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Friday, September 26, 2014

हाथ बढ़ाकर ले लें उसको

मार्च २००७ 
सन्त कहते हैं, हमें क्रियाशीलता में मौन ढूँढना है और मौन में क्रिया ! हमें निर्दोषता में बुद्धि की पराकाष्ठता तक पहुंचना है और बुद्धि को भोलेपन में बदलना है. हम सहज हों पर भीतर ज्ञान से भरे हों. ज्ञान कहीं अहंकार से न भर दे. ऐसा ज्ञान जो हमें सहज बनाता है, जो बताता है कि ऐसा बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते, बल्कि हम कुछ भी नहीं जानते, ऐसा ज्ञान हमें मुक्त कर देता है. ऐसा ज्ञान जो हमारी बेहोशी को तोड़ दे, हमारी बेहोशी जाने कितनी गहरी है पर जैसे एक दिया हजारों साल के अंधकार को पल भर में दूर कर देता है ऐसे ही गुरु के ज्ञान का दीया अपने आलोक से हमें प्रकाशित करता है. वे कहते हैं परमात्मा का प्रेम हमें सहज ही प्राप्त है. हाथ बढ़ाकर बस उसे स्वीकारें, कोई पदार्थ या क्रिया उसे हमें नहीं दिला सकती. वह अनमोल प्रेम तो बस गुरु कृपा से ही मिलता है. उनकी चेतना शुद्ध हो चुकी है, वह परमात्मा से जुड़े हैं और बाँट रहे हैं.. दिनरात.. प्रेम का प्रसाद !

Thursday, July 4, 2013

गीत जागरण के गाने हैं

अक्तूबर २००४ 
इस जगत में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियों का सामना हमें करना पड़ जाता है, जिसकी कभी कल्पना भी हमने नहीं की होती, जीवन में कभी-कभी अप्रत्याशित भी घट जाता है, हम बेखबर से राह पर चले जा रहे हैं कि अचानक एक गहरी खाई सम्मुख आ जाती है. यह बेखबरी, यह बेहोशी ही साधना की सबसे बड़ी शत्रु है. एक साधक को पल-पल सचेत रहना है, आने वाले दुखों को भी जो टाल दे वही साधना है. वचन, कर्म तथा विचारों के प्रति निरंतर सजग रहकर ही साधक सदा किसी भी परिस्थिति का सामना समता से कर सकता है, वरना संसार कब उसे घेर लेता है, तृष्णा कब उसे लील जाती है, पता ही नहीं चलता. असावधानी वश कोई ऐसा वचन मुख से निकल जाता है जिस पर बाद में सिवा पछताने के कुछ हाथ नहीं लगता. सूक्ष्म अहंकार, लोभ, तथा इच्छाएं हम पर तभी आक्रमण करती हैं जब हम असावधान होकर जीते हैं. मुक्ति के गीत गाता हमारा मन तब स्वयं को पिंजड़े में बंद पंछी की तरह फड़फड़ाता नजर आता है, पानी बिना मछली की भांति छटपटाता नजर आता है. बंधन उसे पसंद नहीं, जो एक बार मुक्ति का स्वाद चख चुका हो बंधन उसे कैसे भायेगा. जिसने खुले आकाश की उड़न भरी हो वह बंधन में आंसू ही बहा सकता है. मुक्त मन ही भक्ति का अधिकारी है और मुक्त मन ही कृपा का भी अधिकारी है. जब जब हम अचेत होते हैं तब-तब ही बंधन में पड़ जाते हैं, हम भुलावे में न रहें यही प्रार्थना हमें हर क्षण करनी है.  


Wednesday, November 7, 2012

एक तू जो मिला...सारी दुनिया मिली


अक्तूबर २००३ 
संत कहते हैं कि उन्हें और हमें काम ईश्वर से ही होना चाहिए, जगत यदि रूठता है तो रूठने दें. ईश्वर को भुलाकर जगत को प्रसन्न करने में लगे रहे तो वक्त हाथ से निकलता ही जायेगा, सिर पर न जाने कितने-कितने विचारों, मान्यताओं और आकाँक्षाओं का बोझ हम ढोते आ रहे हैं, एक अथाह सागर है हमारा मन. जिसका मंथन करो तो कितना कुछ ऊपर आता है, अमृत की एक बूंद पाने से पहले व्यर्थ का कचरा ही मिलता है. हमें स्वयं ही पता नहीं चलता कि अगले पल मन में कुछ देखकर या सुनकर क्या आने वाला है, कैसी बेहोशी में हम जीते हैं. वातावरण का भी असर होता है और भोजन का भी. ज्ञान ही हमें इससे मुक्त कर सकता है. मन रूपी अश्व की लगाम पकड़ना ही सत्संग है, यदि हम मन रूपी अश्व की पूंछ पकड़ते हैं तो कष्ट सहने पड़ते हैं, अभी हम अश्व की पूंछ पकड़े हुए हैं, संत लगाम पकड़ते हैं, उनका अनुसरण करें तो यात्रा कितनी सहज हो जाती है.

Saturday, July 9, 2011

जीवन और मृत्यु

लहरें सागर में जन्मती हैं, रहती हैं और नष्ट होती हैं, पर उन्हें इसका भान नहीं होता, ऐसे ही हम ईश्वर में जन्मते, रहते और नष्ट होते हैं, हमें अपने अस्तित्त्व का भान अपने जीवित रहने का भान मृत्यु के समय होता है. जीवन भर हम मृतकों के समान जीते रहते हैं, एक बेहोशी की हालत में. तभी हमें अपने भीतर रहने वाले ईश्वर के दर्शन नहीं होते. हम हर पल बाहर की ओर भाग रहे हैं, और फिर एकाएक मौत का परवाना आ जाता है, तब पीछे मुडकर देखने का वक्त भी नहीं होता. हम समय रहते जाग सकते हैं, इसके लिये मन के द्वार को झाड़-बुहार कर उस पाहुने की प्रतीक्षा करनी होगी जो आने के लिये स्वयं ही प्रतीक्षा कर रहा है.