हम चिंता तो करते हैं पर चिंतन से घबराते हैं, ऐसे चिंतन से जो हमें हमारे भीतर की कमियों को दिखाए. हम उस दर्पण में देखना नहीं चाहते जो हमें वैसा ही दिखलाये जैसे हम वास्तव में हैं। जो हम जानते हैं वह सरल है पर उसी को पढ़ते-गुनते रहना ही तो हमें आगे बढने से रोकता है. जब कोई हमें अपमानित करता है तब वह हमारा दर्पण होता है, हमरी प्रतिक्रिया से ज़ाहिर होता है कि हमारे भीतर कितनी समता आयी है। प्रभु से प्रार्थना है कि वह उसे हमारे निकट रखे ताकि हम वही न रहते रहें जो हैं बल्कि बेहतर बनें. स्वयं की प्रगति ही जगत की प्रगति का आधार है, हम भी तो इस जगत का ही भाग हैं. हम यानि, देह, मन, बुद्धि, आत्मा तो पूर्ण है उसी को लक्ष्य करके आगे बढ़ना है. उसी की ओर चलना है चलने की शक्ति भी उसी से लेनी है. आत्मा हमारी निकटतम है हमारी बुद्धि यदि उसका आश्रय ले तो वह उसे सक्षम बनाती है अन्यथा उद्दंड हो जाती है. आत्मा का आश्रित होने से मन भी फलता फूलता है, प्रफ्फुलित मन जब जगत के साथ व्यवहार करता है तो कृपणता नहीं दिखाता समृद्धि फैलाता है. जीवन तब एक शांत जलधारा की तरह आगे बढ़ता जाता है. तटों को हर-भरा करता हुआ, प्यासों की प्यास बुझाता हुआ, शीतलता प्रदान करता हुआ, जीवन स्वयं में एक बेशकीमती उपहार है, उपहार को सहेजना भी तो है.
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Monday, January 23, 2023
Saturday, March 21, 2020
डट कर करें सामना सब मिल
जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब एकाएक सब कुछ बदल जाता है, आज यह घटना किसी एक के साथ नहीं सबके साथ घटी है, जी हाँ, सारे विश्व में हरेक के साथ. विकसित हो या अविकसित कोई देश इससे बचा नहीं है, अमीर या गरीब, लोकतंत्र या राजतन्त्र, छोटा या बड़ा, डॉक्टर या मरीज, जवान या वृद्ध कोई भी कोरोना वायरस के भय से बचा नहीं है. आज हम सबको एक परीक्षा का सामना करना है, मानव ने जीवन को, स्वास्थ्य को, अपने होने को अपना अधिकार मान लिया था, आज उसकी कीमत चुकानी है. हमें अगले कुछ सप्ताहों तक घरों से बाहर नहीं निकलना है, अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करना है, ताकि आर्थिक मंदी का असर न हो, साथ ही हम उन लोगों की कुछ मदद कर सकें जो प्रतिदिन कमाते हैं और जिनका रोजगार इस बंदी के कारण खत्म हो गया है. हमें मानसिक रूप से सबल रहना है चाहे कितना ही लंबा समय हमें इस तरह गुजारना पड़े. योग, ध्यान, संगीत, पुस्तकों का अध्ययन और सकारात्मक चिंतन हमें स्वस्थ रहने में बहुत मदद कर सकते हैं. चीन में काफी हद तक कोरोना पर काबू पा लिया गया है, यदि हम भी सरकार व डॉक्टरों की हिदायतों का पालन करेंगे तो शीघ्र ही स्थिति में सुधार होगा.
