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Tuesday, January 6, 2015

एक प्रकाश छिपा है भीतर

अगस्त २००७ 
सद्गुरु तो एक पल में झोली भर देता है, हमारे भीतर जिज्ञासा तीव्र होनी चाहिए ! जब गुरुकृपा से भीतर परमात्मा प्रकट हो जाता है तो हर पल, हर घड़ी साधक प्रकाशमान हो जाते हैं, रहते हैं. हर घटना तब शुभ ही होती है, तब बाहरी वातावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जिधर भी देखें परमात्मा ही नजर आता है, मन जैसे खो जाता है, अहम विगलित हो जाता है, भीतर कुछ द्रवित होता है, सारा ठोसपना खत्म हो जाता है. प्रेम का अनुभव होता है तो सारा जगत एक उसी का रूप दिखाई देता है. भीतर-बाहर एक ही सत्ता का दर्शन होता है, वह दर्शन चौबीस घंटे होता है. अब न कोई दिन है न रात है. आज हुई न कल है, न स्थान न समय के सापेक्ष है वह दर्शन. वह तो गुरू का प्रसाद है, एक जगी हुई आत्मा ही दूसरी आत्मा को जगा सकती है. एक जला हुआ दीपक ही दूसरी ज्योति जल सकता है. जब मन शुद्ध होता है तो परमात्मा उस मन का हरण कर लेता है, उसे परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं भाता और उसे खोजने निकल पड़ता है. सद्गुरु ऐसे में परमात्मा के दूत बनकर आते हैं और भीतर ही उस तत्व का दर्शन करा देते हैं ! सद्गुरु के रूप में परमात्मा ही आते हैं. एक ही चेतना है, वही तो सबके भीतर भी है. !



Sunday, November 25, 2012

तमाम दुनिया है खेल उसका


वह एक ही है जो सृष्टि के कण-कण में समाया है, तमाम दुनिया है खेल उसका, वह खेल सबको खिला रहा है. जो ऐसा जानता है वह सभी जगह उसी का दर्शन करता है. वह स्वयं जिस तरह स्वप्न में सृष्टि रचता है, उसी तरह इस जगत को स्वप्नवत ही जानता है, तभी वह उसमें फंसता नहीं है, अलिप्त रहता है. सम्पूर्ण सृष्टि रसमय है, पंचभूत भी रसमय हैं तो हम मानव ही क्यों रसविहीन जीवन व्यतीत करें, जबकि हम उन्हीं का अंश हैं. कृष्ण ने हमें वचन दिया है कि वह हमारे कुशल-क्षेम की रक्षा करेंगे. जो उसके निकट आता है वह उसे शक्ति से पूरित करता है. वह जीवनदाता है और जीवन को चलाने वाला भी है. वह हमारे पल-पल की खबर रखता है, वह लीला रचता है एक से अनेक होता है. संतों के रूप में आकर वही मानवों की सुप्त चेतना को जगाता है. वह प्रेम करता है और प्रेम चाहता है. जो आत्मस्थित है वही असली खिलाड़ी है. भक्ति और श्रद्धा के पंख लगाकर हम आत्मा के आकाश में विचरण कर सकते हैं. किनारे पर बैठकर लहरें गिनने की बजाय आत्मा के सागर में गहरे उतरना होगा तभी मोती मिलेंगे. जो किनारे पर रहते हैं उन्हें बार-बार आना पड़ता है, वे किये हुए को पुनः पुन करते हैं सीखे हुए को पुनः सीखते हैं. 



प्रिय मित्रों,  मैं बनारस व बैंगलोर की यात्रा पर जा रही हूँ, अब दिसंबर के तीसरे सप्ताह में मुलाकात होगी. आने वाले वर्ष के लिए तथा क्रिसमस के लिए अग्रिम शुभकामनायें...

