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Sunday, January 29, 2023

डरना जिसने छोड़ दिया है

भय से मुक्ति मिले बिना मानव को विश्रांति प्राप्त नहीं हो सकती। जो कुछ उसके पास है, वह छिन जाने का भय, रिश्तों के टूट जाने का भय अथवा उनके सदा एक सा न बने रहने  का भय। दूसरों के मन में अपने प्रति स्नेह व सम्मान  को खो देने का भय। समाज में अकेले रह जाने का भय और दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं, इसका भय। असुंदर, अयश, निर्धन, अपकीर्ति, असफल  होने का भय; और भी न जाने कितने भय हैं जिनसे मन घिरा रहता है। सबसे बड़ा भय रोग अथवा मृत्यु का है, यह भी मानव मन को जकड़े रहता है। जहाँ भय है वहाँ प्रेम खो जाता है। संत जब ईश्वर से प्रेम करने की बात कहते हैं तो भयभीत व्यक्ति उसका अनुभव नहीं कर पाता, अथवा तो उन क्षणों में नहीं कर पाता जब इनमें से कोई भय मन की ऊपरी सतह पर आ गया है।अधिकतर समय तो ये भय अवचेतन में दबे रहते हैं और इनका भास नहीं होता। कोई परिस्थिति आने पर यदि मन डावाँडोल हो रहा है तो कोई न कोई भय सिर उठा रहा है। ऐसे में एक ही उपाय है इनसे मुक्ति का, साक्षी हो जाना। ये भय हमारे सत्य स्वरूप को छू भी नहीं पाते। जब कोई स्वयं की अनंतता को अनुभव कर लेता है तो सारे भय खो जाते हैं। साधना के द्वारा बार-बार अपने आप में स्थित होना सीखना है, एक दिन जब सारे भय अवचेतन से निकल कर सामने आ जाएँगे और मन में हलचल नहीं होगी उस क्षण हम इनसे सदा के लिए मुक्त हो जाएँगे।   


Monday, April 25, 2022

जीवन में जब रंग भरेगा


हमारा मूल स्वभाव प्रेम है, लेकिन उस तक हमारी पहुँच ही नहीं है. जिस देह-मन के साथ हमने तादात्म्य कर लिए है, वह इसके विपरीत है. मन बटोरना चाहता है, वह सदा भयग्रस्त रहता है, वह अन्यों से तुलना करता है. मन प्रकृति का अंश है, जो सदा बदलती रहती है, इसलिए मन के स्तर पर बने सम्बन्धों में स्थायित्व नहीं होता, वे कभी प्रेम तो कभी क्रोध से भर जाते हैं. मन जिस स्रोत से प्रकटा है, वह आत्मा सदा एक सी है, वह आकाशवत निर्द्वन्द्व एक असीम सत्ता है, वहाँ अनंत आनंद व अनंत प्रेम है. उसका ज्ञान होने पर तथा उसके साथ तादात्म्य करने पर हमारा सारा भय खो जाता है, हम लोभ, क्रोध, मोह आदि विकारों के शिकार नहीं होते. हम मन की माया के पार चले जाते हैं. अपने आप से मुलाकात होती है. प्रह्लाद का जन्म होता है और विकारों की होली जलती है, तब जीवन में रंग ही रंग भर जाते हैं. 


Wednesday, October 13, 2021

जीवन ही जब बने साधना

साधना के द्वारा जब जीवन से जड़ता और प्रमाद चले जाते हैं, तभी किसी न किसी नवीन  सृजन का कार्य आरम्भ होता है। मन से परिग्रह का उन्माद भी खो जाता है और सहज संतोष अनुभव होता है। भय तभी होता है जब कुछ बचाए रखने की कामना रहे, इसलिए अपरिग्रह सधते ही अभय का जन्म साधक के जीवन में होता है। ऐसा व्यक्ति ही निस्वार्थ  प्रेम दे सकता है। उसके मन में कृतज्ञता की भावना पनपती है और हर उपलब्धि को वह ईश्वर का अनुग्रह मानकर स्वीकार करता है।अब  राग-द्वेष की आँच नहीं जलाती अपितु निरंतर एक सजगता बनी रहती है। उसके कर्म अब बंधन का कारण नहीं बनते बल्कि  मन को शुद्ध करने के हेतु बनते हैं। चित्तशुद्धि होते-होते  साधक एक न एक दिन समाधि के परम आनंद  को प्राप्त होता है। 


