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Tuesday, July 19, 2016

बिन गुरू ज्ञान न होए

१९ जुलाई २०१६ 
सद्गुरु कहते हैं जीवन गुरूतत्व से सदा ही घिरा है. गुरु ज्ञान का ही दूसरा नाम है. अपने जीवन पर प्रकाश डालकर हमें ज्ञान का सम्मान करना है, अर्थात सही-गलत का भेद जानकर जीवन में आने वाले दुखों से सीखकर ज्ञान को धारण करना है, ताकि पुनः वे दुःख न झेलने पड़ें. मन ही माया को रचता है और अपने बनाये हुए लेंस से दुनिया को देखता है. साधक वह है जो कोई आग्रह नहीं रखता न ही प्रदर्शन करता है. देने वाला दिए जा रहा है, झोली भरती ही जाती है. हमें वाणी का वरदान भी मिला है और मेधा भी बांटी है उसने. यदि उसे सेवा में लगायें जीवन तब सार्थक होता जाता है. भक्ति और कृतज्ञता के भाव पुष्प जब भीतर खिलते हैं, मन चन्द्रमा सा खिल जाता है, गुरु पूर्णिमा तब मनती है. 

Wednesday, July 8, 2015

जागो....जागो रे

मई २०१० 
परमात्मा हर वक्त हमारे साथ है, सद्गुरु हर क्षण हमारे साथ है, आत्मा हर पल हमारे साथ है. वे कितने-कितने उपायों से हमें संदेश भेजते हैं, कितने उपाय करते हैं कि हमें ख़ुशी मिले, ऐसी ख़ुशी जो वास्तविक है, जो हमारे भीतर से आई है. वे इसके लिए कभी-कभी हमें दंड भी देते हैं. बाहर जब सुबह का सूर्य उगा हो, शीतल सुगन्धित पवन बह रही हो, पंछियों का मधुर गुंजार हो रहा हो, ऐसे में कोई बच्चा स्वप्न में रो रहा हो तो कौन माँ उसे झिंझोड़ कर जगा न देगी, वह उसे प्रसन्नता देना चाहती है. ऐसे ही परमात्मा हमें जगाते हैं, कष्ट भेजकर वह कहते हैं जो तुम्हारा मार्ग था वह सही नहीं था, देखो ऐसे जीओ.  

Friday, January 23, 2015

तू ही है जमीं तू ही आसमां

2007 
हम ईश्वर का ध्यान तभी तो कर सकते हैं जब हम उसे पहचान लें, उसकी पहचान तो सद्गुरु ही कराते हैं और एक बार उसकी पहचान हो जाये तो फिर कभी वह ध्यान से उतरता नहीं है. पहला परिचय खुद का होता है और तब लगता है जिन्हें हम दो मान रहे थे वे दो थे ही नहीं, एक ही सत्ता थी, वही आत्मा, वही परमात्मा, वही सद्गुरु वही संसार ! कहीं कोई भेद नहीं, किसी को भी छोड़ना नहीं ! जो भी सहज प्राप्य हो, हितकर हो, मंगलमय हो, इस जगत के लिए और स्वयं के लिए शुभ हो वही धारण करने योग्य है. तब सारे संशय भीतर से दूर हो जाते हैं, अंतर्मन खाली हो जाता है. कोई आग्रह नहीं, कोई चाह भी नहीं, जैसे नन्हा बालक सहज प्रेरणाओं पर जीता हुआ, अस्तित्व तब माँ हो जाता है, ब्रह्मांड पिता होता है. सारे वृक्ष, पर्वत, आकाश तब सखा हो जाते हैं और सारे लोग भी एक अनाम बंधन में बंधे अपने ही लगते हैं !

