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Monday, December 18, 2017

मुक्त हुआ मन जब आशा से

१८ दिसम्बर २०१७ 
व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति से किसी न किसी प्रकार की अपेक्षा रखना ही व्यक्ति के दुःख का कारण है, यह बात न जाने कितनी बार हमने सुनी है. मन यदि असंतुष्ट है तो इसका एकमात्र कारण है अपेक्षाओं का पूरा न होना. एक प्रकार से मन अपेक्षाओं का ही दूसरा नाम है. जब तक यह बात अनुभव से स्वयं को सही न जान पड़े तब तक अपेक्षा से मुक्त होना सम्भव नहीं है. इसीलिए जिस क्षण प्रमाद और अनावश्यक क्रिया से मुक्त होकर साधक निज स्वभाव में लौटना चाहता है कोई न कोई स्मृति संस्कार रूप में आकर उसे विचलित कर देती है. अशांति का हल्का सा धुआं भी मन को ध्यानस्थ नहीं होने देता. सजग होकर यदि उस संस्कार के पीछे के कारण को जानने का प्रयास करें तो कोई न कोई अपेक्षा ही उसके मूल में दिखाई देती है. 

Tuesday, October 10, 2017

जग में रहे साक्षी बन जो

१० अक्तूबर २०१७ 
अपेक्षा में जीने वाला मन दुःख को निमन्त्रण देता ही रहता है. लाओत्से ने कहा है कि कोई मुझे हरा ही नहीं सका, कोई मेरा शत्रु भी न बना, कोई मुझे दुःख भी न दे सका क्योंकि मैंने न जीत की, न मित्रता की न सुख की अपेक्षा ही संसार से की. जो भी चाहा वह भीतर से ही और भीतर अनंत प्रेम छिपा है. परमात्मा ने किसी को इस जगत में खाली हाथ नहीं भेजा है. हम यदि उसके हैं और वह भरा हुआ है तो हमें किस बात की कमी हो सकती है. हम जिस शांति और ख़ुशी की तलाश बाहर कर रहे हैं, यदि उसी की तलाश भीतर करें तो वह मौजूद ही है. वास्तव में हमें वस्तुओं, व्यक्तियों और घटनाओं का साक्षी होना सीखना है, उनसे जुड़ना अथवा उनके द्वारा कुछ पाने की इच्छा करना ही दुःख को निमन्त्रण देना है.

Monday, June 8, 2015

है अपेक्षा कारण दुःख का

सितम्बर २००९
अपेक्षा में जीने वाला मन दुःख को निमन्त्रण देता ही रहता है. लाओत्से ने कहा है कि कोई मुझे हरा ही नहीं सका, कोई मेरा शत्रु भी न बना, कोई मुझे दुःख भी न दे सका क्योंकि मैंने न जीत की, न मित्रता की न सुख की अपेक्षा ही संसार से की. जो भी चाहा वह भीतर से ही और भीतर अनंत प्रेम छिपा है.

Sunday, February 1, 2015

प्रेम हमें निर्दोष बना दे

जनवरी २००८ 
जो प्रेम घटता-बढ़ता रहता है, वह आसक्ति है. जिस प्रेम में कभी परदोष देखने की भावना नहीं होती, जिसमें कोई अपेक्षा नहीं होती, जो सदा एक सा रहता है, वह शुद्ध प्रेम है. थोड़ा सा भी मोह यदि भीतर है तो अपेक्षा रहती है, ऐसा प्रेम सिवाय दुःख के क्या दे सकता है ? दुःख का एक कतरा भी यदि भीतर हो, मन का एक परमाणु भी यदि विचलित हो तो मानना होगा कि मूर्छा टूटी नहीं है. बाहर का संसार जब प्रभावित न करे, क्रोध, मान, माया, लोभ जब न रहें तब हमें सभी निर्दोष दिखते हैं.

Monday, August 11, 2014

घटता-बढ़ता नहीं प्रेम जो


जिसके सिर ऊपर तू साईं सो कैसा दुःख पावे ! ज्ञानी के ऊपर परम की कृपा होती है, उसके भीतर सहज कृपा होती है. वह सम्पूर्ण निराग्रही होता है. आग्रह खुला अहंकार है. उसके पास सबसे बड़ा शस्त्र प्रेम होता है, वह वाकचातुर्य नहीं दिखाते प्रेम स्वयं उनके व्यक्तित्त्व से टपकता है. वह अपेक्षा नहीं रखते, जहाँ अपेक्षा है वह प्रेम शुद्ध नहीं है. प्रेम लेने की वस्तु है ही नहीं, प्रेम तो देने की वस्तु है. जिस पर सच्चा प्रेम हो उसका कभी दोष नहीं दीखता. हमारे भीतर तो अपेक्षा वाला प्रेम है, जो घटता-बढ़ता रहता है. साधक का लक्ष्य वही परम ज्ञान की अवस्था है उसे भी आग्रह छोड़ने हैं, मुक्त होकर जीना है.   

Wednesday, October 31, 2012

दमक उठे जब प्रेम का सूरज



हमारी अपेक्षाएँ ही दुःख का कारण हैं, जैसे ही मन अपेक्षा से रहित हो जाता है, प्रशांत अवस्था को प्राप्त होता है, ऐसी प्रशांति जो किसी बाह्य कारण पर निर्भर नहीं है, जो तब उत्पन्न होती है जब मन भाव से भरा होता है, कृतज्ञता का भाव, धन्यभागी होने का भाव, ऐसा भाव जो हमें संवेदनशील बनाता है, संवेदनशीलता अध्यात्म की पहली सीढ़ी है, अन्यथा तो हम हृदयहीन कहलायेंगे. कोई भी सत्य हमें अपने मार्ग से हटा नहीं सकता, वह आगे ही ले जाता है. मन में जो भी द्वंद्व उत्पन्न होते हैं वे प्रेम के अभाव से ही होते हैं, प्रेम के लिए हमें प्रयत्न करना होगा, प्रेम संज्ञा भी है क्रिया भी है. कृष्ण की नागलीला का वास्तविक अर्थ उसी प्रेम को भीतर जागृत कर मन के द्वन्द्वों पर विजय पाना है. हमारा मन चाहे सजग न हो पर आत्मा सजग हो, अभी बिलकुल उल्टा है, मन तो पूरी तरह तैयार है, पूरी सेना के साथ, पर आत्मा सुप्त है, उसे अपने भीतर सजग करना है, विभिन्न कल्पनाओं ने न जाने कितने जन्मों में कितनी बार हमें भरमाया है, पर अब और नहीं, विवेक को साधकर बुद्धि को तीक्ष्ण बनाना होगा ताकि आत्मा तक पहुंचने का मार्ग बन सके.