हैं, जगत के आधार हैं. चैतन्य के ऊपर ही जड़ टिका है. यहाँ सब कुछ प्रकृति के गुणों के अनुसार ही हो रहा है जो उनकी अध्यक्षता में काम करती है. तब इस दुनिया में भय करने का कोई कारण नहीं रह जाता. चिंता अथवा दुःख का भी कोई वाजिब कारण नहीं है. यह तो उसका ही खेल है उसकी माया है. हमें उसकी  माया से मोहित होने की क्या आवश्यकता है. वह स्वयं हमें भीतर से इस माया से मुक्त होने के लिए प्रेरित करता है. इस खेल के नियम भी तो उसके ही बनाये हुए हैं. कृष्ण को अपने जीवन का केन्द्र बना लें तो जीवन के सारे शून्यों को अर्थ मिल जाता है. परमात्मा से प्रेम करना उतना ही सहज है, जैसे पंछियों का गगन में उड़ना, बूंद का सागर में मिलना. हमें सहज होकर इस संसार में रहना है तब जीवन एक उपहार बन जाता है और मृत्यु एक वरदान.

Wednesday, June 22, 2011

कर्म


जून २०००
 किसी कर्मयोगी ने ठीक ही कहा है, कर्म ही पूजा है. कर्म के द्वारा ही हम अपने तथा अपने आस-पास के वातावरण, परिस्थितियों तथा स्तर में सुधार ला सकते हैं. कर्मयुक्त जीवन उहापोहों से भी दूर रहता है. किन्तु कर्म सद्कर्म हो, ऐसा कर्म जो नैतिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता के दायरे के अंतर्गत ही हो, जो स्वार्थ युक्त न हो. ऐसा कर्म अपने आप ही भक्ति बन जायेगा. ईश्वर पर विश्वास किये बिना मानव का काम चल ही नहीं सकता, उसी का बनाया हुआ यह मायाजाल है, सो शेष सब कुछ, यानि फल आदि उसी पर छोड़ कर चिंतामुक्त रहने में ही भलाई है.