Tuesday, January 6, 2015

एक प्रकाश छिपा है भीतर

अगस्त २००७ 
सद्गुरु तो एक पल में झोली भर देता है, हमारे भीतर जिज्ञासा तीव्र होनी चाहिए ! जब गुरुकृपा से भीतर परमात्मा प्रकट हो जाता है तो हर पल, हर घड़ी साधक प्रकाशमान हो जाते हैं, रहते हैं. हर घटना तब शुभ ही होती है, तब बाहरी वातावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जिधर भी देखें परमात्मा ही नजर आता है, मन जैसे खो जाता है, अहम विगलित हो जाता है, भीतर कुछ द्रवित होता है, सारा ठोसपना खत्म हो जाता है. प्रेम का अनुभव होता है तो सारा जगत एक उसी का रूप दिखाई देता है. भीतर-बाहर एक ही सत्ता का दर्शन होता है, वह दर्शन चौबीस घंटे होता है. अब न कोई दिन है न रात है. आज हुई न कल है, न स्थान न समय के सापेक्ष है वह दर्शन. वह तो गुरू का प्रसाद है, एक जगी हुई आत्मा ही दूसरी आत्मा को जगा सकती है. एक जला हुआ दीपक ही दूसरी ज्योति जल सकता है. जब मन शुद्ध होता है तो परमात्मा उस मन का हरण कर लेता है, उसे परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं भाता और उसे खोजने निकल पड़ता है. सद्गुरु ऐसे में परमात्मा के दूत बनकर आते हैं और भीतर ही उस तत्व का दर्शन करा देते हैं ! सद्गुरु के रूप में परमात्मा ही आते हैं. एक ही चेतना है, वही तो सबके भीतर भी है. !



Monday, January 5, 2015

मिटकर ही जीवन खिलता है

अगस्त २००७ 
मैं निर्गुणिया गुण नहीं जाना
एक धनी के हाथ बिकाना
मैं कायर मेरा सद्गुरु सूरा
मैं ओछा मेरा सद्गुरु पूरा
मैं मूरख सद्गुरु सयाना
एक धनी के हाथ बिकाना

जब तक साधक अपनी सारी वृत्तियों को इष्ट के चरणों पर विलीन नहीं कर देता तब तक जीवन में विशेषता नहीं होती. एक बार अन्न का दाना अंधकार में दब जाता है तो हजार गुना होकर वापस आता है. समर्पण इसी को कहते हैं, जो वह करवाए वही करना. जो वह चाहे उसी में हाँ मिलानी ही सच्चा समर्पण है. सद्गुरु को जब साधक समर्पित हो जाते हैं तो जीवन से सारा विषाद चला जाता है. इसके बाद तो केवल भगवान ही भगवान जीवन में रहते हैं ! नया दृष्टिकोण, नई विचार धारा, नया जीवन मिलता है ! उसे भीतर से रस मिल जाता है और वह एकाग्र हो जाता है ! यही एकाग्रता फिर सजगता में बदलती है और सजगता ही ध्यान है, सुरत है, प्रेम है, भक्ति है, ज्ञान है ! 

Sunday, December 14, 2014

भीतर बाहर एक वही तो

जुलाई २००७ 
भक्ति का आरम्भ वहाँ है जहाँ हमें ईश्वर में जगत दिखता है और चरम वह है जहाँ जगत में ईश्वर दिखता है. पहले पहल ईश्वर के दर्शन हमें अपने भीतर होते हैं, फिर सबके भीतर उसी के दर्शन होते हैं. ईश्वर कण-कण में है पर प्रेम से उसका प्राकट्य होता है. सद्गुरु हमें वह दृष्टि प्रदान करते हैं जिससे हम परम सत्ता में विश्वास करने लगते हैं. ईश्वर का हम पर कितना उपकार है यह तो कोई सद्गुरु ही जानता है और बखान करता है. शब्दों की फिर भी कमी पड़ जाये ऐसा वह परमात्मा आनंद का सागर है. 

