साधना के द्वारा जब जीवन से जड़ता और प्रमाद चले जाते हैं, तभी किसी न किसी नवीन सृजन का कार्य आरम्भ होता है। मन से परिग्रह का उन्माद भी खो जाता है और सहज संतोष अनुभव होता है। भय तभी होता है जब कुछ बचाए रखने की कामना रहे, इसलिए अपरिग्रह सधते ही अभय का जन्म साधक के जीवन में होता है। ऐसा व्यक्ति ही निस्वार्थ प्रेम दे सकता है। उसके मन में कृतज्ञता की भावना पनपती है और हर उपलब्धि को वह ईश्वर का अनुग्रह मानकर स्वीकार करता है।अब राग-द्वेष की आँच नहीं जलाती अपितु निरंतर एक सजगता बनी रहती है। उसके कर्म अब बंधन का कारण नहीं बनते बल्कि मन को शुद्ध करने के हेतु बनते हैं। चित्तशुद्धि होते-होते साधक एक न एक दिन समाधि के परम आनंद को प्राप्त होता है।
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Wednesday, October 13, 2021
Saturday, July 13, 2019
अंतर्मन जब कहीं न उलझे
प्रशांत चित्त
ही ब्रह्म का अनुभव कर सकता है. जैसे लालटेन का शीशा प्रकाश को बढ़ा देता है, वैसे
ही चित्त आत्मा को शक्ति को बढ़ाकर बाहर भेजता है. शीशा जितना स्वच्छ होगा, प्रकाश
उतना ही बाहर आएगा. चित्त यदि पूर्ण रूप से संतुष्ट हो, उसे कोई कामना ही न हो चित
सुलझा हुआ हो, उसमें कोई द्वंद्व न हो, तो वह शांत रह सकता है. मन यदि कहीं भी उलझा
हुआ है तो वह साधना में आगे नहीं बढ़ सकता. शांत मन में चिति शक्ति आत्म शक्ति को
विस्तृत करके बाहर प्रकाशित कर देती है. छोटी-छोटी बातों पर जब मन प्रतिक्रिया
करना छोड़ देता है तो वह शांत हो जाता है. ठहरा हुआ मन एक शांत झील की तरह होता है,
जिसमें आत्मा झलकती है. साधना की गहराई में जाना हो तो मन शांत होना चाहिए.
Sunday, April 7, 2019
तीनों गुणों के पार हुआ जो
चित्त सत्व, रज व तम से बना है, जड़ है. चित्त में ज्ञान, क्रिया
और स्थिरता तीनों हैं. सत्व से ज्ञान होता है, रज से प्रवृत्ति होती है तथा तम से स्थिति
होती है. चित्त कार्य द्रव्य है, यह उत्पन्न हुआ है, नष्ट भी होगा. यह कार्य जगत
भी इन्हीं तीनों गुणों से बना है. भीतर जो संघर्ष चल रहा है वह जड़ और चेतन में
होता है. हर क्षण हम जो जान रहे हैं, वह चित्त के सत्व गुण के कारण है. जब इसमें
रजो या तमो गुण बढ़ा हुआ होता है, हम प्रामाणिक ज्ञान से दूर हो जाते हैं. समाधि का
लक्ष्य है सत्व गुण को बढ़ाना. चित्त की एकाग्र व निरुद्ध अवस्था में समाधि घटती
है. पतंजलि योग सूत्रों के आधार पर मुख्यतः समाधि दो प्रकार की है सम्प्रज्ञात व
असम्प्रज्ञात. वितर्क, विचार, आनन्द व अस्मिता अनुगत ये चार समाधियाँ सम्प्रज्ञात
के अंतर्गत आती हैं. वितर्क में स्थूल विषयों पर एकाग्रता रहती है. विचारानुगत में
सूक्ष्म का ज्ञान होता है. आनंद व अस्मिता में क्रमशः आनंद व स्वयं के होने का भान
होता है. जब सभी वृत्तियाँ रुक जाती हैं उसे असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं.