Wednesday, May 5, 2021

श्वासों को जो साध सकेगा

 आज के वातावरण में जब चारों तरफ भय और आशंका का वातावरण है , मन को शांत रखना अति आवश्यक है. जब हमारा मन शांत और सहज होगा, तो हम अपने व परिवार के लिए सही निर्णय लेने की स्थिति में होंगे।  श्वास  लेने की विधि और ध्यान के अभ्यास ऐसी परिस्थितियों में मन को डूबने से बचाने के लिए अति आवश्यक हैं। ध्यान में हम वर्तमान में रहना सीखते हैं, यह हमें भविष्य की आशंका से मुक्त करता है। यह हमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखाता है. मन में स्थिरता के लिए, हमें अपनी जीवनी-शक्ति या जीवन ऊर्जा के मूल सिद्धांतों को जानना चाहिए। यही प्राणायाम का पूरा विज्ञान है। जब हमारे प्राण या जीवनी शक्ति में उतार-चढ़ाव होता रहता है, तो हमारा मन भी भावनाओं के प्रवाह में ऊपर-नीचे होता रहता है। श्वास की लय को समझने से हमें मन में स्थिरता बनाए रखने में भी मदद मिलती है। हमारी श्वास में एक बहुत बड़ा रहस्य छुपा है। मन की हर भावना के अनुरूप  श्वास में एक समान लय होती है, और प्रत्येक लय शरीर के कुछ भागों को शारीरिक रूप से प्रभावित करती है। जब हम आनंदित होते हैं तो हम विस्तार की भावना महसूस करते हैं और दुखी होने पर संकुचन की भावना। जरूरत पड़ने पर हमें दृढ़ता दिखाने में सक्षम होना चाहिए और साथ ही क्षमा करना भी आना चाहिए। यह क्षमता सभी के भीतर मौजूद है, और इन अवस्थाओं में सहज रूप से प्रवेश करने व बाहर आने के लिए आवश्यक कौशल को ध्यान उजागर करता है।ध्यान से हमारे भीतर ब्रह्मांडीय चेतना का उदय होता है । जब हम खुद को जगत के अंश के रूप में देखते हैं, तो जगत और हमारे मध्य प्रेम दृढ़ता से बहता है। यह प्रेम हमें विरोधी ताकतों और हमारे जीवन की परेशानियों को सहन करने की शक्ति प्रदान करता है। क्रोध, चिंता और निराशा क्षणिक व विलीन हो जाने वाली क्षणभंगुर भावनाएँ बन जाती हैं. 


Wednesday, September 16, 2020

खो जायेगा छोटा मन जब

 महामारी  के इस काल में सब कुछ अनिश्चतता के दौर से गुजर रहा है. एक भय और असुरक्षा की भावना पहले से बढ़ गयी लगती है. ऐसे में अध्यात्म का आश्रय लेकर हम सहज ही अपने मन को तनाव से मुक्त रख सकते हैं. ‘मैं’ और ‘मेरा’ के सीमित दायरे से निकाल कर अध्यात्म हमें औरों के प्रति संवेदनशील होना सिखाता है. तनाव होता है स्वयं के बारे में सोचते रहने से, यदि हम अपनी सोच में बदलाव ले आएं और यह विचारें कि क्या इस दौर में हम अन्यों की किसी भी तरह की मदद कर सकते हैं, तो हमें अपनी चिंता करने का समय ही नहीं मिलेगा. जिस परम शक्ति ने इस विराट सृष्टि का निर्माण किया है, उसके प्रति समर्पण करने से भी मन भय मुक्त हो जाता है. सुबह और शाम आधा घण्टा ध्यान करने से भी हम मन में स्थिरता और शांति का अनुभव कर सकते हैं. ध्यान हमें ऊर्जावान बनाता है, हमारा छोटा मन विशाल मन के साथ जुड़ कर गहन विश्राम का अनुभव कर सकता है, जो मन के साथ-साथ तन को भी स्वस्थ रखने में सहायक है. 

