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Friday, February 23, 2018

भीतर बहता सुख का सोता

२३ फरवरी २०१८ 
यदि कोई भी कार्य करने से पहले हम स्वयं से यह प्रश्न करें कि इस कार्य से हम क्या प्राप्त करना चाहते हैं, तो हर उत्तर भिन्न हो सकता है जैसे धन, यश, पद, सम्मान आदि. किन्तु हर उत्तर अंततः एक ही दिशा की ओर ले जायेगा, और वह है इनके द्वारा आनंद प्राप्ति. अंतर है तो इतना कि कोई कार्य के सफल होने के बाद ख़ुशी मनाता है तो कोई कार्य को संपादित करते समय ही. किसी भी कर्म को हम किस भावना से करते हैं, उसमें हमारा कितना श्रम अथवा ऊर्जा लगी है, परिणाम इस पर निर्भर करता है. उत्साह और शुभ भावना से किया गया कर्म अपने आप में ही आनंदित करने वाला होता है. हमारी अंतर्चेतना जिन तत्वों से बनी है उनमें आनंद प्रमुख है, इसका अर्थ हुआ कि आनंद ही वह प्रेरक तत्व है जो हमें सद्कार्य में लगाता है. जैसे धन से धन कमाया जाता है वैसे ही मुदिता से मुदिता का संवर्धन होता है. यदि अध्यापक ख़ुशी-ख़ुशी पढ़ाये और किसान प्रसन्नता पूर्वक खेत में बीजारोपण करे तो स्कूलों और खेतों में वातावरण कितना सुखद होगा. 



Thursday, July 28, 2016

कर्म में ही आनंद छिपा है

२८ जुलाई २०१६ 
हम जिस समय जो भी कार्य कर रहे होते हैं उस समय उसका कोई मूल्य हमारी नजर में नहीं होता, बल्कि भविष्य में जो कुछ उस कर्म से मिलेगा उसे ही मूल्य देते हैं. जैसे कोई नौकरी कर रहा है तो महीने के अंत में मिलने वाले धन में उसका मूल्य देखता है, फिर जब धन मिलता है तो उसका मूल्य भी उन वस्तुओं में देखता है जो उससे खरीदी जाएँगी, और वस्तुओं का मूल्य तब होगा, जब वह मिलने वाले को प्रसन्न करेंगी, और इस तरह हम एक चक्र में घूमते रहते हैं. जीवन हमें अर्थहीन लगने लगता है, यदि हर पल ऐसा हो कि जो भी हम कर रहे हों अपने आप में ही मूल्यवान हो, तो जीवन उत्सव बन जाता है. 

Tuesday, May 5, 2015

होना ही जब शुभ हो जाये

जनवरी २००९ 
भगवान बुद्ध कहते हैं वह कार्य करने के लायक नहीं जिसे करके पीछे पछताना पड़े. हमारा कृत्य हमारे होने के विपरीत भी हो सकता है. हमारे होने का ढंग शुभ हो न कि हमारे कर्म शुभ हों. हम जो भीतर हैं उससे डरते हैं इसलिए बाहर विपरीत करते हैं. भीतर पतझड़ हो तो हम बाहर उधार वसंत की अफवाह फैला देते हैं. अपने कृत्यों से हम हमारे होने पर पर्दा डालते हैं. अगर दुर्जन शुभ कर्म भी करे तो उसका परिणाम अच्छा नहीं हो सकता ! सज्जन अगर शुभ करता है तो उसके भीतर आनंद का अनुभव होता है. उससे यदि अशुभ भी हो जाये तो वह उसके भीतर की समरसता को दिखाने के लिए ही है न कि कुछ छिपाने के लिए.

Monday, August 25, 2014

एक लहर उमड़े मस्ती की

जनवरी २००७ 
कोई हमारे कार्यों की प्रशंसा करे, निंदा करे या उपेक्षा, हर हाल में हमें निर्लेप रहना है. हम अपने भीतर स्थित रहें और यह मान लें कि निज ज्ञान की स्थिति के आधार पर ही लोग जगत में व्यवहार करते हैं. हमें उनके भीतर भी परमात्मा को ही देखना है और अपने भीतर की सौम्यता को बनाये रखना है. यह जगत उसी की रचना है और वह निर्दोष है, उसे तो इस जगत से कुछ लेना-देना नहीं है, उसने मात्र संकल्प से इसे रचा है, जैसे हम स्वप्न में सृष्टि बनाते हैं तो क्या हमारा दोष देखा जाता है यदि स्वप्न में हमें कोई हानि हो. ऐसे ही यह जगत भी एक लीला है, नाटक है, स्वप्न है इसमें इतना गम्भीर होने की कोई बात नहीं है. यहाँ सभी कुछ घट रहा है. यहाँ हम बार-बार सीखते हैं बार-बार भूलते हैं. नित नया सा लगता है यह जगत. हम वर्षों साथ रहकर भी कितने अजनबी बन जाते हैं एक क्षण में और जिनसे पहली बार मिले हों एक पल में अपनापन महसूस करने लगते हैं. कितनी अनोखी है यह दुनिया, कितनी विचित्र ! और हम यहाँ क्या कर रहे हैं ? हमें यहाँ भेजा गया है ताकि हम इस सुंदर जगत का आनन्द ले सकें और उस आनन्द को जो हमारे भीतर है बाहर लुटाएं.  