Sunday, November 16, 2014

कहत कबीर सुनो भई साधो

अप्रैल २००७ 
सद्गुरू हमें वाणी के द्वारा ज्ञान देते हैं, सही-सोच बनाने में सहायता करते हैं. एक साधक को चेतना के विकास के लिए श्रवण करना चाहिए. शास्त्रों को सुनने से जीवन में सुखद परिवर्तन आता है. अच्छा सुनना साधना की पहली सीढ़ी है. नितांत एकांत में भी हम सुनते हैं, प्रकृति से भी हम सुनते हैं. भद्र सुनने से हम भद्रता को संग्रहित करते हैं, अपने को सही रखना सीखते हैं. निर्विषयता, निर्विकारता तभी आती है, भ्रम और भय से मुक्ति मिलती है, जब हम सही सुनते हैं. जीवन में रस तभी आता है, उत्साह आता है, हमारा चिन्तन सकारात्मक होता है, मोह नष्ट होता है और अपने स्वरूप की झलक मिलती है, बोध जगता है. वाणी भगवान का बीज है, जो समय आने पर भक्ति का वृक्ष बनता है. जिसमें प्रेम के सुंदर फल लगते हैं, उन फलों में सेवा की मिठास होती है. चेतना को संकीर्णता से ऊपर उठाकर परमात्मा के निकट ले जाना सीखते हैं जो उस पर कृपा का जल बरसाते हैं, ज्ञान की खाद देते हैं और हृदय सुंदर भावनाओं का उपवन बन जाता है, वहाँ जाकर मन को विश्राम मिलता है, बुद्धि भी वहाँ शांत होकर सजगता को प्राप्त होती है.


Wednesday, October 29, 2014

बलिहारी गुरू आपने

अप्रैल २००७ 
सद्गुरु में ज्ञान की सुगंध होती है जो हमें अपनी ओर खींचती है. उसमें प्रेम की आध्यात्मिक सुरभि होती है जो हमें आकर्षित करती है. एक पवित्र गंध ईश्वर की याद का साधन होती है. जो रब की याद दिलाये उसका विश्वास कराए, जिसे देखकर सिर अपने आप झुक जाये. वही तो सद्गुरु होता है. सद्गुरु हमें अनंत की ओर ले जाता है, वह सारी सीमाएं तोड़कर असीम को जानने का, उसे पाने का निमन्त्रण देता है ! तन पवित्र हो, स्वच्छ हो, स्वस्थ हो, मन निर्द्वन्द्व  हो, निर्भार हो तभी आत्मा अपने पूर्ण रूप में भीतर प्रकट होती है. आत्मा का स्वभाव है आनंद, प्रसन्नता और प्रेम ! वह शांति की सुगंध समोए है जो रह रहकर रिसती है, पर जब न तो तन के स्वास्थ्य का ध्यान हो न मन सजदे में झुका हो तो आत्मा भीतर कैद ही रह जाती है और हम जीवन भर दुर्गन्ध का शिकार होते रहते हैं. ईर्ष्या से जलता हुआ, क्रोध और अहंकार से ग्रसित मन सिवाय दुर्गन्ध के क्या दे सकता है, भीतर यदि प्रेम होगा तो वह प्रकटे बिना रह ही सकता.. कितना सरल है और कितना सहज है उस प्रेम को पाना जो हमारा निज का स्वभाव है. 

Monday, August 25, 2014

फूल खिले जब ध्यान का

फरवरी २००७ 
सद्गुरु कहते हैं, ध्यान उत्तम प्रार्थना है. हमारे भीतर ही ऐसा कुछ है जहाँ पूर्ण विश्राम है. मन तो सागर की लहरों की तरह है अथवा आकाश के बादलों की तरह, जो आते हैं और चले जाते हैं, और सारे विकार वे भी तो मात्र विचार हैं जिनका कोई अस्तित्त्व ही नहीं. भय का विचार हमें कैसे जड़ कर देता है, जबकि वह है क्या, एक कल्पना ही तो ! हम खाली हैं, ठोस तो केवल अस्तित्त्व है जो सदा रहने वाला है, वास्तव में वही हम हैं, जिसमें से रिसता है प्रेम, करुणा, कृतज्ञता और शांति. जिसमें से झरता है आनंद. पहले विचार आंदोलित करते रहे हों पर ध्यान के बाद वे बेजान हो जाते हैं. उन्हें देखना भर है. उनमें स्वयं की शक्ति नहीं है, वे आते हैं और चले जाते हैं, जिसने तय कर लिया है कि अब से उसके जीवन में जो भी होगा श्रेष्ठतम ही होगा, उससे कम नहीं, सारा अस्तित्त्व उसके साथ है. ईश्वर श्रेष्ठतम है और वह हर क्षण हमारे साथ है.