Friday, January 31, 2020

मिलजुल रहना जब सीखेंगे


जब चारों ओर अफरातफरी मची हो, कोई किसी की बात सुनने को ही तैयार न हो.  समाज में भय का वातावरण बनाया जा रहा हो और भीड़ को बहकाया जा रहा हो, भीड़ जो भेड़चाल चलती है, जो विरोध करते-करते  कभी हिंसक भी हो जाती है. समाज जब ऐसे दौर से गुजर रहा हो तो सही बात पीछे रह जाती है. यदि सभी अपना-अपना निर्धारित काम सही ढंग से करें,   तो समाज को आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है. भारत भूमि पर रहने वाला हर व्यक्ति भारत के विकास के लिए उत्तरदायी है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी भी वर्ग, वर्ण, आश्रम, समुदाय या प्रदेश का रहने वाला व्यक्ति समान है, उसके अधिकार समान हैं और कर्तव्य भी. आज सभी अधिकारों की बात करते हैं पर जिसे जहाँ जो कार्य करना चाहिए, उसकी बात नहीं करता. विश्व विद्यालय अध्ययन व अध्यापन करने-कराने की जगह आंदोलन का केंद्र न बनें. बगीचे टहलने व खेलने के स्थान पर संघर्ष के लिए केंद्र न बनें. भारत जिस बात के लिए विश्व प्रसिद्ध है उस सौहार्द, आत्मीयता और ज्ञान को कोई  भुलाए नहीं, जिसके बिना आपसी मतभेद को दूर करना बहुत कठिन है.

Wednesday, August 29, 2018

अभय हुआ जो वही मुक्त है


२९ अगस्त २०१८ 
परमात्मा हमें हर कदम पर आगे बढ़ने के लिए कितने ही अवसर देता है. हम कभी जड़ता और कभी भय के कारण उनका लाभ नहीं ले पाते. यह जीवन सीखने के लिए मिला है और उस सीखे हुए को जगत के साथ व्यवहार में अपनाने के लिए भी. आत्मा का विकास हो तभी वह प्रफ्फुलित रह सकती है. जैसे कोई बच्चा यदि बिना पढ़ाये ही छोड़ दिया जाये तो वह अपना सामान्य जीवन भी ठीक से नहीं चला पाता, वैसे ही आत्मिक विकास के बिना हम भावनात्मक रूप से पिछड़े हुए ही रह जाते हैं. जीवन एक लम्बी यात्रा है, जिसमें अनेक जन्म लेते हुए हम यहाँ तक आ पहुँचे हैं. यह जन्म मंजिल नहीं है, न ही मृत्यु इसका अंतिम पड़ाव है, अभी आगे जाना है. स्वयं को जानकर यानि आत्मस्थित होकर ही हम इस यात्रा को सजगता पूर्वक कर सकते हैं. इसके लिए हर तरह के प्रमाद और भय से मन को मुक्त करना होगा, जीवन जिस रूप में भी सम्मुख आता है, उसे स्वीकार करना होगा और परमात्मा को सदा अपने निकट ही जानकर उसके प्रति श्रद्धा को जगाये रखना होगा.

