संशय आत्मा के पतन का सबसे बड़ा कारण है। स्वयं पर संशय हमें हमारी पूर्ण क्षमता से परिचित ही नहीं होने देता। हरेक के भीतर परमात्मा समान रूप से विराजमान है, अब यह उस पर निर्भर करता है कि वह अपने मन को एक चम्मच जितना बनाए या एक विशाल सागर जितना। हम अपनी सजगता और विश्वास के द्वारा ही मन की अज्ञात शक्तियों का पता पा सकते हैं जो भीतर हैं। अपने आस-पास के व्यक्तियों पर संशय और भी हानिकारक है, यह मन पर एक ऐसा आवरण डाल देता है कि हमें उनकी सच्ची और अच्छी बातें भी नज़र नहीं आतीं। हम वास्तव में उन व्यक्तियों से परिचित ही नहीं हो पाते, बल्कि अपने चारों ओर बने एक दायरे में ही क़ैद रह जाते हैं और जीवन प्रतिपल बीतता जाता है। गूरू और शास्त्र पर संशय न केवल हमें जीवन के वास्तविक स्वरूप से वंचित करता है बल्कि उस आनंद से भी जिस पर हर आत्मा का जन्मसिद्ध अधिकार है।
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Monday, November 29, 2021
Wednesday, May 13, 2020
जो गुरुवाणी पर करे मनन
भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं संशय आत्मा विनश्यति, अर्थात जिस व्यक्ति में संशय करना उसका स्वभाव ही बन गया है वह कभी सुख को उपलब्ध नहीं हो सकता. संसार विश्वास पर चलता है, उसके बिना जीवन में एक ठहराव आ जाता है. संशय बुद्धि करती है और श्रद्धा भावना का क्षेत्र है. अपने-अपने स्थान पर जीवन में दोनों की आवश्यकता है. यदि भीतर श्रद्धा और संशय ऊपर-ऊपर है तो व्यक्ति किसी दिन ज्ञान को उपलब्ध हो सकता है. श्रद्धा के बिना केवल संशय करना अपने जीवन को आगे बढ़ने से रोकना ही है. श्रद्धावान को ही ज्ञान मिलता है, ऐसा ज्ञान जिसके आने से भीतर शांति का अनुभव होता है. ठहरी हुई झील में भी कुछ तरंगें होती हैं पर ज्ञान की उपलब्धि से ऐसी चिर शांति भीतर उत्पन्न हो जाती है जो कभी नष्ट नहीं होती.
Wednesday, May 21, 2014
सत्य ही मंजिल वही हो मार्ग
संशय
रूपी पक्षी के दो पंख होते हैं, पहला दुष्ट तर्क दूसरा क्लिष्ट तर्क. पहले तर्क से
दूसरों को कष्ट होता है, तो दूसरे प्रकार के तर्क से हम स्वयं ही फंस जाते हैं.
निर्दोष चित्त का प्रसाद है अतर्क, भक्ति पूर्ण हो तो तर्क के लिए कोई जगह ही नहीं.
भक्ति का अर्थ है सत्य के प्रति समर्पित होना, जो सही है उसको ही चाहना, तब जीवन
में आगे बढ़ने के मार्ग अपने आप खुलते जाते हैं. किसी फल की आकांक्षा के बिना
कृतज्ञता स्वरूप तब जीवन यात्रा की जाती है तो बिना किसी बाधा के वह फलीभूत होती
है.