Thursday, July 3, 2014

एक त्रिवेणी हो जीवन में

सितम्बर २००६ 
ज्ञान से हम ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाते हैं. योग से कृत-कृतव्य हो जाते हैं और भक्ति से प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाते हैं. तीन ही तो शक्तियां हैं हमारे पास, जानने की शक्ति, करने की शक्ति तथा मानने की शक्ति. यदि जीवन में ज्ञान, भक्ति तथा योग नहीं है तो हम कोल्हू के बैल की तरह एक ही घेरे में चक्कर लगाते हैं जिसकी आँखों पर पट्टी बंधी है. कहीं भी नहीं पहुंचते, जीवन भर एक ही सीमा में बंधे रह जाते हैं. सद्गुरू के द्वार पर पहुंचने भर की देर है, वह ज्ञान से हमारे भीतर के चक्षु खोल देते हैं, भक्ति से हृदय को सरस बना देते हैं तथा सेवा की प्रेरणा देकर करने की क्षमता का उपयोग करना सिखाते हैं. 

Friday, February 14, 2014

भीतर भरा उजाला जगमग

अगस्त २००५ 
हमारे ही भीतर इतनी सामर्थ्य भरी है कि सितारे यदि गर्दिश में भी हुए तो कुछ न बिगाड़ सकें. हम व्यर्थ ही अपनी शक्ति को कम आंकते हैं अथवा तो व्यर्थ गंवाते हैं. मानव जीवन दुर्लभ है, हम संतों की वाणी में यह पढ़ते हैं. उन्होंने अपने जीवन में भीतर की शक्तियों को उजागर किया और आनंद पाया व लुटाया. संतों, सदगुरुओं का जीवन चरित्र पढ़ें तो पता चलता है उनकी हर श्वास एक आनन्द की धारा से भीतर को स्वच्छ करती है. उनका मन अहोभाव से ओत-प्रोत रहता है. ईश्वर का प्रेम उनके शरीर के हर कण में स्पन्दित होता है. उनका मन ऐसी अलौकिक  शांति से भर जाता है जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. हम भी यह सब प्राप्त कर सकते हैं, बस आत्मशक्ति को जगाने भर की देर है.

Sunday, December 15, 2013

मीरा के प्रभु गिरधर नागर

मई २००५ 
कन्हैया की छवि मीरा के मन में समा गयी है, उसके प्रति अपार प्रेम का अनुभव उसे होता है. जब उसका नाम हृदय में आता है (जो कि निरंतर आता ही रहता है) तो एक आनंदी भाव छा  जाता है, उसके लिए बहुत अश्रु भी बहाये हैं उसने, उसकी रग-रग में वही है, एक-एक कोशिका में, वही भीतर है और वही बाहर है, वही प्रेम है, वही विरह है, वही अपना है, वही अपनों में भी है, वही सद्गुरु है, वही आत्मा है, तभी वह इतना प्यारा है. वह क्या है इसे कौन बयाँ कर सकता है, उसे तो महसूस किया जा सकता है, उसे पिया जा सकता है, भीतर ही भीतर अमृत की तरह वह रिसता जो है, अंतर को भिगो देता है, वह रसपूर्ण है, वह मधुर है, वह इतना मृदु है कि... वह इतना आनन्दमय है कि.. वह जब निकट होता है तो जैसे सब कुछ मिल गया हो, फिर दुनिया में कुछ भी पाने जैसा नहीं रह जाता, यह जगत तब फीका लगता है, उसके प्रेम का अनुभव जिसे हुआ है वही जानता है. वह मस्त कर देता है, उसके लिए मन दीवाना हो जाता है, वह जब कृपा करता है तभी यह खजाना मिलता है, वह एक बार जिसका हाथ थाम लेता है, उसे कभी नहीं छोड़ता, वह सच्चा मीत है, वह मीरा के योग-क्षेम का भार उठाता है. 

