भय से मुक्ति मिले बिना मानव को विश्रांति प्राप्त नहीं हो सकती। जो कुछ उसके पास है, वह छिन जाने का भय, रिश्तों के टूट जाने का भय अथवा उनके सदा एक सा न बने रहने का भय। दूसरों के मन में अपने प्रति स्नेह व सम्मान को खो देने का भय। समाज में अकेले रह जाने का भय और दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं, इसका भय। असुंदर, अयश, निर्धन, अपकीर्ति, असफल होने का भय; और भी न जाने कितने भय हैं जिनसे मन घिरा रहता है। सबसे बड़ा भय रोग अथवा मृत्यु का है, यह भी मानव मन को जकड़े रहता है। जहाँ भय है वहाँ प्रेम खो जाता है। संत जब ईश्वर से प्रेम करने की बात कहते हैं तो भयभीत व्यक्ति उसका अनुभव नहीं कर पाता, अथवा तो उन क्षणों में नहीं कर पाता जब इनमें से कोई भय मन की ऊपरी सतह पर आ गया है।अधिकतर समय तो ये भय अवचेतन में दबे रहते हैं और इनका भास नहीं होता। कोई परिस्थिति आने पर यदि मन डावाँडोल हो रहा है तो कोई न कोई भय सिर उठा रहा है। ऐसे में एक ही उपाय है इनसे मुक्ति का, साक्षी हो जाना। ये भय हमारे सत्य स्वरूप को छू भी नहीं पाते। जब कोई स्वयं की अनंतता को अनुभव कर लेता है तो सारे भय खो जाते हैं। साधना के द्वारा बार-बार अपने आप में स्थित होना सीखना है, एक दिन जब सारे भय अवचेतन से निकल कर सामने आ जाएँगे और मन में हलचल नहीं होगी उस क्षण हम इनसे सदा के लिए मुक्त हो जाएँगे।
Sunday, January 29, 2023
Monday, April 25, 2022
जीवन में जब रंग भरेगा
हमारा मूल स्वभाव प्रेम है, लेकिन उस तक हमारी पहुँच ही नहीं है. जिस देह-मन के साथ हमने तादात्म्य कर लिए है, वह इसके विपरीत है. मन बटोरना चाहता है, वह सदा भयग्रस्त रहता है, वह अन्यों से तुलना करता है. मन प्रकृति का अंश है, जो सदा बदलती रहती है, इसलिए मन के स्तर पर बने सम्बन्धों में स्थायित्व नहीं होता, वे कभी प्रेम तो कभी क्रोध से भर जाते हैं. मन जिस स्रोत से प्रकटा है, वह आत्मा सदा एक सी है, वह आकाशवत निर्द्वन्द्व एक असीम सत्ता है, वहाँ अनंत आनंद व अनंत प्रेम है. उसका ज्ञान होने पर तथा उसके साथ तादात्म्य करने पर हमारा सारा भय खो जाता है, हम लोभ, क्रोध, मोह आदि विकारों के शिकार नहीं होते. हम मन की माया के पार चले जाते हैं. अपने आप से मुलाकात होती है. प्रह्लाद का जन्म होता है और विकारों की होली जलती है, तब जीवन में रंग ही रंग भर जाते हैं.
