इस जगत में जड़ पदार्थ और चेतना के पीछे कोई एक तत्त्व छुपा हुआ है, जिसने स्वयं को इन दो भागों में बाँट लिया है. जड़ पदार्थ में वह सत्ता रूप में स्थित है, मानव से इतर प्राणियों और वनस्पति में सत्ता व चेतना के रूप में और मानव में सत्ता, चेतना व आनंद के रूप में. भौतिक जगत में रहते हुए हम अनेक वस्तुओं को देखते हैं, किन्तु उनके भीतर एकत्व का अनुभव नहीं कर पाते. अध्यात्म का अर्थ है इस विभिन्नता के पीछे उस एक्य को देख लेना। उस समरसता और एकता का बीज सभी के भीतर है, किंतु केवल मानव के भीतर वह सामर्थ्य है कि उसे पहचाने और अपने अहैतुक प्रेम, आनंद और शांति के रूप में बाहर व्यक्त करे। अध्यात्म से जुड़े व्यक्ति के लिए कर्म का अर्थ केवल अपना सुख प्राप्त करना नहीं है, उसके कर्म सारे जगत के कल्याण की भावना से भरे होते हैं। उसके मन की मूल भावना स्वार्थ से ऊपर उठ जाती है। ऐसे में वह स्वयं तो अपना कल्याण करता ही है, सहज ही जगत के प्रति मैत्री भाव से भर जाता है।
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Sunday, October 23, 2022
Friday, March 1, 2019
शिव अनंत है
२ मार्च २०१९
सभी धर्म यह मानते हैं कि परमात्मा एक है. उस तक पहुंचने के
मार्ग पृथक-पृथक हो सकते हैं. इसमें भी किसी को संदेह नहीं कि परमात्मा सर्वज्ञ
है, सर्व शक्तिमान है और सब जगह है. वह प्रेम और आनंद का सागर है. मानव के भीतर
अनंत की कल्पना का बीज जिस क्षण पड़ा, परमात्मा जैसे पूर्णतया स्पष्ट हो गया. हमारे
चारों और का संसार पदार्थ और ऊर्जा से बना है, बनने और मिटने वाला है, किन्तु
विज्ञान कहता है पदार्थ को न तो बनाया जा सकता है न ही नष्ट किया जा सकता है, केवल
उसका रूप बदला जा सकता है. इसी प्रकार ऊर्जा का भी केवल रूप बदला जा सकता है, उसे
सृजित या नष्ट नहीं किया जा सकता. पदार्थ और ऊर्जा दोनों के पीछे जो एक और तत्व है,
जो दोनों का मूल है, जो कभी नहीं बदलता, वही शिव तत्व है. ऐसा कभी नहीं था कि वह नहीं
था, ऐसा कभी नहीं होगा कि वह नहीं होगा, और ऐसा नहीं है कि वह अभी नहीं है. उस एक
में टिककर ही पूर्ण विश्राम का अनुभव संतजन करते हैं.
Monday, August 6, 2018
छाया को छाया भर जानें
७ अगस्त २०१८
एक तरफ पदार्थ है और दूसरी तरफ ऊर्जा यानि चेतना, दोनों के
संयोग से एक तीसरा तत्व उत्पन्न हुआ मन, जो ऐसे ही था जैसे प्रकाश के सामने कोई
वस्तु आ जाये तो उसकी छाया बन जाती हो. छाया जो प्रकाश के अनुसार बदलती रहती है,
जो कभी होती है कभी नहीं होती, इसीलिए मन को चन्द्रमा के समान माना गया है, जो
घटता बढ़ता रहता है और कभी-कभी समाप्त ही हो जाता है. यदि चन्द्रमा पर सूर्य का
प्रकाश न पड़े और वह धरती की परिक्रमा न करे तो उसके अस्तित्त्व का सामान्य मानव को
पता भी न चले. भौतिकी नियम के अनुसार पदार्थ और ऊर्जा दोनों को न ही उत्पन्न किया
जा सकता है, न ही नष्ट किया जा सकता है. हम स्वयं को यदि शुद्ध पदार्थ मानते हैं,
यानि अपना केवल भौतिक अस्तित्त्व मानते हैं, तो भी हमारा विनाश सम्भव नहीं है,
केवल परिवर्तन होता है. पंच तत्वों से बना बच्चे का तन एक दिन वृद्ध हो जाता है और
पुनः सारे तत्व अपने-अपने स्रोत में मिल जाते हैं. यदि हम स्वयं को शुद्ध चेतना
मानते हैं तब भी हमारा विनाश सम्भव नहीं है. स्वयं को मन मानने से ही सारी उलझन का
आरम्भ होता है. पहली बात तो यह है, मन छाया मात्र है, अर्थात उसका कोई अस्तित्त्व
नहीं है, वह प्रतीत भर होता है. पदार्थ परिवर्तन शील है, उसकी छाया होने के कारण
मन भी प्रतिपल बदल रहा है, इसीलिए कोई भी अपने आप में टिका हुआ नहीं लगता, केन्द्रित
नहीं है. मन माया के पार जाकर ही कोई स्वयं में स्थित हो सकता है.