Saturday, August 10, 2013

क्षुद्र हटे समाधि घटे

 दिसम्बर २००४ 
“लोकोआनंदः समाधिसुखं” जगत का सारा सुख समाधि के सुख का ही अंश है, जहाँ कहीं भी हमें सुख मिलता है, वह उसी समाधि के सुख की झलक मात्र है, हमारा मन पल भर को भी जहाँ ठहर जाता है, अनंत का सुख बरसने लगता है, समाधि सुख कहीं बाहर से लाना नहीं है, वह तो भीतर ही है, बस उसे जगने का अवसर देना है. समाधि में बैठा व्यक्ति वातावरण को भी सुख से भर रहा होता है. वह जो स्वयं तृप्त है वही दूसरों की प्यास बुझा सकता है. सद्गुरु की कृपा यदि किसी के जीवन में घटित हो जाये तो एक क्रांति उसके जीवन में होनी निश्चित है. वह तब सीमाओं से परे चले जाता है, वर्तमान को प्राप्त होता है, क्षुद्रता को त्याग देने से अनंत की शक्तियाँ उसकी सहयोगी बन जाती हैं, वह परम में विहार करने लगता है.


Monday, April 15, 2013

तू ही रस्ता तू ही मंजिल


जुलाई २००४ 
“रामकथा के तेहि अधिकारी, जिन्ह के सत्संगति अति प्यारी” रामकथा तत्वज्ञान भी कराती है, और भीतर तक शांति का प्रसार भी करती है. ‘संयम और अनुशासन’ का पाठ भी पढाती है, संयम और अनुशासन के दो पदत्राण जिसके पास हों उसे कांटे नहीं चुभते, जगत के रास्तों पर वह निर्भीक होकर चल सकता है. हमारे जीवन को सुखमय बनाने के लिए बाहरी साधनों की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी भीतरी साधनों की. भीतर की यात्रा इतनी मधुर है और इतनी सुखद लेकिन उसके लिए जो उस पर चलना चाहता है. इस पथ के एक ओर सद्गुरु है और दूसरी ओर परमात्मा है, एक राह दिखाता है और दूसरा हाथ पकड़ कर लिए चलता है. इस रास्ते पर ‘संयम और अनुशासन’ के पदत्राण के साथ साथ भक्ति का छत्र भी चाहिए. हमारा लक्ष्य जब स्वयं ब्रह्मांड का नियंता है तो उस तक जाने का मार्ग भी उसी के अनुरूप ही होगा. उसे जानने की इच्छा जब किसी के हृदय में जगती है तो हृदय के कपाट स्वयं खुल जाते हैं, वह स्वयं ही फिर अपना पता बताता है, उसे और कोई नहीं जना सकता. वह जैसा स्वयं है वैसा ही अपने भक्तों को बना देता है.  

Thursday, March 21, 2013

मुक्त करेगा ध्यान


जून २००४ 
मन हमें किस तरह अपने जाल में उलझा लेता है, हमें खबर तक नहीं होती. बहुत बड़ा शिकारी है यह मन, जन्मों-जन्मों से हम इसके शिकार होते आये हैं, तभी सद्गुरु कहते हैं, “मन के मते न चालिए” कैसे हमारा मन ही हमारा शत्रु बन जाता है, कैसा भयभीत करता है यह पागल मन. जिसे जानने का हम भ्रम पालते हैं. हम अपनी बेवकूफियों का शिकार बनते रहते हैं और अपने इर्द-गिर्द का वातावरण भी दूषित करते हैं. हम स्वयं को ही नहीं जान पाते और अन्यों को जानने का झूठा दम भरते हैं, किसी के बारे में कोई राय कायम करने से पूर्व, कोई बात कहने से पूर्व सौ बार सोचना चाहिए. सद्गुरु ठीक कहते हैं ऊपर-ऊपर से लगता है कि हम सुधार कर रहे हैं मन का, पर जो भीतर कर्म के बीज पड़े हैं, वे तो तभी जायेंगे जब हम ध्यान की गहराई में पहुंचेंगे. अभी बहुत सफर तय करना है, अभी तो शुरुआत है. जब पहली सीढ़ी पर कदम रखा है तो लक्ष्य भी एक न एक दिन मिलेगा ही. सद्गुरु का साथ हर क्षण हमारे साथ है, वह हर तरह से हमारी सहायता करते हैं. वह स्वयं पूर्णकाम हैं, धन्य हैं वे आत्माएं जो स्वयं पवित्र होकर दूसरों का मार्ग प्रशस्त करती हैं. किसी न किसी जन्म में, सम्भव है इसी जन्म में, हम भी किसी के काम आ सकें, पहले तो स्वयं का कल्याण करना है, मुक्त होना है. हर कीमत पर बन्धनों को तोड़ कर फेंकना है, अंतिम बार हो यह बंधन, आगे नहीं !

