Monday, April 25, 2022

जीवन में जब रंग भरेगा


हमारा मूल स्वभाव प्रेम है, लेकिन उस तक हमारी पहुँच ही नहीं है. जिस देह-मन के साथ हमने तादात्म्य कर लिए है, वह इसके विपरीत है. मन बटोरना चाहता है, वह सदा भयग्रस्त रहता है, वह अन्यों से तुलना करता है. मन प्रकृति का अंश है, जो सदा बदलती रहती है, इसलिए मन के स्तर पर बने सम्बन्धों में स्थायित्व नहीं होता, वे कभी प्रेम तो कभी क्रोध से भर जाते हैं. मन जिस स्रोत से प्रकटा है, वह आत्मा सदा एक सी है, वह आकाशवत निर्द्वन्द्व एक असीम सत्ता है, वहाँ अनंत आनंद व अनंत प्रेम है. उसका ज्ञान होने पर तथा उसके साथ तादात्म्य करने पर हमारा सारा भय खो जाता है, हम लोभ, क्रोध, मोह आदि विकारों के शिकार नहीं होते. हम मन की माया के पार चले जाते हैं. अपने आप से मुलाकात होती है. प्रह्लाद का जन्म होता है और विकारों की होली जलती है, तब जीवन में रंग ही रंग भर जाते हैं. 


6 comments:

  1. बहुत बहुत आभार शास्त्री जी !

    ReplyDelete
  2. सुन्दर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  3. Replies
    1. स्वागत व आभार ज्योति जी !

      Delete
  4. बहुत सुंदर विचार सच हमारा मूल स्वभाव प्रेम है।
    सादर

    ReplyDelete
    Replies
    1. स्वागत व आभार अनीता जी!

      Delete