Thursday, June 7, 2018

भय बिनु होई न प्रीति


७ जून २०१८ 
महान संत कवि तुलसीदासजी ने कहा है, ‘भय बिनु होई न प्रीति’, वहाँ प्रसंग है कि जब समुद्र पर बाँध बनाने के लिए श्रीराम ने उससे विनती की तो उसने कोई ध्यान नहीं दिया, जब डर दिखाया तो वह हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. किन्तु इस उक्ति को हम मानव और भगवान के सबंध में भी जोड़ कर देख सकते हैं. भय ही मानव को अदृश्य परमात्मा के सम्मुख लाकर खड़ा कर देता है. भय को दूर करने के लिए मानव परमात्मा को याद करता है, किन्तु जब तक मन में भय है, ईश्वर की अनुभूति हो ही नहीं सकती. इसी कारण परमात्मा से एक दूरी बनी रहती है और जीवन के अंतिम क्षण तक कोई न कोई भय मना में बना ही रहता है. ध्यान में जब साधक भीतर जाकर भय के कारणों को स्पष्ट देख लेता है, वह उससे मुक्त हो जाता है. मन में जब कोई द्वंद्व नहीं रहता उसी क्षण शांति का अनुभव होता है, और वह स्थिति परम सत्य की ओर इशारा करती है.

Wednesday, June 6, 2018

कबिरा मन निर्मल भया


६ जून २०१८ 
संत कहते हैं, हमारे मन का आकाश यदि विचार रूपी बादलों से ढका न हो तो अपने निर्मल स्वभाव को सहज ही प्राप्त हो सकता है. जब भीतर कोई भय न हो, तनाव या संशय न हो और न ही कोई इच्छा हो, कुछ त्यागने या ग्रहण करने की प्रवृति भी न हो, तभी मानना होगा कि मन खाली है. इस खालीपन को चैतन्य से भरने की आकांक्षा भी न हो, तब जो अनुभूति होगी उसे अनुभव करने वाला भी वहाँ कोई नहीं होगा, मात्र अनुभव ही जब शेष रह जाता है तब जीवन का मर्म समझ में आता है.

Monday, March 26, 2018

साधो सहज समाधि भली


२६ मार्च २०१८ 
हम अपने आंतरिक जीवन से जिस विश्वास से मिलते हैं, बाह्य जीवन भी उसी विश्वास से हमारा स्वागत करता है. वास्तव में हमारा स्वयं के साथ जितना और जैसा संबंध है, वैसा ही बाहर के जगत में हमारे साथ घटित होता है. यदि कोई भय से ग्रस्त है तो उसे अपने जीवन में ऐसी परिस्थितियों से दोचार होना पड़ सकता है जिसमें उसे भय का सामना करना पड़े. सभी के मूल में एक ही सत्ता है, पर हर व्यक्ति अपनी मान्यताओं, धारणाओं और भावनाओं के अनुसार ही उसे अभिव्यक्त करता है. ध्यान में जब शंकालु, चंचल मन शांत हो जाता है, तब कुछ क्षणों के लिए सहज प्राप्त निजता का अनुभव होता है. यह सहजता स्वयं का स्वभाव बन जाये इसी लिए जीवन में साधना की आवश्यकता है.

Saturday, September 9, 2017

मिटना जिसने सीख लिया है

९ सितम्बर २०१७ 
मन का स्वभाव है अभाव में जीना, आत्मा तृप्ति और संतोष चाहती है. मन की दृष्टि सदा कमियों की तरफ ही जाती है, आत्मा अपने आप में इतनी आनंदित होती है कि कमियां उसे नजर ही नहीं आतीं. मन को सदा नयेपन की तलाश है, आत्मा चिरंतन है. मन सदा भय में जीता है, आत्मा में होना ही अभय का दूसरा नाम है. मन मिटने से डरता है, आत्मा कुछ न होने में ही अपना होना जानती है. मन दुःख बनाता है, न हो तो आशंकित होता है, आत्मा किसी भी परिस्थिति में अडोल बनी रह सकती है. मन सदा अतीत अथवा भविष्य में जीता है, कभी अतीत की भूलों पर पछताता है और कभी भविष्य में होने वाले दुखों से घबराता है. आत्मा के लिए हर क्षण अपार सम्भावना लिए आता है. वर्तमान में रहना ही आत्मा में होना है. 