Wednesday, February 19, 2014

आनन्द से उपजें जो कर्म

अगस्त २००५ 
हमारे कर्म (मानसिक, वाचिक, कार्मिक) ही हमें बांधते हैं, यदि हम उन्हें किसी आशा पूर्ति के लिए करते हैं अथवा तो प्रतिक्रिया के रूप में करते हैं, अथवा इस कार्य से सुख कभी भविष्य में मिलेगा यह सोचकर करते हैं. यदि कोई किसी कार्य को करते समय आनन्दित हो रहा है और  उस आनन्द पर ही अपना अधिकार मानें तो न तो कर्म बोझिल होंगे न बाँधने वाले होंगे, हम ऐसे कर्म करेंगे जैसे वे सहज ही होते जा रहे हैं. अनावश्यक कर्म अपने आप ही तब झर जाते हैं.

Monday, December 16, 2013

जुड़ा रहे मन उस अपने से

मई २००५ 
जिसका कार्य और रूचि एक हो, जिसका हृदय और मस्तिष्क एक हो उसमें सख्य भाव होता है. राम और लक्ष्मण में भी ऐसा सख्य भाव है. लक्ष्मण सदा से ही राम के संग हैं. जगे हुए ब्रह्म में जब सृष्टि की इच्छा होती है तो यह शेष उन्हें अपने शीश पर धारण करता है. दोनों में अद्वैत है. इसी तरह का सख्य भाव भक्त और भगवान में होता है, गुरु और शिष्य में होता है. मानसिक रूप से वे साथ रहते हैं, भौतिक दूरी उनके लिए कोई दूरी नहीं होती. जो ईश्वरीय तत्व को जानता है, वह हर क्षण जुड़ा रहता है, दोनों के बीच प्रेम की धारा अविरल बहती रहती है. समाधि का अनुभव दोनों को होता है. आधि, व्याधि, उपाधि से मुक्त होकर भक्त, भगवान के प्रेम का पात्र बन जाता है. अपनी ऊँचाई पर स्थित होते हुए भी वह उसके मन से जुड़ जाते हैं, वे सर्व समर्थ हैं.

Sunday, July 7, 2013

दुनिया रंग रंगीली माधो...

अक्तूबर २००४  
लोभ सूक्ष्म रूप से हम पर आक्रमण करता है, हम सोचते हैं कि निष्काम कर्म कर रहे हैं, अथवा तो सेवा कार्य कर रहे हैं, पर उसके मूल में लोभ ही होता है, सम्मान का लोभ, सुविधा का लोभ, अपनी नजरों में अच्छा बनने का लोभ. साधक को इसके जाल से बचना होगा. लोभ की हल्की सी रेखा मानस को दूषित कर  देती है. अपने मन का चैन गंवा कर यदि कोई कुछ पा भी ले तो व्यर्थ है, यह जगत एक स्वप्न है, इसकी अनुभूति हो जाने के बाद भी वह हमें भरमा लेता है, एक खिलौना दिखाकर जैसे हम बालक को भ्रमित कर देते हैं, उसी तरह. बाहर का सम्मान, लाभ हमारे भीतर के लोभ का ही मूर्त रूप है, वास्तव में बाहर जो भी हमारे साथ साथ घटता है, भीतर का प्रतिफलन ही है. जिस कार्य को किये बिना, जिस वाक्य को सोचे बिना, जिस जिस बात को बोले बिना हमारा काम चलता हो उसे न करना, न सोचना, न बोलना ही अच्छा है. अपने विवेक का आश्रय लेकर हर घटना से कुछ न कुछ सीखते हुए आगे बढ़ना है, ताकि अपना लक्ष्य और निकट आ जाये. वह जो निकट से भी निकटतम है, वही कभी दूर हो जाता है.

Tuesday, April 23, 2013

सबसे बड़ा संतोष धन


जुलाई २००४ 
संतजन कहते हैं, जो भी हम करें, सौ प्रतिशत लगकर करें तो हमारा वह कार्य भी सफल होगा और भीतर संतोष भी जगेगा. संतोष से सुख उपजता है जो भीतर के आनंद की ही झलक देता है. आनंद किसी कार्य का मोहताज नहीं बल्कि वह तो कार्यों के रूप में प्रकट होता है, वह सहज होता है जैसे इस जगत में सहज ही दिन-रात घटते हैं. उसके होने का कोई कारण नहीं, वह तो सब कारणों का कारण है. इसलिए सहज संतोष भाव में जब कोई होता है तो यह उसके भीतर से वैसे ही छलकता है जैसे फूल से उसकी सुगंध, झरने से उसका निनाद, तथा आकाश से उसकी नीलिमा. प्रकृति सहज है तभी तक सुंदर है वरना तो विनाश भी ढा सकती है, वैसे ही मानव जब तक सहज है, आनंद का स्रोत है, वरना उसके भीतर ज्वालामुखी भी फट सकते हैं. अपनी असहजता के कारण वह खुद के साथ-साथ औरों को भी पीड़ा देता है. 