Wednesday, March 11, 2015
जहाँ मिले विश्राम वही घर
मई २००८
बाहर हमें
जो भी मिलता है वही हमारा प्राप्य है पर भीतर का क्षेत्र हमारा अपना है, जहाँ हम
जो चाहे पा सकते हैं. वहाँ आत्मा का साम्राज्य है, वह कल्पतरु है, जो माँगो उससे
मिलता है. वहाँ मौन है, शांति है, आनंद है, प्रेम है, सुख है, ज्ञान है और शक्ति
है. भीतर की दुनिया अनोखी है, जहाँ विश्रांति है, जहाँ मन ठहर जाता है, बुद्धि
शांत हो जाती है, जहाँ चित्त डूब जाता है. जहाँ कोई उद्वेग नहीं है, कोई लहर नहीं
है, जहाँ अनोखा संगीत गूँजता है, जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है. जहाँ जाकर लौटने की
इच्छा नहीं होती. वह हमारा अंतरस्थल ही हमारा आश्रय स्थल है. वही हमारा घर है.
बाहर तो जैसे कुछ देर के लिए हम घूमने जाएँ या बाजार जाएँ या किसी से मिलने जाएँ
अथवा तो दूसरे शहर या दूसरे देश जाएँ !
Monday, December 8, 2014
तुझ संग ही नाते हों सारे
जून २००७
अद्वैत
का अनुभव ध्यान में होता है जब आत्मा और परमात्मा के मध्य कोई अंतर नहीं रहता,
दोनों एक हो जाते हैं. जीवात्मा के रूप में हम मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार के साथ
होते हैं, तब हम परमात्मा के अंश हैं. जब हम चिन्तन-मनन करते हैं अथवा मौन रहते
हैं तब द्वैत होता है. मन लहर है तो आत्मा सागर है, मन बादल है तो आत्मा आकाश है.
व्यवहार काल में हम उस परमात्मा के दास हैं. वह साकार भी है और निराकार भी. उसकी
मूर्ति भी उसका साकार रूप है और उसकी बनाई ये चलती-फिरती मानव मूर्तियाँ भी. हमारा
कर्त्तव्य है इन्हें किसी भी प्रकार का दुःख न देना. सेवक को अपना सुख-दुःख नहीं
देखना है, उसका अहंकार भी मृत हो गया है, क्योंकि वह तो परमात्मा का अंश है. ऐसा
हमें हर पल स्मरण रहे तो सदा हम परमात्मा के साथ हैं !
Wednesday, January 22, 2014
मुदिता की हम करें साधना
जून २००५
हमारे
चित्त की जैसी चेतना है, कर्म का फल उसी के अनुसार मिलता है. शरीर के कर्म का फल
नहीं मिलता. कर्म के पीछे की भावना ही प्रमुख है, पहले मन में ही कर्म उत्पन्न
होता है. निर्मल चित्त से किया गया कर्म सुख का कारण बनेगा. सत्कर्म करते हुए मन
मुदित होता है, यदि मुदिता का स्वभाव बनता जाये तो फल भी मोद के रूप में प्राप्त
होगा. चित्त शुद्ध करने का कर्म भी एक बीज है जो वक्त आने पर सुख का ही फल देगा.
हमारी गति हमारे ही हाथ में है, अवनति में दुर्गति तथा उन्नति में सद्गति है.
Friday, December 20, 2013
चेतन अमल सहज सुख राशि
मई २००५
मन, बुद्धि, चित्त आदि
साधन हमें आत्मा की शक्ति को उजागर करने के लिए प्राप्त हुए हैं तथा उस शक्ति को
प्रेम व आनन्द के रूप में बांटने के लिए मिले हैं. जब हम इनका उपयोग अहंकार की
सेवा में करते हैं, या अपने सुख के लिए करते हैं तब दुःख को आमन्त्रण देते हैं, जब
इनका उपयोग ज्ञानपूर्वक करते हैं तब सहज ही सुख पाते हैं. हमें सुख यदि खोजना पड़े
तो वह हमारे योग्य नहीं है, लखपति यदि कुछ रुपयों के लिए भटकता फिरे तो उसे क्या
कहा जायेगा, वैसे ही हम अनंत सुख राशि ईश्वर का अंश होने के कारण स्वयं ही वह सुख
छुपाये हैं जो हमें जगत को बांटना है न कि उससे मांगना है. जगत आनंद शून्य है, ओस
की बूंदों की तरह सुख का आभास मात्र दे सकता है. ज्ञान ही हमें मुक्त करता है.
