जिस सृष्टि का
निर्माण हमने ही किया है, हम उसे ही न जानें और उससे ही प्रभावित हो जाएं, यह आश्चर्य
की बात नहीं तो और क्या है ! बाहर की तरह अपने भीतर हर पल हम एक वातावरण का निर्माण
करते हैं जो विचारों और भावनाओं से बना है। हम ही उसका संवर्धन भी करते हैं और कुछ
समय बाद उसका संहार भी कर देते हैं। हमारी सृष्टि हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को ही
तो प्रदर्शित करती है। यदि यह सुखद नहीं है तो भी हम ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। जिसे
भाग्य कहा जाता है वह एक दिन हमारे ही द्वारा किए गए पुरुषार्थ से जन्मा है।