Sunday, April 14, 2013
खुद की याद जिसे आ जाये
हमारा जीवन स्वयं के लिए जब
आनंददायी हो जायेगा तब ही हमारा होना सार्थक होगा हमारे परिवेश के लिए. हमारा हर
पल जब उस परमपिता की स्मृति से पूर्ण होगा, तभी वह आनंदमय होगा. हम अपने प्रतिदिन
के कार्यों में इतने उलझ जाते हैं कि अपनी स्मृति ही भुला देते हैं. मिथ्या अहंकार
के तल से दुनिया को और स्वयं को देखते हैं. ईश्वरीय चेतना से ओतप्रोत हम स्वयं को
उससे अलग मानने की भूल करते हैं तभी संशय की उत्पत्ति होती है, मन के दर्पण पर धूल
छा जाती है. पर जब हमें कुछ सीखने की ललक उठती है, तब जगत ही हमारा गुरु बन जाता
है. हमारा व्यवहार क्षेत्र ही हमारी कसौटी है. हमारा मन जब आत्मा के आनंद में
सराबोर होकर कुछ भी बोलेगा तो वह सहज होगा और अहंकार से बोलेगा तो तो वह दुःख का
कारण ही बनेगा.
Sunday, February 3, 2013
सभी समाया है शून्य में
हमारे दुःख का कारण अज्ञान है. इस जगत की कोई वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति हमें
सुखी-दुखी नहीं कर सकती यदि हम ज्ञान में स्थित हैं. तब हम मन की गुलामी से मुक्त
हो जाते हैं, मन ही हमें भटकाता है, क्षुब्ध करता है. अपनी इच्छा पूरी न होने पर
दुःख व्यक्त करता है, अन्यों को भी दुखी करता है. ऐसा वह सोचता है, जबकि अन्य भी
सुखी या दुखी अज्ञान के कारण ही होते हैं, लेकिन जानते नहीं हैं. अभी बुद्धि मन की
गुलाम है ज्ञान होने पर मन बुद्धि के शासन में रहेगा. आत्मा की निकटतम पड़ोसी
बुद्धि है, धीरे-धीरे जब बुद्धि प्रखर होगी तो आत्मा की झलक उसमें मिलेगी. और उस
क्षण सारे संशय नष्ट हो जाते हैं, हमारी निज की कल्पनाएँ भी चूर-चूर हो जाती हैं,
तब पहली बार सही अर्थों में मुक्ति का अहसास होता है. मुक्ति अर्थात मन में शासन
से मुक्त होना, वास्तव में मन कुछ है ही नहीं, परत दर परत हटाते जाएँ तो नीचे कुछ
भी दिखाई नहीं देता. जो शून्य है वही अस्तित्त्व है, वही परम शांति है, वही प्रेम
है ऐसा प्रेम जो बांधता नहीं है. तब जगत की निस्सारता का अनुभव होता है. वह जगत जो
हम अपने मन में ही रचते हैं. हमारे मन में स्वयं का रचा हुआ संसार है जो बाहर के
जगत का हमारा स्वयं का संस्करण है. अपने जीवन की पुस्तक हम स्वयं लिखते हैं और उसे
सुखद या दुखद बनाने का दायित्व नितांत हमारा ही है.
Thursday, July 19, 2012
भीतर का संसार अनोखा
जून २००३
ध्यान उस परमात्मा से मिलने का द्वार है, और ध्यान तभी टिकता है जब मन खाली हो,
उसमें इस नश्वर जगत की उधेड़-बुन न चल रही हो, कोई संशय न हो और कोई कामना भी न हो.
जगत आत्मा को दे भी क्या सकता है, साधक को अपने लक्ष्य तक पहुंचने की कामना के
अतिरिक्त कुछ याद नहीं रहता. सत्य की सत्ता में अटूट विश्वास, उसके प्रति अनन्य
श्रद्धा, और असीम प्रेम यही उसकी पूंजी होती है. इन सबको हृदय में धर कर वह ध्यान
में बैठता है तो भीतर जैसे अमृत कलश छलक उठता है. वे पल अनुपम होते हैं, फिर समय
का ध्यान नहीं रहता, भीतर से जैसे कोई तार जुड़ जाता है, वास्तव में क्या होता है
उसे भी ज्ञात नहीं होता. वह अकथनीय है, अवर्णनीय है. लेकिन उर में एक विश्रांति का
अनुभव होता है, उस के प्रेम का अनुभव उसकी निकटता का अनुभव, भीतर का संसार अनोखा
है वहाँ उजाला ही उजाला है, संगीत है. परमात्मा रसमय है, प्रेममय है.