Wednesday, March 18, 2020
जिस पल चेतेगा मानव
अखबारों में जिस खबर को हेडलाइन बनाया जा रहा है टीवी पर वही ब्रेकिंग न्यूज है, सोशल मीडिया पर जिसे प्रमुखता दी जा रही है फोन पर चर्चा का भी वही विषय है. अपने अब तक के जीवन में ऐसा न कभी देखा न सुना, जब एक न दिखने वाले दुश्मन से डर कर लोग घरों में बन्द हो गए हों. जो सक्षम हैं वे कुछ हफ्ते घर में बन्द रहकर भी आराम से समय बिता सकते हैं पर जिनका जीवन दैनिक रोजगार पर आधारित हो, वे काम न मिलने से कितने प्रभावित हो रहे होंगे. क्या आज यह सोचने की जरूरत नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ, क्या यह मानव की नियति है अथवा उसके किसी कर्म का फल. महामारियां पहले भी फैलती रही हैं जब इलाज की इतनी सुविधाएँ नहीं थीं पर विज्ञान के इस युग में मानव का इस तरह विवश हो जाना कई गहरे प्रश्न उठाता है. आज नहीं कल कोरोना का इलाज ढूंढ लिया जायेगा और जल्दी ही यह भय का वातावरण खत्म हो जायेगा, किन्तु उन प्रश्नों के हल तलाशना फिर भी जरूरी है. मानव ने जंगलों को काटकर बस्तियां बनायीं,शाक-सब्जी, फल, दूध होते हुए भी जीव हत्या करके अपनी क्षुधा मिटाई. फैशन के लिए और अपनी शक्ति के प्रदर्शन के लिए भी निरीह पशुओं की हत्याएँ कीं. धरती का अनियमित दोहन किया, जल व हवा को दूषित किया, इतना करके भी स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझकर कभी इन बातों के लिए स्वयं को दोषी नहीं माना, बल्कि विकास के नाम पर इन्हें बढ़ावा ही दिया. मनोरंजन के लिए लाखों लुटाने वाले जब यह भूल जाते हों कि उनके ही पड़ोस में कोई भूखा सोने को विवश है, उच्च शिक्षा के लिए करोड़ों देकर दाखिला लेने वाले जब यह न देखते हों कि किसी असमर्थ पर कुशाग्र विद्यार्थी की एक सीट वे ले रहे हैं. जब इतना अन्याय होता हो तो प्रकृति भी दूषित हो जाये इसमें क्या अस्वाभाविक है. काम, क्रोध, लोभ, हिंसा और अत्याचार के परमाणु जब वातावरण में बढ़ जाते हैं तो प्रकृति में हलचल होती है. आज लोग घरों में बैठे हैं तो कुछ चिंतन भी करते होंगे, सजगतापूर्वक कुछ समय स्वयं के साथ बिताकर हम अपने जीवन की नई दिशा के बारे में निर्णय ले सकते हैं. हमारा जीवन इस सुंदर ग्रह के लिए एक वरदान बने, हम इसके पोषक हों, शोषक नहीं.
Saturday, December 7, 2013
तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो
हम जिसका चिंतन करते हैं
वैसे ही हो जाते हैं. यदि हम कृष्ण का चिन्तन करते हैं तो धीरे-धीरे उसके गुणों को
धारण करने लगते हैं. कृष्ण को सात्विक भोजन पसंद था, पसंद है और पसंद रहेगा, उसे
संगीत से प्रेम है, वह निडर है, प्रेमी है, नटखट है, विनोदी है, वह सुन्दरता का
सिरमौर है. वह क्या नहीं है, ऐसा होने पर भी हमसे दूर नहीं जाता, निकटस्थ है,
भक्तों के हृदय में स्वयं को प्रकट कर देता है. वह आत्मा का सखा है, गुणात्मक रूप
से आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं. मन व बुद्धि सीमित हैं जो उसे नहीं जान पाते,
लेकिन मन द्वारा किया गया उसका चिन्तन मन को शुद्ध बनाता है, शुद्ध मन में आत्मा
की झलक मिलती है. तब मानव यह जानने लगता है जो दिख रहा है वह अस्थिर है, जो अदृश्य
है वही वास्तविक है. आत्मा की ही सत्ता से मन व बुद्धि कार्य कर रहे हैं, प्रमुख
वही है और यह आत्मा, परमात्मा का अंश है सो सभी कुछ उसी का ही हुआ !
Monday, August 26, 2013
चलें मूल की ओर
जनवरी २००५
हमें चिंता से चिन्तन की ओर जाना है,
चिंता नश्वर की होती है, चिन्तन शाश्वत का होता है. अपने भीतर छिपे उस तत्व को
प्रकट करना है. देह जड़ है, मन, बुद्धि भी जड़ है जड़ का चिन्तन हमें जड़ बना देता है,
संवेदनशीलता खो जाती है, बुराई के प्रति हम आँख मूंद लेते हैं. चेतन का चिन्तन सदा
प्रकाश से भर देता है, आगे बढ़ने की एक ललक, एक प्यास, एक तड़प, एक अग्नि भीतर जलती
रहती है. उसी के प्रकाश से फिर जड़ भी दिव्यता को प्राप्त हो जाता है. मन भावों को
जन्म देता है, भीतर एक गीलापन उगता है, जो हमें अपने मूल स्वभाव की ओर ले जाता है.