Monday, July 3, 2017

ज्ञान बिना सुख इक सपना है

४ जुलाई २०१७ 
संत कहते हैं, सुख के पीछे जाने से दुःख पीछे आता है, ज्ञान के पीछे जाने से सुख पीछे आता है. समझदारी तो इसी में हुई कि हम ज्ञान का अनुशीलन करें. भगवद्गीता में कृष्ण ने सुंदर शब्दों में ज्ञान की व्याख्या की है. वैराग्य की भावना, इन्द्रियों का निग्रह, शोक और भय से मुक्ति, अहंकार का त्याग ये सभी ज्ञान के लक्षण हैं. दुःख का कारण सुख की लालसा है, मिल जाने पर उसके खो जाने का भय भी दुःख का कारण है और बाद में उसकी स्मृति भी दुःख का कारण है. ज्ञान का चिंतन करने से ही मन शांति का अनुभव करता है और शांति के बाद उपजा सुख शाश्वत होता है. 

Thursday, June 29, 2017

पहला सुख निरोगी काया

३० जून २०१७ 
बचपन में हम सबने एक कहानी सुनी है, एक व्यक्ति अपनी निर्धनता से तंग आकर मरना चाहता है, एक साधु उससे कहते हैं, तुम्हारे पास तो लाखों रूपये हैं, यदि तुम अपनी एक आँख ही दे दो तो राजा तुम्हें एकम लाख रूपये दे देंगे. इसी तरह वह हर अंग की एक कीमत बताता है. निर्धन व्यक्ति किसी भी कीमत पर अपने अंग बेचना नहीं चाहता. उसे अपनी भूल का अहसास हो जाता है और वह किसी भी तरह मेहनत करके अपना जीवन यापन करने का प्रण लेता है. हम सभी अपने शरीर की अच्छी तरह देखभाल करते हैं, भरसक उसे उचित आहार, व्यायाम तथा विश्राम देकर स्वस्थ रखने का प्रयत्न करते हैं. इसके बावजूद हम रोगों के शिकार होते हैं, क्योंकि हम अपने भीतरी अंगों का उतना ध्यान नहीं रखते, वे दृष्टि से परे हैं सो हम जैसा चाहे उनके साथ व्यवहार करते हैं. जितनी बार हम क्रोध करते हैं, मस्तिष्क और हृदय पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है. अति ठंडा अथवा अति गर्म भोजन लेने पर दोनों ही स्थति में हमारा पेट प्रभावित होता है. आलस्य और प्रमाद का असर हड्डियों और मांसपेशियों को भुगतना पड़ता है. लोभ और ईर्ष्या का कुप्रभाव हमारी आँतों पर पड़ता है. न जाने कितने व्यर्थ के भय हम पाले रहते हैं, जिसका असर रक्त वाहिनियों पर पड़ता है. 

Thursday, August 11, 2016

माली सींचे मूल को

१२ अगस्त २०१६ 
जब तक स्वयं की सही पहचान नहीं मिलती, जीवन में एक अधूरापन महसूस होता है. सब कुछ होते हुए भी एक तलाश जारी रहती है. देह किसी भी क्षण रोगग्रस्त हो सकती है, मृत्यु को प्राप्त हो सकती है, यह भय भी अनजाने सताता रहता है, शेष सारे भय उसकी की छाया मात्र हैं. स्वयं की पहचान करना इतना महत्वपूर्ण होते हुए भी हम इस कार्य को टालते रहते हैं, इसका कारण शायद यही है कि हमें लगता ही नहीं कि हम स्वयं को नहीं जानते, तभी हम अक्सर दूसरों से यह कहते हैं, तुम मुझे नहीं जानते. इस जानने में एक बड़ी भूल यह हो रही है कि जन्म के बाद इस जगत में हमने जो भी हासिल किया है, उसी से हम स्वयं को आंकते हैं. वृक्ष का जो भाग बाहर दिखाई देता है उसका मूल भीतर छिपा है. इस जीवन में हमने जो भी पाया अथवा खोया है उसका मूल भीतर है. यदि बाहर को संवारना है तो मूल से परिचय करना ही होगा.  

