यदि जीवन में यम और नियम का पालन होता हो अर्थात सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह तथा ब्रह्म में विचरण करने की भावना मन में सदा जागृत रहती हो तथा तप, संतोष, शौच, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान में रुचि हो, तब हम योग के अनुशासन का पालन करने के योग्य होते हैं। अन्नमय कोश की साधना योगासन है। प्राणमय कोश की साधना प्राणायाम है। धारणा मनोमय कोश की व ध्यान विज्ञानमय कोश में हमें स्थित कर देता है। समाधि का अर्थ है साधक आनन्दमय कोश में स्थित है। समाधि से लौटा हुआ मन केंद्रित होता है, वह जगत के माया जाल में व्यर्थ नहीं उलझता। वह अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित रहता है। जीवन में अनुशासन से जो यात्रा आरम्भ होती है वह जगत के साथ एकत्व पर फलित होती है। यह यात्रा कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं होती क्योंकि परमात्मा अनंत है।
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Tuesday, December 20, 2022
Wednesday, September 5, 2018
चलें योग के पथ पर सब मिल
६ सितम्बर २०१८
यम और नियम योग का आधार हैं. योग का अर्थ है जुड़ना, जुड़ने के
लिए दो की आवश्यकता है, जुड़ने के बाद भले ही वे दो न रहकर एक हो जाएँ. जैसे दूध और
पानी का योग होने के बाद उन्हें अलग-अलग देखना सम्भव नहीं, हाँ किसी उपाय के
द्वारा उन्हें अलग अवश्य किया जा सकता है. मन का योग होने का अर्थ है उसके सभी
विचार जुड़ जाएँ, अनेक की जगह एक ही विचार शेष रहे, तो मन योगयुक्त हुआ मान सकते
हैं. बुद्धि योग का अर्थ हुआ जब बुद्धि एक ही निर्णय दे, संकल्प के विपरीत कोई
विकल्प न उठाये. अत्मयोग का अर्थ हुआ जब ‘स्वयं’ मात्र शेष रहे, केवल एक उपस्थिति
मात्र, एक शांतिपूर्ण अवस्था, जिसमें कोई संकल्प भी न उठे. परमात्मा योग का अर्थ
हुआ जब स्वयं का भी भान न रहे, उस अवस्था को संतों ने अवर्णनीय कहा है, क्योंकि
उसमें न कोई देखने वाला है न अनुभव करने वाला. आमतौर पर योग का अर्थ हम आसन और
प्राणायाम से ही लगाते हैं, ये दोनों योग के पथ पर चलने के साधन हैं.
Monday, August 6, 2018
छाया को छाया भर जानें
७ अगस्त २०१८
एक तरफ पदार्थ है और दूसरी तरफ ऊर्जा यानि चेतना, दोनों के
संयोग से एक तीसरा तत्व उत्पन्न हुआ मन, जो ऐसे ही था जैसे प्रकाश के सामने कोई
वस्तु आ जाये तो उसकी छाया बन जाती हो. छाया जो प्रकाश के अनुसार बदलती रहती है,
जो कभी होती है कभी नहीं होती, इसीलिए मन को चन्द्रमा के समान माना गया है, जो
घटता बढ़ता रहता है और कभी-कभी समाप्त ही हो जाता है. यदि चन्द्रमा पर सूर्य का
प्रकाश न पड़े और वह धरती की परिक्रमा न करे तो उसके अस्तित्त्व का सामान्य मानव को
पता भी न चले. भौतिकी नियम के अनुसार पदार्थ और ऊर्जा दोनों को न ही उत्पन्न किया
जा सकता है, न ही नष्ट किया जा सकता है. हम स्वयं को यदि शुद्ध पदार्थ मानते हैं,
यानि अपना केवल भौतिक अस्तित्त्व मानते हैं, तो भी हमारा विनाश सम्भव नहीं है,
केवल परिवर्तन होता है. पंच तत्वों से बना बच्चे का तन एक दिन वृद्ध हो जाता है और
पुनः सारे तत्व अपने-अपने स्रोत में मिल जाते हैं. यदि हम स्वयं को शुद्ध चेतना
मानते हैं तब भी हमारा विनाश सम्भव नहीं है. स्वयं को मन मानने से ही सारी उलझन का
आरम्भ होता है. पहली बात तो यह है, मन छाया मात्र है, अर्थात उसका कोई अस्तित्त्व
नहीं है, वह प्रतीत भर होता है. पदार्थ परिवर्तन शील है, उसकी छाया होने के कारण
मन भी प्रतिपल बदल रहा है, इसीलिए कोई भी अपने आप में टिका हुआ नहीं लगता, केन्द्रित
नहीं है. मन माया के पार जाकर ही कोई स्वयं में स्थित हो सकता है.