Wednesday, December 19, 2012

बरसे हर पल प्रेम किसी का


नवम्बर २००३ 
गुरुमुख होना तलवार की धार पर चलने के समान है. साधक को यह सतत् स्मरण रखना है. लोभ हमें भटकाता है, कृपण बनाता है. सद्गुरु एक दर्पण की तरह है जो हमारे भीतर की सारी कमजोरियों को स्पष्ट दिखाता है. अपनी भूलों पर वेदना होगी तभी उनमें सुधार की गुंजाइश है. सुमिरन होगा तो स्वयं पर नजर जायेगी ही, जैसे चालक का ध्यान पल भर के लिए भी सड़क से हट जाये तो दुर्घटना घट सकती है, वैसे ही यदि सजगता नहीं रही तो हम अपने व्यवहार, अपनी वाणी तथा अपने मन के प्रति उदासीन हो जाते हैं. हमारे स्वयं का हमें ज्ञान नहीं रहता. हमारी शक्ति का दुरूपयोग होने लगता है. संसार रूपी जल मन रूपी नाव में भर जाता है और नाव डोलने लगती है, तब सुमिरन रूपी पतवार ही उसे बचा सकती है. जिसने एक बार भी परम का आश्रय लिया है उसे वह अकेले नहीं छोड़ते. जो एक बार उनके साथ हो लेता है, वह अगर पीछे भी रह जाये तो वहीं से वह उसे अपने साथ ले लेते हैं. हमारा निर्णय हमारे अपने हाथ में है, हम गुरुमुख होना चाहते हैं या मनमुख होना, श्रेय का मार्ग अपनाते हैं अथवा प्रेय का. हमारा लक्ष्य सुख है या आत्मा का आनंद. सुख के पीछे दुःख छिपा है, आत्मा के पीछे परमात्मा स्वयं हैं.

Wednesday, November 21, 2012

ज्योति जल रही उसकी भीतर


अक्टूबर २००३ 
परमात्मा सद्गुरु के रूप में बार-बार धरा पर अवतरित होते हैं. कृपा की फुहार बरसाते हैं. कुम्भ के रूप में हम जिस ब्रह्माण्डीय शक्ति की उपासना करते हैं वह उसी का रूप है. यदि हम उसे अपने जीवन रूपी रथ को हांकने के लिए कहें तो वह तत्क्षण तैयार हो जाते हैं. वह हमारी चेतना की मूर्छा को दूर करते हैं. जीवात्मा रूपी अर्जुन जब परमात्मा रूपी कृष्ण को अपना गुरु बनाता है तो वह उसे प्रेरित करते हैं, ज्ञान प्रदान करते हैं, ध्यान की विधि बताते हैं. अनेकों उपायों से वह अर्जुन की सुप्त चेतना को जागृत करते हैं. अहंकार का आवरण दूर करते हैं. जीवन अमूल्य है, उसी का उपहार है, वही इसका आधार है, हमें उसे ही जानना है जो इस देह और मन के भीतर ज्योति जलाकर बैठा है. जगत तो एक साधन है शरीर को चलाने के लिए, ज्ञान पाने के लिए. कृपा होते ही यह जीवन एक उत्सव बन जाता है. गूंगे की मिठाई की तरह जो भीतर को रस से भर देता है. तब भीतर उजाला ही उजाला भर जाता है, जिसमें सभी कुछ स्पष्ट है, कहीं कोई संशय नहीं रहता.