Thursday, May 21, 2015

मुक्त करेगा ज्ञान ही भय से

मार्च २००९ 
तात्कालिक भय और असुरक्षा की भावना जब हमें घेर लेती है तो बुद्धि अपना काम करना बंद कर देती है. हमें लगता है कि हमें खतरा है, जबकि आत्मा को भय हो ही नहीं सकता. पुराने संस्कारों के कारण अथवा प्रारब्ध के कारण मन भय जगाता है, जो बीज पहले बोये थे उनके फल आने लगें तो मन विचलित होता है. लेकिन ज्ञान की तलवार से इस वृक्ष को ही काट देना है. भय के पीछे मोह ही तो है, मोह के पीछे अज्ञान है, अज्ञान ही हमें बाहर की घटनाओं से प्रभावित करता है, जबकि बाहर की घटनाओं का हमारे मन के विचारों व भावनाओं से कोई संबंध नहीं है, हम संबंध जोड़ लेते हैं.

Monday, January 12, 2015

होश भी विश्राम भी

अगस्त २००७ 
भूख, प्यास से पहले, उनके बाद, भय, कुतुहल, युद्ध से भागते समय तथा छींक से पूर्व दुखद स्थितियों का भी उपयोग स्वयं को जानने के लिए कर लेना चाहिए. दुःस्वप्न नींद को तोड़ने के लिए होता है. शास्त्र कहते हैं क्यों न हम दुखद स्थितियों का उपयोग जागने के लिए कर लें. दुःख में हम पूर्ण जागरूक होते हैं, सुख में बेहोश होते हैं. उपवास इसलिए है कि हम स्वयं के पास रहें, जागे रहें, सम्पूर्ण रहें. शरीर के कष्ट के समय हम जागरूक रहते हैं. छींक के समय जब हम जागरूक होते हैं तो छींक नहीं आती. खाड़ी-खड्ड के मुहाने पर भी हम सचेत होने का उपयोग कर सकते हैं. तेज गति में हम निर्विचार हो जाते हैं. खतरे की घड़ी में हम गहन जागरूकता को प्राप्त होते हैं, जीवन की हर परिस्थिति का साधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है. सतत् बोध रखना है कि ‘मैं हूँ’ ! होशपूर्वक विश्रांति, परिधि पर कुछ न हो रहा हो पर केंद्र पर सब कुछ हो रहा है, यही ध्यान है !

Wednesday, January 1, 2014

शुभता का ही वरण करें हम

जून २००५ 
हमारे भीतर का ज्ञान, व्यवहार तथा वाणी से ही प्रकट होता है, हम यदि झुंझला जाते हैं, खिन्न हो जाते हैं अथना टेढ़ा बोलते हैं तो हम हिंसा कर रहे होते हैं, जिसका पहला शिकार हम स्वयं होते हैं. वाणी के साथ-साथ हमारे हाव-भाव तथा व्यवहार की सूक्ष्म तरंगें भी सामने वाले व्यक्ति को छूती है. हमारे भीतर क्रोध, भय आदि के संस्कार हैं, परिस्थिति आने पर यदि हम भय अथवा क्रोध के शिकार नहीं होते उससे बच निकलते हैं तो वह संस्कार नष्ट होने लगता है अन्यथा उर्वरक भूमि पाते ही जमने लगता है और वृक्ष रूप में बढ़ने लगता है, भविष्य में उसमें अनेकों फल लगने ही वाले हैं तथा अनेकों बीज बनने वाले हैं, जिससे दुःख ही दुःख मिलने वाले हैं. इसी तरह भीतर प्रेम व शांति के संस्कार भी छुपे हैं हैं. प्रेम की तरंगे शब्दों से पहले ही सम्मुख उपस्थित व्यक्ति के हृदय को छू लेती हैं, वे निशब्द होकर भी बहुत कुछ व्यक्त कर देती हैं. प्रेम का एक बीज भविष्य में वट वृक्ष बनने वाला है. 