Wednesday, October 13, 2021
जीवन ही जब बने साधना
साधना के द्वारा जब जीवन से जड़ता और प्रमाद चले जाते हैं, तभी किसी न किसी नवीन सृजन का कार्य आरम्भ होता है। मन से परिग्रह का उन्माद भी खो जाता है और सहज संतोष अनुभव होता है। भय तभी होता है जब कुछ बचाए रखने की कामना रहे, इसलिए अपरिग्रह सधते ही अभय का जन्म साधक के जीवन में होता है। ऐसा व्यक्ति ही निस्वार्थ प्रेम दे सकता है। उसके मन में कृतज्ञता की भावना पनपती है और हर उपलब्धि को वह ईश्वर का अनुग्रह मानकर स्वीकार करता है।अब राग-द्वेष की आँच नहीं जलाती अपितु निरंतर एक सजगता बनी रहती है। उसके कर्म अब बंधन का कारण नहीं बनते बल्कि मन को शुद्ध करने के हेतु बनते हैं। चित्तशुद्धि होते-होते साधक एक न एक दिन समाधि के परम आनंद को प्राप्त होता है।
Wednesday, May 5, 2021
श्वासों को जो साध सकेगा
आज के वातावरण में जब चारों तरफ भय और आशंका का वातावरण है , मन को शांत रखना अति आवश्यक है. जब हमारा मन शांत और सहज होगा, तो हम अपने व परिवार के लिए सही निर्णय लेने की स्थिति में होंगे। श्वास लेने की विधि और ध्यान के अभ्यास ऐसी परिस्थितियों में मन को डूबने से बचाने के लिए अति आवश्यक हैं। ध्यान में हम वर्तमान में रहना सीखते हैं, यह हमें भविष्य की आशंका से मुक्त करता है। यह हमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखाता है. मन में स्थिरता के लिए, हमें अपनी जीवनी-शक्ति या जीवन ऊर्जा के मूल सिद्धांतों को जानना चाहिए। यही प्राणायाम का पूरा विज्ञान है। जब हमारे प्राण या जीवनी शक्ति में उतार-चढ़ाव होता रहता है, तो हमारा मन भी भावनाओं के प्रवाह में ऊपर-नीचे होता रहता है। श्वास की लय को समझने से हमें मन में स्थिरता बनाए रखने में भी मदद मिलती है। हमारी श्वास में एक बहुत बड़ा रहस्य छुपा है। मन की हर भावना के अनुरूप श्वास में एक समान लय होती है, और प्रत्येक लय शरीर के कुछ भागों को शारीरिक रूप से प्रभावित करती है। जब हम आनंदित होते हैं तो हम विस्तार की भावना महसूस करते हैं और दुखी होने पर संकुचन की भावना। जरूरत पड़ने पर हमें दृढ़ता दिखाने में सक्षम होना चाहिए और साथ ही क्षमा करना भी आना चाहिए। यह क्षमता सभी के भीतर मौजूद है, और इन अवस्थाओं में सहज रूप से प्रवेश करने व बाहर आने के लिए आवश्यक कौशल को ध्यान उजागर करता है।ध्यान से हमारे भीतर ब्रह्मांडीय चेतना का उदय होता है । जब हम खुद को जगत के अंश के रूप में देखते हैं, तो जगत और हमारे मध्य प्रेम दृढ़ता से बहता है। यह प्रेम हमें विरोधी ताकतों और हमारे जीवन की परेशानियों को सहन करने की शक्ति प्रदान करता है। क्रोध, चिंता और निराशा क्षणिक व विलीन हो जाने वाली क्षणभंगुर भावनाएँ बन जाती हैं.
Wednesday, September 16, 2020
खो जायेगा छोटा मन जब
महामारी के इस काल में सब कुछ अनिश्चतता के दौर से गुजर रहा है. एक भय और असुरक्षा की भावना पहले से बढ़ गयी लगती है. ऐसे में अध्यात्म का आश्रय लेकर हम सहज ही अपने मन को तनाव से मुक्त रख सकते हैं. ‘मैं’ और ‘मेरा’ के सीमित दायरे से निकाल कर अध्यात्म हमें औरों के प्रति संवेदनशील होना सिखाता है. तनाव होता है स्वयं के बारे में सोचते रहने से, यदि हम अपनी सोच में बदलाव ले आएं और यह विचारें कि क्या इस दौर में हम अन्यों की किसी भी तरह की मदद कर सकते हैं, तो हमें अपनी चिंता करने का समय ही नहीं मिलेगा. जिस परम शक्ति ने इस विराट सृष्टि का निर्माण किया है, उसके प्रति समर्पण करने से भी मन भय मुक्त हो जाता है. सुबह और शाम आधा घण्टा ध्यान करने से भी हम मन में स्थिरता और शांति का अनुभव कर सकते हैं. ध्यान हमें ऊर्जावान बनाता है, हमारा छोटा मन विशाल मन के साथ जुड़ कर गहन विश्राम का अनुभव कर सकता है, जो मन के साथ-साथ तन को भी स्वस्थ रखने में सहायक है.