मई २००५
कन्हैया
की छवि मीरा के मन में समा गयी है, उसके प्रति अपार प्रेम का अनुभव उसे होता है.
जब उसका नाम हृदय में आता है (जो कि निरंतर आता ही रहता है) तो एक आनंदी भाव छा जाता है, उसके लिए बहुत अश्रु भी बहाये हैं
उसने, उसकी रग-रग में वही है, एक-एक कोशिका में, वही भीतर है और वही बाहर है, वही
प्रेम है, वही विरह है, वही अपना है, वही अपनों में भी है, वही सद्गुरु है, वही
आत्मा है, तभी वह इतना प्यारा है. वह क्या है इसे कौन बयाँ कर सकता है, उसे तो महसूस
किया जा सकता है, उसे पिया जा सकता है, भीतर ही भीतर अमृत की तरह वह रिसता जो है,
अंतर को भिगो देता है, वह रसपूर्ण है, वह मधुर है, वह इतना मृदु है कि... वह इतना
आनन्दमय है कि.. वह जब निकट होता है तो जैसे सब कुछ मिल गया हो, फिर दुनिया में कुछ
भी पाने जैसा नहीं रह जाता, यह जगत तब फीका लगता है, उसके प्रेम का अनुभव जिसे हुआ
है वही जानता है. वह मस्त कर देता है, उसके लिए मन दीवाना हो जाता है, वह जब कृपा
करता है तभी यह खजाना मिलता है, वह एक बार जिसका हाथ थाम लेता है, उसे कभी नहीं छोड़ता,
वह सच्चा मीत है, वह मीरा के योग-क्षेम का भार उठाता है.