Monday, January 7, 2013
धर्म वही जो धारण करें
जनवरी २००४
धर्म का पालन करने के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का विकास भी होना चाहिए, हमारी
संवेदनशीलता भी कम न हो, धर्म का मात्र बाहरी रूप ही न बढ़े बल्कि आंतरिक रूप
विकसित होना चाहिए. धर्म का पहला लक्षण ही है नैतिकता, ईमानदारी तथा सच्चाई ! हम
अपनी आत्मा पर पहले ही कई धब्बे लगा चुके हैं अब धर्म के नाम पर तो उस पर नया
धब्बा न लगे क्योंकि दम्भ के समान दूसरा कोई पाप नहीं, हम अध्यात्म के अधिकारी तभी
हो सकते हैं जब हमारा मन संवेदना से भरा हो, ज्ञान, भक्ति व कर्म का समन्वय ही
हमें इस मार्ग पर आगे ले जा सकता है. नियमित साधना, पल-पल सजगता हमें अवांछित
विचारों तथा भावों को मन में जड़ें जमाने से रोकेगी. धर्म वही सही है जो व्यवहार
में उतरे वरना वह मनोविलास ही होगा. कथन, चिंतन और कर्म में समानता, हर कार्य में सौ
प्रतिशत प्रयास ही हमें प्रगति की ओर ले जायेगा.
Monday, November 19, 2012
सजग रहे जो दुःख से छूटे
अक्टूबर २००३
हर तरह की वेदना से
मुक्ति के उपाय की खोज, बोधि तथा समाधि की प्राप्ति साधक का लक्ष्य है. उपाय की
खोज ही बोधि है. चित्त की निर्मलता ही समाधि है. अपनी भूलों पर वेदना होती है तो
हमारी सजगता बढ़ती है. दुःख हमें सिखाता है, क्रोध, मोह, प्रमाद, आलस्य हमारे ताप
को बढ़ाते हैं. सजगता ही जिसकी एकमात्र औषधि है. थोड़ी सी भी असावधानी हमें वेदना
देती है वही वेदना फिर सजग करती है. वाणी का संयम नहीं सधता तो मुख से कठोर शब्द
निकल जाते हैं. जिह्वा का संयम नहीं सधता तो हम अखाद्य भी खा लेते हैं. मन का संयम
नहीं रहा तो व्यर्थ का चिंतन चलता रहता है. मन जब खाली हो तो सुमिरन स्वतः होता है
जबकि चिंतन बलपूर्वक करना होता है. हमारा हृदय इतना शुद्ध हो कि वहाँ नित्य सुमिरन
चलता रहे, यही समाधि है.
Saturday, January 7, 2012
गहन मौन
सद्ग्रन्थों का अध्ययन हमें उन्नत करता है. सद्विचार हमारे मन को महकाते हैं. भावों के गुलाब जब हृदय के बगीचे में खिलते हैं तो आसपास सब कुछ महकने लगता है. चेहरे पर मुस्कुराहट हो और आँखों से ही अपनी बात कहने की कला आ जाये, वाणी खामोश हो और मन का चितन भी शांत हो. न बाहर से शब्दों को ग्रहण करें और न ही भीतर से सम्प्रेषण ...गहन मौन में ही परम सत्ता का वास है.
Thursday, July 21, 2011
दर्शन
अप्रैल २००१
हमारे कर्म यदि हमारे अहंकार का पोषण करने वाले होंगे तो मुक्ति का ख्याल भी दिल से निकाल देना होगा. हम मनसा, वाचा कर्मणा जो कुछ भी करें सभी अंतरात्मा की प्रसन्नता हेतु हों न कि अहं को संतुष्ट करने के लिये. तभी हमारा जीवन उस महान सूत्रधार का प्रतिबिम्ब बनेगा. अपनी संवेदना को तीव्रतर करते हुए भावनाओं को पुष्ट करते हुए तथा चिंतन को गहन करते हुए एक दर्शन तलाशना होगा जो हमें अध्यात्म मार्ग पर ले जायेगा, जो भीतर से उपजेगा वही सार्थक होगा, सुंदर भी और वही शाश्वत भी.
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