Thursday, October 10, 2013

खाली मन झलकाए उसको

मार्च २००५ 
हमारे मन में न जाने कितने प्रकार के भय छिपे हैं, चेतन मन के भय दिख जाते हैं, अचेतन मन के भय जो छिपे रहते हैं कभी-कभी उभर कर सताते हैं. मृत्यु का भय तो मूल है. हम जानते नहीं कि जन्म के साथ ही मृत्यु शुरू हो जाती है, धीरे-धीरे हम सभी उसका ग्रास बनने की तैयारी में हैं, यह जीवन जो ऊपरी तौर पर स्थायी प्रतीत होता है, कहाँ स्थायी है, हर क्षण बदल रहा है, हमारी सोच भी बदलती है. प्रियजनों से बिछड़ने का भय हो या अकेलेपन का भय उसी को सताता है जो अपने भीतर नहीं गया, भीतर प्रेम का एक अजस्र स्रोत बह रहा है उसे पा लेने के बाद जगत में रहकर भी साधक अपने आप में रहता है, आत्मा में ही संतुष्ट रहता है. जगत उसके लिए कुछ करे ऐसी उसकी आकांक्षा नहीं रहती, वह स्वयं जगत के लिए क्या करे, यही भाव उसमें प्रबल रहता है. उसका होना एक फूल के समान होता है, उसमे सिर्फ लुटाने की चाह है, अपना सब कुछ खाली कर देने की चाह, क्योंकि खाली मन में ही उसके प्रियतम का आगमन होगा, वह सदा प्रतीक्षारत रहता है जगत की नहीं जगदीश की.

Wednesday, August 21, 2013

अभय हुये जो बनें अहिंसक

जनवरी २०१३ 
भय और हिंसा समानार्थी शब्द हैं, अभय और अहिंसा का एक ही अर्थ है. यदि हमें रोग, बुढ़ापे तथा मृत्यु का भय है तो हम हिंसक हैं, किसी भी प्रकार का तनाव हिंसा ही है, यदि हम मन को समत्व भाव स्थित नहीं रख पाते, अनुकूल परिस्थिति में प्रसन्न तथा प्रतिकूल परिस्थिति में दुखी हो जाते हैं तो भी हम हिंसा में विश्वास रखते हैं. अहिंसा का पालन करने वाला कभी भयभीत नहीं होता. पूर्णता में जीना और पूर्णता में मरना उसके लिए सहज होता है.

Wednesday, May 22, 2013

जिस मरने से जग डरे


सितम्बर २००४ 
मृत्यु को जीतने का अर्थ है, मृत्यु के भय पर विजय पाना, अपने भीतर अमृत तत्व को पाने का अर्थ भी यही है, आत्मा ही व अमृत है जिसे हमें अपने मन रूपी सागर से मंथन करके निकालना है. हमारे शरीर में जो चेतन तत्व है वह हर काल व हर देश में एक सा है, उसे जान लेने पर शरीर का उतना महत्व नहीं रह जाता, ठीक है वह शरीर के माध्यम से कार्य कर रहा है, मन, बुद्धि आदि उसके सहायक हैं, पर वह कार्य कर ही क्यों रहा है ? वह स्वयं को जानने के लिए ही कार्य कर रहा है, आत्मा से ही आत्मा को जाना जा सकता है. वह मन, बुद्धि से परे है , पर इनके न रहने पर, शरीर के न रहने पर वह स्वयं को जान भी नहीं सकता. यह एक पहेली जैसा लगता है पर यही तो माया है. जीव ही ब्रह्म है यह जानने के लिए उसे माया का आवरण पार करना ही है. एक खेल है जो युगों-युगों से खेला जा रहा है, इस खेल में रोमांच भी है, आनन्द भी है, साहस भी है. जीव, माया को ही लक्ष्य मानकर भटकता रहता है, फिर सद्गुरु का उपदेश पाकर वह स्वयं को बदलता है और ब्रह्म को जानने का प्रयास करता है.