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Wednesday, February 19, 2020

सुख की फसल उगाए जो



सृष्टि का बीज भीतर है, जिसका विस्तार बाहर है. बाहर जो कर्म हमने किये, उनके फल-रूप में सुख-दुःख मिले. हर सुख-दुःख के फल में छिपे थे बीज. हम अनजाने में विषैले बीज बोते रहते हैं. जब बाहर क्रोध, वैमनस्य और घृणा की फसल लहलहाती है, तब दुःख मनाते हैं. भीतर दुःख रूपी फल से निकले उदासी के बीज हैं, कुछ पीड़ा के भी. हर बार दुखी होने पर द्वेष या घृणा करने पर हम बोते रहे उन्हीं के बीज, और हर बार सुखी होने पर मुस्कानों के. तभी अकारण ही कभी-कभी मुस्कानें भी फूटती हैं भीतर से, किन्तु दो दुखों के मध्य एक छोटा सा सुख तृप्ति तो नहीं दे पाता. हम यदि सचेत होकर  सुख, शांति, करुणा और प्रेम  के बीज ही बोयें तो क्या जीवन में वही नहीं पनपेंगे। 

Tuesday, June 10, 2014

चलती रहे साधना प्रतिपल

अप्रैल २००६ 
साधना के बाद मन पहले के जैसा नहीं रहता, जो हर वक्त बीच में अपनी टांग अड़ाता था, अब कहना मानता है. आखिर मन है क्या, कुछ आशा कुछ निराशा, पर जब हम अपने सही स्वरूप में होते हैं तो कुछ पाने की आशा नहीं, कुछ खोने की निराशा नहीं, पीड़ा भी तब सात्विक हो जाती है, वह यह कि साधक को सेवा के पर्याप्त अवसर नहीं मिले. ईश्वर से निकटता का अनुभव होने लगता है, उसका प्रेम ही स्वयं को समर्पित करने को प्रेरित करता है. वह जीवन को पूरी गहराई से जीना चाहते हैं, सच्चाई से भी. हमारे वचनों, कर्मों और विचारों में एकता आने लगती है. हम अपने प्रति सच्चे होने लगते हैं. सत्य की ही जय होती है, साधक हर कीमत पर सत्य का ही आश्रय लेना चाहता है, अपने जीवन के हर मोड़ पर.


Wednesday, December 11, 2013

सच की नाव खेवइया सतगुरु

मई २००५ 
जब भी हमने चित्त को मैला किया, हमें दंड मिला है, हम स्वयं को दुखी बनाते हैं और दुखी व्यक्ति दूसरों को भी दुख देता है. जैसा-जैसे चित्त निर्मल होता है, हम सुखी होते हैं और स्वयं सुखी व्यक्ति औरों को भी सुख देता है. जब-जब हम सजगता त्याग देते हैं, पहले अपनी हानि होती है फिर दूसरों की हानि होती है. जब यह बात समझ में आती है तभी वास्तविक रूप से हम धर्म का जीवन जीते हैं. धर्म की रक्षा करें तो धर्म हमारी रक्षा करता है. सत्य के निकट होते ही शांति, प्रेम तथा आनन्द का अनुभव होता है तथा सत्य से दूर जाते ही पीड़ा का, पीड़ा का अनुभव भला कौन चाहता है ?