Showing posts with label जीवात्मा. Show all posts
Showing posts with label जीवात्मा. Show all posts

Monday, September 8, 2014

भीतर एक अछूता देश

मार्च २००७ 
क्रिया और पदार्थ दोनों से परे है आत्मा, हम कितना भी जप, तप, ध्यान आदि करें, सब मन व बुद्धि के स्तर तक ही रहेगा तथा पदार्थ तो वहाँ तक भी नहीं ले जाते जहाँ से मन व बुद्धि लौट-लौट आते हैं. वह अछूता प्रदेश है. वहाँ कुछ भी नहीं है, न कोई करने वाला न क्रिया, न दृश्य न द्रष्टा, केवल शुद्ध चेतना ही वहाँ है. वही शुद्ध चेतना, परमात्मा या आत्मा कहलाती है. वही चेतना जब संसार की ओर मुड़ती है तो जीवात्मा कहलाती है.


Saturday, August 20, 2011

उपवास


अक्तूबर २००१ 

उपवास के दिन जीवनी शक्ति सुव्यवस्थित होती है, उपवास का अर्थ है आत्मा के निकट रहना. शरीर व मन को इससे लाभ होता है, यदि यह लाभ भी ईश्वर अर्पण कर दें तो विशेष लाभ होता है. क्योंकि जीवात्मा परमात्मा का सनातन अंश है, जो कण-कण में व्याप्त है जो घट-घट में बोल रहा है जो स्वयं चेतन है पर जडरूप में प्रकट हुआ है, उसी की एक मात्र सत्ता है वही हमारा अपना आप है जिसे ढूँढने हमें कहीं जाना नहीं है बस मन को उसके साथ संयुक्त रखना है, मन का मूल वही है सो उपवास के दिन मन को अपने आप में टिकाये रखने का अभ्यास करना है. उपवास का अर्थ यही है.