Wednesday, December 11, 2013
सच की नाव खेवइया सतगुरु
मई २००५
जब भी हमने चित्त को मैला
किया, हमें दंड मिला है, हम स्वयं को दुखी बनाते हैं और दुखी व्यक्ति दूसरों को भी
दुख देता है. जैसा-जैसे चित्त निर्मल होता है, हम सुखी होते हैं और स्वयं सुखी
व्यक्ति औरों को भी सुख देता है. जब-जब हम सजगता त्याग देते हैं, पहले अपनी हानि
होती है फिर दूसरों की हानि होती है. जब यह बात समझ में आती है तभी वास्तविक रूप
से हम धर्म का जीवन जीते हैं. धर्म की रक्षा करें तो धर्म हमारी रक्षा करता है. सत्य
के निकट होते ही शांति, प्रेम तथा आनन्द का अनुभव होता है तथा सत्य से दूर जाते ही
पीड़ा का, पीड़ा का अनुभव भला कौन चाहता है ?
Monday, April 22, 2013
समाधि ही देती समाधान
जुलाई २०१३
चित्त के समाधान के लिए पहला कदम है विनम्रता, उद्दन्डता से
चित्त समाधि में प्रविष्ट नहीं हो सकता. अपना ही दृष्टिकोण सही है, यह दुराग्रह
रखने वाला समर्पित नहीं हो सकता. चित्त यदि व्याकुल है तो अवश्य अपने मार्ग से
भटका है. सुख मिलने पर सुखी और दुःख मिलने पर दुखी तो पशु भी हो लेते हैं, साधक
दोनों से परे होने की कला सीखता है., आत्मारामी होता है. आत्मा अव्यय है, अविनाशी
है, अप्रमेय है, प्रकृति इसके विपरीत है. समपर्ण के द्वारा ही प्रकृति के पार जाया
जा सकता है. एकनिष्ठ चित्त ही समाहित होता है. समाहित चित्त ही समाधि तक पहुंचता
है.
Tuesday, March 26, 2013
मुक्त करे आनंद
अस्तित्त्व हमें
बोलने, सुनने, देखने, सूँघने, व छूने की शक्ति प्रदान करता है ताकि हम उसके आनंद
में भागीदार हो सकें. वह जब अपने आनंद को बांटना चाहता है तो इस सुंदर जगत का
निर्माण करता है, अपने से ही वह इसे गढ़ता है, फिर जैसे माँ बच्चे को जन्म देती है,
फिर उसे स्नेह देती है और स्नेह पाती है, वैसे ही वह भी आनंद का आदान-प्रदान करता
है. मोह वश जैसे कभी सन्तान ही दुःख भी पाती व देती है, वैसे ही हम भी अपने
कृत्यों के कारण दुःख पाते हैं, व उसे दुःख देते हैं, क्योंकि उसकी सबसे बड़ी पूजा
प्रसन्न चित्त रहना है. चित्त जब निर्मल हो, प्रसन्न हो, समता में हो तब हम उसके
निकट हैं और लेन-देन चल रहा है.
