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Sunday, December 15, 2013

मीरा के प्रभु गिरधर नागर

मई २००५ 
कन्हैया की छवि मीरा के मन में समा गयी है, उसके प्रति अपार प्रेम का अनुभव उसे होता है. जब उसका नाम हृदय में आता है (जो कि निरंतर आता ही रहता है) तो एक आनंदी भाव छा  जाता है, उसके लिए बहुत अश्रु भी बहाये हैं उसने, उसकी रग-रग में वही है, एक-एक कोशिका में, वही भीतर है और वही बाहर है, वही प्रेम है, वही विरह है, वही अपना है, वही अपनों में भी है, वही सद्गुरु है, वही आत्मा है, तभी वह इतना प्यारा है. वह क्या है इसे कौन बयाँ कर सकता है, उसे तो महसूस किया जा सकता है, उसे पिया जा सकता है, भीतर ही भीतर अमृत की तरह वह रिसता जो है, अंतर को भिगो देता है, वह रसपूर्ण है, वह मधुर है, वह इतना मृदु है कि... वह इतना आनन्दमय है कि.. वह जब निकट होता है तो जैसे सब कुछ मिल गया हो, फिर दुनिया में कुछ भी पाने जैसा नहीं रह जाता, यह जगत तब फीका लगता है, उसके प्रेम का अनुभव जिसे हुआ है वही जानता है. वह मस्त कर देता है, उसके लिए मन दीवाना हो जाता है, वह जब कृपा करता है तभी यह खजाना मिलता है, वह एक बार जिसका हाथ थाम लेता है, उसे कभी नहीं छोड़ता, वह सच्चा मीत है, वह मीरा के योग-क्षेम का भार उठाता है. 

Thursday, October 4, 2012

साहेब तब पीछे फिरत


सितम्बर २००३ 
संत जन कहते हैं अध्यात्म के मार्ग पर लापरवाही नहीं चलेगी. हमारा हर कर्म शुद्ध से शुद्धतर फिर शुद्धतम बनता जायेगा तभी मन निर्मल होगा. कबीर कहते हैं “ कबीर मन निर्मल भया ज्यों गंगा का तीर, साहेब तब पीछे फिरत कहत कबीर कबीर” जीवन का उद्देश्य ही जब प्रेम प्राप्ति हो तो लापरवाही अथवा शरीर के आराम की चिंता में ही लगे रहना मूर्खता ही कही जायेगी. ईश्वर के प्रेम का अनुभव जिसे एकबार हो जाये उसे अन्य रस नहीं भाते, प्रेमसुधा का रस इतना प्रभावशाली होता है कि एक बार चढ़ता है तो उसका असर समाप्त नहीं होता क्योंकि मन भीतर ही भीतर उसे स्वयं में पाने लगता है. मीरा जब दैवीय प्रेम से भरकर गाती थी तो उसका मन इसी रस से छलक रहा होता था, काश हम सभी उसे महसूस कर पाते तो यह दुनिया बहुत सुंदर होती. हम एक-दूसरे को तब अपना बैरी नहीं समझते, सभी के भीतर एक सत्ता है जो आनंद मय है, प्रेममय है, शांतिमय है, ज्ञानमय है, हम सभी को इन्हीं की चाह है, इसी के कारण हम जगत में विभिन्न कार्यकलाप करते हैं. यदि यह ज्ञात हो जाये कि जो हम बाहर ढूँढ रहे हैं वह तो पहले से ही हमारे पास है तो यह स्वार्थ की दौड़ थम जाय. तब भी कार्य तो होंगे पर वे बंधन का कार्य नहीं बनेंगे, तब हम मुक्त होंगे, सही अर्थों में तो आजादी तभी मिलती है जब मन मुक्त होकर उस अपरिमेय, अनिवर्चनीय, अद्भुत रस का अनुभव कर सके, पर उसका स्वाद लेना कोई–कोई ही जानता है, ईश्वर की कृपा और हृदय में सच्ची प्यास ही हमें इस पथ का राही बना सकती है.