जीवन एक पाठशाला ही तो है, जहां हर कदम पर हमें सीखना होता है। किसी की उम्र चाहे कितनी हो, वह बालक हो या वृद्ध, सीखने की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। कोई भी यहाँ पूर्ण नहीं है, पूर्णता की ओर बढ़ रहा है। अहंकार का स्वभाव है वह स्वयं को पूर्ण मानता है, अत: व्यक्ति सीखना बंद कर देता है; और अपने को मिथ्या ही पूर्ण मानता है। ऐसे में उसके भीतर एक कटुता, कठोरता तथा दुख का जन्म होता है। सीखते रहने की प्रवृत्ति उसे बालसुलभ कोमलता प्रदान करती है। बच्चे जैसा लचीला स्वभाव हो तभी हम आनंद के राज्य में प्रवेश पा सकते हैं। प्रकृति या अस्तित्त्व हमें ऐसी परिस्थितियों में रखते हैं, जहां अहंकार को चोट पहुँचे। यदि दुख का अनुभव अब भी होता है, शिकायत का भाव बना हुआ है अहंकार का साम्राज्य बना हुआ है। स्वाभिमान जगा नहीं है। स्वाभिमान में व्यक्ति अपने प्रेमस्वरूप होने का अनुभव करता है। वहाँ कोई दूसरा है ही नहीं। कृतज्ञता की भावना से वह भरा रहता है। जो उसे कटु वचन कह रहा है मानो वह उसकी परीक्षा ले रहा है, मानो परमात्मा ने उसे वहाँ रखा हुआ है। जब मन कृतज्ञता से भरा हो तो उसमें कैसी पीड़ा ! हर श्वास जब परमात्मा की कृपा से मिली है तब जिस परिस्थिति में रखा जाये वह किसी बड़ी योजना का भाग है ऐसा मानना होगा। यह सृष्टि किसी विशाल आयोजन की तरह किसी शक्ति द्वारा चलायी जा रही है, यहाँ यदि हम स्वयं को जानकर उसमें परमात्मा के सहायक बनना चाहते हैं तो हमें विनम्र होना सीखना होगा, यह पहली सीढ़ी है।
Showing posts with label पाठशाला. Show all posts
Showing posts with label पाठशाला. Show all posts
Wednesday, August 9, 2023
Tuesday, July 14, 2020
जीवन का जो पाठ पढ़ेगा
जीवन एक पाठशाला ही तो है, यहाँ हर दिन, हर किसी को, कोई न कोई परीक्षा देनी होती है. जब कोई देख न रहा हो तब भी कोई देखता है कि जब करुणा दिखाने का वक्त था तो हम कितने उदार थे. अचानक कोई विपदा आ पड़ी तो हमने कितनी शीघ्रता से उसका समाधान ढूंढ लिया. सामने वाला हमसे सहमत न हो रहा हो तो झट उसके दृष्टिकोण से हम वस्तुओं को भांप सकते हैं या नहीं इसकी भी परख होती है. जब देह को कोई रोग सताये तो हम कितनी जल्दी साक्षी भाव में आकर स्वयं को दर्द से बचा ले जाते हैं. जीवन में आ रहे परिवर्तन को कितनी आसानी से हम स्वीकार कर लेते हैं और दृढ़ता से उसका सामना करते हैं. कुछ भी हो जाये हमारी आशा की डोर टूटी तो नहीं, इसकी भी परीक्षा होती है. परमात्मा के प्रति आस्था और श्रद्धा में रंच मात्र भी कमी तो नहीं आती, कृतज्ञता की भावना ने हमारे अंतर को आप्लावित तो कर दिया है न. असीम धैर्य और आत्मविश्वास की पूंजी घट तो नहीं रही. जैसा जीवन हम चाहते हैं उसी के अनुरूप हमारे कर्म भी हो रहे हैं या नहीं. ये सभी छोटी-छोटी बातें यदि जीवन में हैं तो अवश्य ही हम जीवन की पाठशाला से सफल होकर जाने वाले हैं.
Tuesday, April 9, 2019
जब जागेगा भीतर कोई
जीवन एक पाठशाला है, जाने कितनी बार हम ये शब्द सुनते हैं. लेकिन इस पाठशाला का
शिक्षक कौन है, बिना शिक्षक के कोई विद्यार्थी चाहे वह कितना ही होशियार हो, नहीं
पढ़ सकता. जीवन की इस पाठशाला का शिक्षक हमारी चेतना है, हमारा जमीर. यदि वह स्वयं
ही सोया हुआ है तो जीवन लाख पाठ पढ़ाये हमारी समझ में कुछ नहीं आता. मोह के कारण न
जाने कितनी बार व्यक्ति दुःख उठाता है, किन्तु मोह किये बिना रह नहीं पाता.
अनावश्यक बोलने के कारण भी कितनी बार हमें पछताना पड़ता है पर हर विषय में अपनी राय
बताने का लोभ संवरण नहीं होता. यदि मन ही हमारा शिक्षक है तो ये भूलें बार-बार
होती रहेंगी. मन की गहराई में सुप्त चेतना जब जाग जाती है तभी हर अनुभव हमें आगे
ले जाने वाला होता है. जीवन में व्रत हो, तप हो और साधना का नियम हो, और मन में
श्रद्धा हो तब यह चेतना सहज ही जाग जाती है.
Tuesday, July 24, 2018
जीवन कितने भेद छिपाए
२४ जुलाई २०१८
जीवन की परिभाषा अनेक लोगों ने अनेक शब्दों में दी है. जीवन
इतना विशाल है कि हर परिभाषा छोटी पड़ जाती है. किसी ने यह भी कहा है, जीवन एक
पाठशाला है. यहाँ हमें हर दिन एक विद्यार्थी बनकर प्रवेश करना है, यदि कोई यह
मानकर बैठा है कि उसने सब कुछ जान लिया है, तो वह मानो जीवन में प्रवेश ही नहीं कर
सकता. यदि कोई यह सोचता है कि उसने सब सीख लिया है, उसे तो अब सिखाना है, वह भी
जीवन की गहराई से अछूता ही रह जाता है. यहाँ तो अनजान और मासूम बालक बनकर ही
प्रवेशद्वार पर पहुँचा जाता है. सृष्टि में हर घड़ी इतना कुछ घट रहा है कि विस्मय
से मन ठिठक जाता है. घास की नोक पर टिकी एक छोटी सी बूंद में पडती सूर्य की किरणों
का रंग हो या शाम ढलते ही झींगुरों का राग, आत्मीयता से भरा कोई स्पर्श हो या किसी
मूक प्राणी की आँखों में उठा कोई भाव, जीवन हर पल कितना कुछ दिखाता है, सिखाता है.
Subscribe to:
Posts (Atom)