Monday, February 18, 2013
यह जग सुंदर हो जाये
अप्रैल २००४
अस्तित्त्व ने
हमें जीवन का अमूल्य उपहार दिया है, यह सुंदर प्रकृति उसी की अध्यक्षता में काम
करती है, बदले में हम प्रभु को क्या दे सकते हैं? इतना ही की उसके इस सुंदर विश्व
को कुरूप न बनाएँ, बल्कि और सुंदर बनाएँ, अपने आसपास सौंदर्य बिखराएँ, मन का
सौंदर्य भी और भौतिक सौंदर्य भी, सभी अन्ततः भीतर से ही उपजता है, इस जगत में सभी
कुछ उस परम के प्रकाश से ही उपजा है. वह हर पल हमारी खबर रखता है, हमें उसकी खबर
नहीं रहती जब मन संसार में उलझा होता है. चित्त जब खाली होता है, तभी उसको जानने
की प्यास भीतर जगती है. चित्त की शुद्धि के लिए साधना की तत्परता भी चाहिए और
समर्पण भी. सृजन की क्षमता का विकास होता है जब मन एकाग्र हो, बिखरा हुआ मन स्वयं
भी अतृप्त रहता है और दूसरों को भी अतृप्त बनाता है. मन जब उस विराट के चरणों में
झुका होता है तो उसके कुछ गुण तो इसके भीतर आएंगे ही और वह प्रभु तो मानो इसी की
प्रतीक्षा कर रहा है, वह हमारी और प्रेम भरी नजरों से निहार रहा है, उसको जानने का
छोटा सा प्रयास भी विफल नहीं जाता.
Monday, November 19, 2012
सजग रहे जो दुःख से छूटे
अक्टूबर २००३
हर तरह की वेदना से
मुक्ति के उपाय की खोज, बोधि तथा समाधि की प्राप्ति साधक का लक्ष्य है. उपाय की
खोज ही बोधि है. चित्त की निर्मलता ही समाधि है. अपनी भूलों पर वेदना होती है तो
हमारी सजगता बढ़ती है. दुःख हमें सिखाता है, क्रोध, मोह, प्रमाद, आलस्य हमारे ताप
को बढ़ाते हैं. सजगता ही जिसकी एकमात्र औषधि है. थोड़ी सी भी असावधानी हमें वेदना
देती है वही वेदना फिर सजग करती है. वाणी का संयम नहीं सधता तो मुख से कठोर शब्द
निकल जाते हैं. जिह्वा का संयम नहीं सधता तो हम अखाद्य भी खा लेते हैं. मन का संयम
नहीं रहा तो व्यर्थ का चिंतन चलता रहता है. मन जब खाली हो तो सुमिरन स्वतः होता है
जबकि चिंतन बलपूर्वक करना होता है. हमारा हृदय इतना शुद्ध हो कि वहाँ नित्य सुमिरन
चलता रहे, यही समाधि है.
Wednesday, October 17, 2012
घड़ी घड़ी में बरसे अमृत
सितंबर २००३
मन यदि समता में रहे,
एकाग्र हो, शांत हो, निरपेक्ष हो तो जाग्रत अवस्था भी समाधि बन जाती है. ध्यान तब
करना नहीं पड़ता, अपने आप ही होता रहता है. जगत को जैसा यह है वैसा ही देखने की समझ
आ जाती है. रस्सी को तब सांप नहीं देखते. अपने आस-पास के वातावरण के प्रति सजग रहकर
हम स्वार्थहीन जीवन जीते हैं. हमारा चित्त इतना विशाल हो जाता है कि सभी के
स्वार्थ हमारे स्वार्थ में बदल जाते हैं. बल्कि सभी कुछ सहज ही होने लगता है. भेद
दृष्टि नहीं रहती, सभी व्यक्तियों, वस्तुओं, परिस्थितियों के पीछे एक ही तत्व के दर्शन
होते हैं, वही एक हम हैं, वही एक वह है, तब कैसी स्थिरता का अनुभव होता है.
मृत्यु, जन्म, बुढ़ापा, रोग भी तब अपना अर्थ बदल लेते हैं. हम शोक-रोग, राग-द्वेष
के भोक्ता न रहें तो यह हम पर असर नहीं डाल सकते. मन यदि संयमित हो तभी
सुखों-दुखों के जाल से बच सकता है, वरना तो हर कदम पर ठोकर खानी पड़ेगी. श्रेय और
प्रेय से चुनाव का मौका प्रकृति हमें हर पल देती है, हम अधिकतर प्रेय को चुनते
हैं, तात्कालिक सुख के लिए दीर्घकालिक सुख को भुला देते हैं, बाद में वही
तात्कालिक सुख, दुःख में बदल जाता है. सारा जीवन इसी तरह बीत जाता है. सजग होकर
देखें तो हर क्षण आनंद का अनुभव के लिए है, हर श्वास उसी का नाम लेने के लिए है.
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