Wednesday, August 22, 2012

क्षण क्षण जीना सीखा जिसने


जुलाई २००३ 
हम अपना कितना समय व्यर्थ ही गंवा देते हैं, किन्तु जब तक कार्य कारण सिद्धांत के अंतर्गत रहते है, तो हर कार्य के पीछे एक कारण होता है, उस कारण के पीछे एक और कारण. हमारा इस जगत में होना भी तो एक कारण छिपाए है, लेकिन यह तो माया का जाल है, जो इस जाल से मुक्त हो गया हो, उसे अपने कार्यों, विचारों और शब्दों के पीछे अज्ञात कारणों को खोजने की आवश्यकता नहीं है. वह जो कुछ भी करता है सहज रूप से करता है, उसके पीछे कोई प्रयोजन नहीं होता, उसके कार्य किसी कारण अथवा परिणाम से बंधे नहीं होते. वह क्षण-क्षण जीता है. उसका पिछला जीवन एक तरह से समाप्त हो चुका होता है. अगले क्षण क्या होने वाला है उस ज्ञात नहीं और जो क्षण बीत गया वह उसके लिये रहा नहीं, वह हर क्षण मुक्त है, वह अपनी मौज में है. वह जीवन की असलियत को जान चुका होता है, यह सारा माया का खेल उसके सामने स्पष्ट हो चुका होता है, अब उसे इसमें कोई रस नहीं होता. बस उसका होना ही एक मात्र सत्य बनकर उसे दिखता है. तो क्या वह जड़ वस्तु सम है? नहीं, वह अनुभव करता है, वह समरस है, वह अपने भीतर की दुनिया में संतुष्ट रहता है. वह जिस भाव में रहता है उसे व्यक्त करने के लिये शब्दों में सामर्थ्य नहीं है. वह सभी के भीतर उसी अनंत को देखता है, वह अनंत को पा चुका अब सीमित से कैसे संतुष्ट हो सकता है पर इससे कोई अभिमान उसे नहीं होता, वह अनंत के आगे स्वयं को अणु ही मानता है पर ऐसा अणु जो नित्य है ,शाश्वत है, पूर्ण है.

Saturday, July 14, 2012

एक रहस्य सबके भीतर


साधक को किसी भी बात पर परेशानी होती ही नहीं, आनंद का स्रोत यदि भीतर मिल गया हो तो छोटी-छोटी बातों का असर नहीं होता, हम किसी महान उद्देश्य को पाने के लिये यहाँ भेजे गए हैं. वह रहस्य हमारे भीतर है, उसके ही निकट हमें जाना है, जीवन के हर पल का उपयोग उस परम सत्य की खोज में हो सके तो ही जीवन सफल है. हमारा रोजमर्रा का कार्य भी उसी ओर इंगित करे, हमारे विचार, हमारा आचरण भी वही दर्शाये, हम जो भी अनुभव करें, सच्चे मन से करें, सजग होकर करें,  विवेक को जगाएं. मिथ्या अहं को त्याग कर जीवन को एक विराट परिदृश्य में देखें. हम सभी श्वास के द्वारा एक दूसरे से जुड़े हैं, हमारी चेतना परम चेतना का ही अंश है. हम अपरिमित शक्ति के स्वामी हैं !


Sunday, January 22, 2012

कर्म में ही आनंद है फल में नहीं


जब हम कोई कार्य बिना किसी आकांक्षा के करते हैं, हमें कर्म करने मात्र में आनंद मिलता है,  हमारा मन शुद्ध होता जाता है. शुद्ध मन में शांति का वास होता है और शांति से ही सुख मिलता है. सुख यानि मोक्ष या निर्वाण इसी जन्म में मिल जाता है. यही ब्राह्मी स्थिति है, और एक बार इस स्थिति में टिकना आ जाता है तो साधक कभी इससे च्युत नहीं होता. ईश्वर अब उसका आधार बन जाते हैं. ईश्वर अर्थात अखंड सात्विक आनंद. इसी को कृष्ण कर्मयोग कहते हैं, उनकी कृपा से ही यह निष्कामता आती है. फल की अपेक्षा जब तक रहेगी तब तक उनकी ओर नजर न जायेगी. ईश्वर की निकटता का अनुभव निर्दोष भाव से अपनी सीमाओं का ध्यान रखते हुए उसके पास जाकर हो सकता है. प्रकृति के पाश से, तीन गुणों के बंधन से, माया के जाल से अर्थात दुःख से यदि बचना है तो उनकी शरण में जाना होगा, अर्थात मन में सम भाव रखकर स्वीकार भाव से जीना सीखना होगा.