Sunday, June 17, 2012
मन गोपी सा हो पावन
अप्रैल २००३
गो का अर्थ है इन्द्रियाँ तो गोपी वही है जिसका अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण है,
मन भी तो छठी इंद्री है, तभी हम परमात्मा के साथ आनंद नृत्य में शामिल होने के
योग्य होते हैं. यदि कोई व्याधि सताए तो समझना चाहिए कि यम, नियम का पालन नहीं
हुआ, कहीं न कहीं मनमुखता हुई है. सत्संग हमें मन को स्थिर रखने के कितने उपाय
बताता है, संशयों और भ्रांतियों को दूर करता है. सत्य से जुडना सिखाता है. सत्य से
ही हमारी शोभा है, वही प्रेम है और प्रेम हमें मुक्त करता है. अंतर में रूहानी
संगीत व नृत्य का अनुभव कराता है. प्रातः काल जैसे हम स्नान करते हैं, वैसे ही सत्संग
का जल हमारे मन के स्नान के लिये है. संतों की वाणी वह उबटन है जो हमारे मन का मैल
रगड़–रगड़ कर स्वच्छ करता है. और वह फूल जैसा महकने लगता है. और तब वह उस ईश्वर को
अर्पित होने के काबिल बन ही जाता है. मनरूपी पुष्प जब उनके पास पहुंचता है तो
प्रभु उसे स्वीकार कर लेते हैं.
Friday, March 16, 2012
हर जगह बस वही तो है
जनवरी २००३
भक्त परमात्मा की उपस्थिति को अपने भीतर-बाहर हर जगह महसूस करता है. जब हम भीतर बाहर एक से होते हैं तभी उसे अनुभव कर पाते हैं. जब हम तृष्णा से बंधे नहीं होते, सब कुछ हो रहा है, ऐसा जानते हैं, तभी उसको जान सकते हैं. उसको जानने के लिये उसके जैसा तो होना ही पड़ेगा. परमात्मा ही गुरु बनकर हमें ज्ञान देता है उसके प्रति कृतज्ञता का भाव बने, सबमें उसे देखना आ जाये तो अहंकार व आसक्ति से हम बच जाते हैं. मन के संशय भी मिट जाते हैं. जन्म-मरण की पटरियां ही तो हमने पार करनी हैं फिर मन में इतना ताना-बाना बुनने की क्या आवश्यकता है, एक उसी का आश्रय पर्याप्त है. नाव पानी में रहे तब तो ठीक है पानी नाव में आ जाये तो वह डूब जाती है.
Tuesday, February 21, 2012
श्रद्धा ही मंजिल है
दिसम्बर २००२
हमारी कथनी और करनी में अंतर जितना अधिक होगा मन में संशय का कुहरा भी उसी अनुपात में बढ़ेगा. कोई घटना कितनी देर तक मन पर प्रभाव डालती रहती है इससे भी दम्भ के घने होने का पता चलता है. ऐसे में कोई सहायता कर सकता है तो वह है श्रद्धा...वही इस संशय को दूर कर सकती है. वही हमें अपने स्वभाव में टिकाती है तब दिखावे या आडम्बर की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती. तब प्रार्थना उठने से पूर्व ही सुन ली जाती है. जीवन का लक्ष्य एक हो, राह एक हो, मन में दृढ़ता हो, तभी मंजिल मिलेगी. अंतर में प्रेम का झरना सूखने न पाए, रिसता रहे, बूंद-बूंद ही सही, संवेदना भीगी रहे, वाणी में रुक्षता न आये न आँखों में परायापन, प्रेम सभी पर समरस रूप से बरसे तब ही मानना चाहिए कि श्रद्धा अटूट है.
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