Monday, December 25, 2017
मन के हारे हार है मन के जीते जीत
२६ दिसम्बर २०१७
एक तरफ पदार्थ है और दूसरी तरफ चेतना दोनों को जोड़ता है मन. मन
कभी पदार्थ की तरह जड़ बन जाता है तो कभी चेतना से एक होकर चेतन. मन को यह सुविधा
है कि इससे नाता जोड़े या उससे. जड़ होने में श्रम नहीं लगता पर उसका खामियाजा मन को
ही भुगतना पड़ता है, वह सीमाओं में कैद हो जाता है. जड़ का ही आकार ग्रहण कर लेता
है. चेतना का कोई रूप नहीं, वह एक शक्ति है, सो चेतना के साथ जुड़ने पर मन भी अनंत
हो जाता है. सुख-दुःख के पार, तीनों गुणों के पार हुआ मन सहज ही आनंद का अनुभव करता
है. चेतना का सहज स्वभाव है शांति, प्रेम और विश्वास, ऐसे में मन भी स्वयं को
निर्मल और सरल अनुभव करता है.
Thursday, February 23, 2017
सागर में इक लहर उठी
२३ फरवरी २०१७
वैज्ञानिक कहते हैं पदार्थ कुछ और नहीं ऊर्जा का ही दूसरा रूप है, संत कहते हैं अहंकार कुछ और नहीं आत्मा ही है. हमारे चारों ओर सृष्टि का जो अति विशाल विस्तार दिखाई पड़ रहा है, यह पहले इस रूप में नहीं था और अभी भी निरंतर बदल रहा है, किन्तु जिस ऊर्जा के महासागर में यह स्थित है और जिससे बना है वह सदा से ऐसी ही है. हर व्यक्ति के भीतर जो 'मैं' की अनुभूति होती है वह भी जन्म के बाद ही समाज द्वारा दी गयी होती है, नवजात शिशु के पास कोई 'मैं' नहीं होता, केवल चेतना होती है, वह भी शुद्ध चेतना के महासागर में उठी एक लहर ही तो है. जो सदा से है और सदा रहेगी वही शुद्ध चेतना ही ईश्वर है.
Monday, September 22, 2014
पल पल रहे जागता मन जब
मार्च २००७
प्रेम का मार्ग अति कठिन है, प्रेम किसी क्रिया या पदार्थ पर
निर्भर नहीं करता. मन रूपी दर्पण पर जमी धूल सामने हो तो आत्मा रूपी प्रेम नहीं दिखता
जब क्रिया या पदार्थ के प्रति आसक्ति के प्रति सजग होकर कोई उसे त्याग देता है तो
उसमें एक नई जागृति उत्पन्न होती है और वह अपने मन पर लगी धूल साफ करने लगता है.
यह जागृति ही प्रेम को जन्म देती है. जो जागता है उसका ध्यान परमात्मा करता है, जागरण
का अर्थ है आत्मा में स्थित हो जाना और आत्मा परमात्मा का अंश है. जागना यानि
सजगता हमें पल-पल मुक्त रखती है. यही जीवन मुक्ति है. भीतर से ऐसी मुक्तता का
अनुभव करना हमें प्रेम सिखाता है. वही सहजता है, वही योगी का लक्ष्य है, ध्यानी का
और ज्ञानी का लक्ष्य है. हर जाता हुआ क्षण हमें विश्रांति का अनुभव दे और हर आता
हुआ शक्ति का तो हम कार्य करते हुए भी आनन्द का अनुभव करते हैं तथा कुछ न करते हुए
भी तृप्ति का. सजगता आती है सजग रहने से जैसे तैरना आता है तैरने से, इसमें किसी
व्यक्ति, वस्तु, क्रिया पर हमें निर्भर नहीं रहना है. सद्गुरु ने यह मार्ग दिया
है, अब चलना तो स्वयं ही होगा. यह तलवार की धार पर चलने जैसा है पर इस पर चलने का
बल परमात्मा हमें देता है, उसकी कृपा तो बरस रही है अनवरत !
Monday, September 8, 2014
भीतर एक अछूता देश
मार्च २००७
क्रिया और पदार्थ दोनों से परे है आत्मा, हम कितना भी जप, तप,
ध्यान आदि करें, सब मन व बुद्धि के स्तर तक ही रहेगा तथा पदार्थ तो वहाँ तक भी
नहीं ले जाते जहाँ से मन व बुद्धि लौट-लौट आते हैं. वह अछूता प्रदेश है. वहाँ कुछ
भी नहीं है, न कोई करने वाला न क्रिया, न दृश्य न द्रष्टा, केवल शुद्ध चेतना ही
वहाँ है. वही शुद्ध चेतना, परमात्मा या आत्मा कहलाती है. वही चेतना जब संसार की ओर
मुड़ती है तो जीवात्मा कहलाती है.