Wednesday, August 2, 2017
सांच बराबर तप नहीं
३ अगस्त २०१७
योग के साधक को आसन व प्राणायाम के साथ-साथ यम व नियम का पालन करना नहीं भूलना
चाहिए. योग का अंतिम लक्ष्य मुक्ति की प्राप्ति है, जिसका अर्थ है सर्वदुखों से
मुक्ति. जो मन के विकारों से मुक्त हुए बिना सम्भव ही नहीं है. यम और नियम मन को
शुद्ध करने के उपाय हैं, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य, ये पांच
यम हैं तथा शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान ये पांच नियम हैं. सत्य के
पालन करने का अर्थ है मनसा और वाचा में समता. जो मन में है वही वाणी से उजागर होने
लगे तो साधक सत्य के निकट पहुँचने लगता है. किसी की कही बात को ज्यों की त्यों कहना,
उसमें अपनी ओर से जरा भी फेर-बदल न करना, वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितयों को
जैसी वे हैं वैसा ही देखना भी सत्य व्यवहार कहा जाता है. अपने लाभ के लिए असत्य का
सहारा लेने वाला तो सत्य से बहुत दूर है.
Tuesday, September 27, 2016
जरा जाग कर जग को देखें
२७ सितम्बर २०१६
जीवन को यदि जागकर नहीं जीया तो
कदम-कदम पर बंधन की प्रतीति होगी. जागकर देखना क्या है, यही कि इतना बड़ा संसार
किसी अनजाने स्रोत से आया है, यह सारी सृष्टि किसी एक बड़े नियम से संचालित हो रही
है. हम भी इसी सृष्टि का एक अंग हैं, प्रकृति में सब कुछ अपने आप ही हो रहा है,
हमारे भीतर भी श्वास निरंतर चल रही है, रक्त का प्रवाह हो रहा है, भूख का अहसास हो
रहा है, भोजन पच रहा है. भीतर जो प्रेम आदि के भाव उठते हैं, उन्हें भी तो हमने
नहीं सृजा है, सुख-दुःख के भाव भी तो प्रकृति से मिले हैं. हमने जो कुछ भी पाया है
सब यहीं से मिला है. हम इसके साक्षी बनकर आनंद का अनुभव करें अथवा स्वयं को कर्ता
मानकर सुख-दुःख के भोक्ता बनें.
Thursday, August 20, 2015
उसकी ओर जरा मुड़ देखें
वह परम चैतन्य जो इस
सम्पूर्ण सृष्टि का नियंता है, जो ऋत है, नियम है, आनन्दमय है, नित है, ज्ञानमय
है. सब प्राणियों को जानने वाला है. वह अगोचर है पर उसी के द्वारा देखा जाता है,
उसी के द्वारा सुना जाता है, वह ईश्वर हर आत्मा को अपनी ओर उन्मुख करना चाहता है,
कभी सुख कभी दुःख के द्वारा वह हमें सजग करता है. उसके प्रति जागरूक होना ही साधना
का फल है.
Thursday, August 18, 2011
अनुशासन
अक्तूबर २००१
जीवन में कुछ नियमों के पालन से मार्ग प्रशस्त हो जाता है और हम मुक्ति की ओर स्वतः ही चल पड़ते हैं. अनुशासन और नियंत्रण हमारे जीवन को बंधन मुक्त ही करते हैं बंधन में डालते नहीं हैं. परमात्मा का लक्ष्य रहने से वही हमारी जिम्मेदारी ले लेते हैं, जीवन तब जिस किसी रूप में हमारे सम्मुख आता है मुक्त हृदय से उसका स्वागत करना हम सीखते हैं.
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