Friday, August 24, 2012

कल कल छल छल बहती वाणी


जुलाई २००३ 
संतों ने यूँ ही नहीं कहा है कि मानव जन्म दुर्लभ है, और उससे भी दुर्लभ है सत्य को जानने की जिज्ञासा. दुःख से मुक्त होना तो सभी चाहते हैं पर सारा दुःख असत्य के कारण है इस सत्य से आँखें चुराए रहते हैं, न तो दुःख दूर होते हैं न सत्य की मीठी छाँव का ही अनुभव कर पाते हैं. जिसे संतों का सत्संग मिलता है उससे बढ़कर भाग्यशाली कौन हो सकता है. अमृत के समान मीठे वचन जिसके अंतः करण को स्वच्छ करते हैं, निरंतर गिरती जलधार की तरह संतों की वाणी कानों से होती हुई मन तक पहुंचती है, मन झोली फैलाये तत्पर रहता है और उन मोतियों को एकत्र करता है. दुःख की आग में जलते हुए मानवों पर उनकी वाणी शीतल फुहार बन कर बरसती है. वे सत्यद्रष्टा हैं और प्रेम तथा करुणा वश वे हम सभी को उसका दर्शन कराना चाहते हैं. वे जीवन को उत्सव बनाने के मार्ग के बारे में सरल शब्दों में बताते हैं. ज्ञान के प्रति, प्रेम के प्रति उनके मन में कितनी ललक है, वही ललक हमारे भीतर उठे, स्वर्ण मृग की तरह व्यर्थ की कामनाएं हमारे जिस मन को अपने पीछे लगाये रहती हैं, वह मन मर्यादा में रहना सीखे.

Friday, June 15, 2012

ध्यान जागरण है


ध्यान में साधक को जो भी अनुभव होता है उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है, यदि कर भी दें तो बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं होगी. ऐसे मन के भाव व्यक्त हों भी कैसे, जो मन छोटा न रहकर बड़ा हो गया हो, सारा ब्रह्मांड उसी की सत्ता प्रतीत होता हो और इस नाते संसार के सारे प्राणियों के प्रति प्रेम छलकता हो, जहाँ जड़ में भी उसी के दर्शन होते हों. जो आँख बंद करने पर भी और आँख खोलने पर भी एक सा प्रकट होता हो. जो बिना कानों के सुन सकता हो, ऐसे मन की बात को शब्द कहाँ तक पकड़ पाएंगे. वह तो सिर्फ भीतर महसूस किया जा सकता है. ऐसा क्षण जब कुछ भी पाना नहीं होता कुछ छोड़ना भी नहीं, जो सहज रूप में प्राप्त है उसे पूरे होश से स्वीकारना. यहाँ जो कुछ भी है सब उसी का है, जो वह है, वही तुम हो, दोनों एक हैं, पूर्ण मुक्ति का अहसास तभी होता है. जब मन निर्वासनिक हो जाता है. और कोई चाहे भी क्या? कौन किसे चाहे?, क्या चाहे?, जब सब कुछ एक ही है. संत ठीक कहते हैं ज्ञानी हजार शरीरों से भोगता है.वह हरेक के भीतर एकमात्र उसी चैतन्य को देखता है, वह जहाँ भी जाता है, पूरा जाता है जो भी करता है पूरा करता है. उसके अंतर की ऊर्जा एक बिंदु पर केंद्रित होती है, वह मन को आत्मा में विलीन कर देता है.


Thursday, July 21, 2011

दर्शन


अप्रैल २००१ 

हमारे कर्म यदि हमारे अहंकार का पोषण करने वाले होंगे तो मुक्ति का ख्याल भी दिल से निकाल देना होगा. हम मनसा, वाचा कर्मणा जो कुछ भी करें सभी अंतरात्मा की प्रसन्नता हेतु हों न कि अहं को संतुष्ट करने के लिये. तभी हमारा जीवन उस महान सूत्रधार का प्रतिबिम्ब बनेगा. अपनी संवेदना को तीव्रतर करते हुए भावनाओं को पुष्ट करते हुए तथा चिंतन को गहन करते हुए एक दर्शन तलाशना होगा जो हमें अध्यात्म मार्ग पर ले जायेगा, जो भीतर से उपजेगा वही सार्थक होगा, सुंदर भी और  वही शाश्वत भी.

Saturday, July 9, 2011

जीवन और मृत्यु

लहरें सागर में जन्मती हैं, रहती हैं और नष्ट होती हैं, पर उन्हें इसका भान नहीं होता, ऐसे ही हम ईश्वर में जन्मते, रहते और नष्ट होते हैं, हमें अपने अस्तित्त्व का भान अपने जीवित रहने का भान मृत्यु के समय होता है. जीवन भर हम मृतकों के समान जीते रहते हैं, एक बेहोशी की हालत में. तभी हमें अपने भीतर रहने वाले ईश्वर के दर्शन नहीं होते. हम हर पल बाहर की ओर भाग रहे हैं, और फिर एकाएक मौत का परवाना आ जाता है, तब पीछे मुडकर देखने का वक्त भी नहीं होता. हम समय रहते जाग सकते हैं, इसके लिये मन के द्वार को झाड़-बुहार कर उस पाहुने की प्रतीक्षा करनी होगी जो आने के लिये स्वयं ही प्रतीक्षा कर रहा है.