जीवन परम विश्रांति का साधन बन सकता है, यदि कोई अंतर्मुखी होकर अपने भीतर झांके। तीव्र गति से भागते हुए दरिया से मन को आहिस्ता-आहिस्ता बांध लगाये, फिर थिर पानी में स्वयं की गहराई का अनुभव करे। उस शांत ठहरे हुए मन की गहराई में पहली बार ख़ुद की झलक मिलती है। कोमल, स्निग्ध, शांति का अनुभव होता है। वह कितनी भी क्षणिक क्यों न हो, उसकी स्मृति सदा के लिए मन पर अंकित हो जाती है; फिर कभी ऊहापोह में फँसा मन उसी की याद करता है, उसे लगन लग जाती है। भक्ति का जन्म होता है। उसके प्रति आकर्षण कम नहीं होता, बढ़ता ही जाता है। इसमें चाहे कितना ही समय लग जाये, वर्षों का अंतराल हो पर एक न एक दिन वह स्वयं को अस्तित्व से जुड़ा हुआ जानता है। यही समाधि का क्षण है।
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Tuesday, June 6, 2023
Monday, August 23, 2021
जो जैसा मन जाने न वैसा
हम जो हैं जैसे हैं, उसे पूर्ण रूप से स्वीकार करना होगा, क्योंकि चुनाव करने वाला मन या बुद्धि अभी स्वयं ही बंटे हुए हैं, उनके द्वारा लिया गया निर्णय अनिर्णीत ही रह जायेगा. जब मन पूर्ण विश्रांति में होगा, भीतर शुद्ध चेतना का आविर्भाव होगा. जहाँ कोई दूसरा नहीं होता ऐसी स्थिति में स्वयं को स्वयं की अनुभूति होती है. वहाँ कोई अस्वीकार नहीं है, सब कुछ एक से ही प्रकट हुआ है, ऐसी स्पष्ट प्रतीति है. ऐक्य की उस अवस्था में स्वयं को तथा जगत को वे जैसे हैं वैसे ही स्वीकारने की क्षमता प्रकट होती है.
Monday, January 12, 2015
होश भी विश्राम भी
अगस्त २००७
भूख, प्यास से पहले, उनके
बाद, भय, कुतुहल, युद्ध से भागते समय तथा छींक से पूर्व दुखद स्थितियों का भी
उपयोग स्वयं को जानने के लिए कर लेना चाहिए. दुःस्वप्न नींद को तोड़ने के लिए होता
है. शास्त्र कहते हैं क्यों न हम दुखद स्थितियों का उपयोग जागने के लिए कर लें.
दुःख में हम पूर्ण जागरूक होते हैं, सुख में बेहोश होते हैं. उपवास इसलिए है कि हम
स्वयं के पास रहें, जागे रहें, सम्पूर्ण रहें. शरीर के कष्ट के समय हम जागरूक रहते
हैं. छींक के समय जब हम जागरूक होते हैं तो छींक नहीं आती. खाड़ी-खड्ड के मुहाने पर
भी हम सचेत होने का उपयोग कर सकते हैं. तेज गति में हम निर्विचार हो जाते हैं.
खतरे की घड़ी में हम गहन जागरूकता को प्राप्त होते हैं, जीवन की हर परिस्थिति का
साधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है. सतत् बोध रखना है कि ‘मैं हूँ’ !
होशपूर्वक विश्रांति, परिधि पर कुछ न हो रहा हो पर केंद्र पर सब कुछ हो रहा है,
यही ध्यान है !
Tuesday, October 21, 2014
निज घर में ही वह रहता है
मार्च २००७
सत्य के मार्ग पर चलने से पहले हमें सत्य के प्रति प्रेम जगाना है, उसकी प्यास जगानी है
! उसकी चाह जिसके भीतर जग जाती है वह तो इस अनोखी यात्रा पर निकल ही पड़ता है, और
एक बार जब हम उस अज्ञात पर पूर्ण विश्वास करके उसे सबकुछ सौंप कर आगे बढ़ते हैं तो
वह हमारा हाथ ऐसे थाम लेता है जैसे वह हमारी ही प्रतीक्षा कर रहा था. वह हमें अपने
भीतर की ऊर्जा को जगाने का बल देता है राह बताता है जब अपने पथ से दूर होने लगे तो
पुनः लौटा लाता है. वह हजार आँखों वाला, हजार बाहुओं वाला और सब कुछ जानने वाला
है. हम उसकी तरफ चलते-चलते अपने घर लौट आते हैं तब ही पूर्ण विश्रांति का अनुभव
करते हैं.
Friday, June 6, 2014
बहा करे शुभ धारा मन की
अप्रैल २००६
ध्यान करने से विश्रांति मिलती है, और
विश्रांति से सद्कार्यों के लिए सामर्थ्य उत्पन्न होता है. किसी भी शुभ कार्य को
करने के लिए आवश्यक है भीतर उदारता हो, मन अपने अवगुण तथा अन्यों के गुणों का
पारखी हो. जीवन तब अपने आप ही सार्थक प्रतीत होगा. जब मन कमजोर होता है उसकी जड़
में नकारात्मक वृत्तियाँ होती हैं, प्रवाह रुक जाता है, उन्हें सद्विचारों के पानी
से बहाकर पुनः प्रवाह को जारी रखना होगा. जीवन में सुख है या दुःख यह मानव के
दृष्टिकोण पर निर्भर करता है, एक ही स्थिति को कोई दो तरह से अनुभव कर सकता है..
सद्कार्य का परिणाम सद ही होता है. जीवन को चाहे तो फूलों सा सजा ले, चाहे तो धूल
सा पैरों के तले रौंद दे, अच्छे काम के लिए किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता
और अच्छे कार्य की प्रेरणा सद्विचारों से ही मिलती है.
Thursday, July 19, 2012
भीतर का संसार अनोखा
जून २००३
ध्यान उस परमात्मा से मिलने का द्वार है, और ध्यान तभी टिकता है जब मन खाली हो,
उसमें इस नश्वर जगत की उधेड़-बुन न चल रही हो, कोई संशय न हो और कोई कामना भी न हो.
जगत आत्मा को दे भी क्या सकता है, साधक को अपने लक्ष्य तक पहुंचने की कामना के
अतिरिक्त कुछ याद नहीं रहता. सत्य की सत्ता में अटूट विश्वास, उसके प्रति अनन्य
श्रद्धा, और असीम प्रेम यही उसकी पूंजी होती है. इन सबको हृदय में धर कर वह ध्यान
में बैठता है तो भीतर जैसे अमृत कलश छलक उठता है. वे पल अनुपम होते हैं, फिर समय
का ध्यान नहीं रहता, भीतर से जैसे कोई तार जुड़ जाता है, वास्तव में क्या होता है
उसे भी ज्ञात नहीं होता. वह अकथनीय है, अवर्णनीय है. लेकिन उर में एक विश्रांति का
अनुभव होता है, उस के प्रेम का अनुभव उसकी निकटता का अनुभव, भीतर का संसार अनोखा
है वहाँ उजाला ही उजाला है, संगीत है. परमात्मा रसमय है, प्रेममय है.
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