Tuesday, December 24, 2013
राम रतन धन पायो
मई २००५
सोना
तप कर ही कुंदन होता है, हम भी इस जगत में तपने आये हैं, हम सब का जीवन कुंदन सा
चमके अर्थात सब का मंगल हो यही भावना होनी चाहिए. जगत पदार्थ से बना है, हम
अपदार्थ हैं, पदार्थ की अवस्थाएं बदलती रहती हैं, पर अपदार्थ सदा एक सा रहता है,
हम वही अबदल अविकारी तत्व हैं, हमारा नाश नहीं होता हममें परिवर्तन नहीं होता, पर
हम स्वयं को मन, बुद्धि, अहंकार आदि पदार्थों के साथ एक करके देखते हैं, तपकर
उन्हें अलग करना है और स्वयं को अपने शुद्ध रूप में पहचान लेना है. ऐसा होते ही
भीतर कैसी शांति जगती है, कण-कण प्रेम से भर जाता है. पूर्णता का अनुभव होता है,
भीतर कोई अभाव नहीं रहता. यह पूर्णता मौन को जन्म देती है. मन भी चुप हो जाता है,
मन का मौन ही आत्मा का जन्म है. उसे एक बार पा लेने के बाद कभी विस्मरण नहीं होता,
वह ऐसा रत्न है जो एक बार मिल जाये तो साथ नहीं छोड़ता. वास्तव में तो वह सदा ही
मिला हुआ है, पर उसकी चमक खो गयी है, साधना की अग्नि में तप कर उसे पुनः प्रकाशित
करना है.
Thursday, July 25, 2013
भीतर जाकर ही वह मिलता
पदार्थ से अपदार्थ की ओर तथा पर से परम की
ओर हमें जाना है . परम ही ब्रह्म है, वही शिव है. सबसे बड़ी बाधा भीतर की होती है,
हमारे पूर्वाग्रह, मान्यताएं, रुचियाँ तथा अपेक्षाएं, नकारात्मक भावनाएं और हमारा
स्वार्थ. हम कुछ भी नहीं हैं जिस क्षण यह भाव दृढ हो जाता है, कृपा का अनुभव तत्क्षण
होने लगता है. जब कुछ हैं ही नहीं तो कुछ चाहिए भी नहीं, कोई आग्रह भी नहीं. हम इस
विशाल सृष्टि के नियंता का अंश हैं, बूंद सागर से अलग तो नहीं, जब हम कुछ नहीं हैं
तो इसका अर्थ हुआ हम वही हैं, जब वही हैं तो सब कुछ हमारा पहले से ही है. केवल हम
ही नहीं सारे प्राणियों की यही सच्चाई है, तो हममें भेद कहाँ रहा, भेद गया तो सारे
द्वंद्व भी मिट गये और सारा का सारा विषाद छू मंतर हो गया. फिर एकमात्र जो शेष रहा
वह वही है, अनंत सुख का स्रोत, ज्ञान का स्रोत. दृश्य से हमें द्रष्टा में लौट आना
है, द्रष्टा को देखने वाले बनते ही सहजता का अनुभव होता है. हमारा जीवन जब सहज
होता है सारा जगत अपना घर लगता है, सारे प्राणी अपने लगते हैं, मन तब सारे
द्वन्द्वों से परे होता है. अपने भीतर जिसे जाना आ गया वह बाहर कहीं भी जा सकता
है, वह निर्भय हो जाता है.
Monday, January 21, 2013
सत्यम शिवम सुन्दरम ही अध्यात्म है
फरवरी २००४
हम पदार्थ और ऊर्जा
दोनों से बने हैं. शरीर पदार्थ से बना है, और मन ऊर्जा से, शरीर को स्वस्थ रखने के
लिए हम अनेकों प्रयत्न करते हैं वैसे ही मन को स्वस्थ करने के लिए ही अध्यात्म है.
सौंदर्य प्रियता, सत्य के लिए प्रेम, शुभ के प्रति श्रद्धा ही अध्यात्म है. जब हम
अध्यात्म से दूर होते हैं तो क्रोध, मोह तथा विस्मृति के शिकार होते हैं, तब जीवन
एक दुखद श्रंखला बन जाता है, जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर सुख आता तो है पर टिकता
नहीं. सहज प्राप्य प्रसन्नता ही शाश्वत सुख है, जो अध्यात्म की साधना से ही मिलता
है.
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