Tuesday, November 6, 2012

वही सम्भाले रहता पल-पल


अक्तूबर २००३ 
हमारे जीवन में जब कोई विपत्ति आती है, उसको सहने की शक्ति केवल भक्ति में ही है. हम अकेले नहीं हैं, अस्तित्व हमारे साथ है, वही हमारे जीवन का रथ हांकता है और हमारा सच्चा सुह्रद है, हितैषी है. विपत्ति हमें हिलाना चाहती है पर कोई हमें सम्भाल लेता है, इसका अनुभव हमें कई बार हुआ है, हर बार उसी ने हमें बचाया है जो हमारी आत्मा है. उसे यदि हम भूल भी जाएँ तो वह हमें अपनी याद दिलाता है, वही विपत्ति से बचाकर पुनः शरण में ले आता है. हर क्षण वह हमारे अपराधों को क्षमा करता है, वह क्षमा करता है क्योंकि वह प्रेम करता है, प्रेम की शक्ति अपार है, वह अपने उदाहरण से हमें भी सिखाता है कि हम भी औरों को क्षमा करें, निर्णय सुनाने का अधिकार हमें नहीं है, यदि ईश्वर हमें निर्णय सुनाने लगे तो हम इस धरा पर रहने के काबिल नहीं हैं, पर वह हमें हजारों बार अवसर देता है धीरे-धीरे जैसे कोई बच्चे को हाथ पकड़ कर चलना सिखाता है वैसे ही वह कान्हा हमें जीना सिखाता है. वह अपने प्रतिनिधि सद्गुरु को हमारे जीवन में भेजता है. उनके सान्निध्य में हम परम के मार्ग पर चलते हैं. वह हमें कितने विभिन्न उपायों से अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराते हैं. हमारे मन पर अज्ञान की जो मैल जम गयी है, उसे धोना सिखाते हैं. सच्चे हृदय से जब हम उनकी शरण में जाते हैं तो वह कृपा करके आनंद, शांति, प्रेम तथा ज्ञान का उपहार देते हैं, उनकी कृपा के हम पात्र बनें तो वह लुटाने को तैयार हैं. सद्गुरु का जीवन हमारे सम्मुख ईश्वर का रहस्य खोलकर रख देता है.

Wednesday, October 3, 2012

नानक दुखिया सब संसार


सितम्बर २००३ 
हमें कृष्ण की परा प्रकृति का अंश होना है, जो शाश्वत है, चिन्मय है, नित्य है, सत्य है. यह संसार दुखों का घर है. विभिन्न प्रकार के रोगों, कष्टों, और तापों से ग्रस्त प्राणी यहाँ अनवरत दुःख पा रहे हैं. कहीं आतंक का शिकार होते हैं, कहीं प्राकतिक आपदाओं के, कहीं अपनी ही गलती के कारण  दुर्घटना का शिकार तो कहीं दूसरों की गलती के कारण. कौन है जो इस भट्टी में नहीं तप रहा है. एक मात्र सद्गुरु ही ऐसा है जो इन सबसे परे है, जगत के व्यापर उसे छू भी नहीं पाते. दुःख देखकर उसका हृदय द्रवित तो होता है पर पीड़ित नहीं होता. वह स्वयं के ज्ञान से इतना परिपूर्ण हो चुका है कि कुछ पाना उसके लिए शेष नहीं रह गया है. वह सिर्फ देना चाहता है. उसके पास जो है वह जगत के पास नहीं है. जिसमें सहज स्वाभाविक रूप से संतों के प्रति प्रेम है, सद्वचनों तथा सत्संग के प्रति गहरा आकर्षण है, उस पर ईश्वर की कृपा ही तो है. ईश्वर हमारे हजार दोषों को नजरअंदाज कर देते हैं, बस अपने प्रति सच्चे प्रेम को देखते हैं, वह प्रेम की भाषा जानते हैं और कुछ भी उन्हें रिझाने के लिये नहीं चाहिए. सच्चा, शुद्ध, एकांतिक निर्मल प्रेम यदि किसी के हृदय में उत्पन्न हो जाये तो उसे तत्क्षण प्रभु दर्शन हो सकते हैं. फिर उन्हीं की छवि भीतर-बाहर दिखती है, उनकी कृपा के अतिरिक्त कौन हमारा सहाय है, और वह हमारे कितने निकट है, हमसे भी निकट, हमारे व स्वयं के मध्य तो कल्पनाओं का एक बड़ा झुण्ड है पर उसके व हमारे बीच तो कुछ भी नहीं. हवा और रौशनी की तरह वह हर क्षण हमें सहज प्राप्त है.