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Sunday, June 17, 2012

मन गोपी सा हो पावन


अप्रैल २००३ 
गो का अर्थ है इन्द्रियाँ तो गोपी वही है जिसका अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण है, मन भी तो छठी इंद्री है, तभी हम परमात्मा के साथ आनंद नृत्य में शामिल होने के योग्य होते हैं. यदि कोई व्याधि सताए तो समझना चाहिए कि यम, नियम का पालन नहीं हुआ, कहीं न कहीं मनमुखता हुई है. सत्संग हमें मन को स्थिर रखने के कितने उपाय बताता है, संशयों और भ्रांतियों को दूर करता है. सत्य से जुडना सिखाता है. सत्य से ही हमारी शोभा है, वही प्रेम है और प्रेम हमें मुक्त करता है. अंतर में रूहानी संगीत व नृत्य का अनुभव कराता है. प्रातः काल जैसे हम स्नान करते हैं, वैसे ही सत्संग का जल हमारे मन के स्नान के लिये है. संतों की वाणी वह उबटन है जो हमारे मन का मैल रगड़–रगड़ कर स्वच्छ करता है. और वह फूल जैसा महकने लगता है. और तब वह उस ईश्वर को अर्पित होने के काबिल बन ही जाता है. मनरूपी पुष्प जब उनके पास पहुंचता है तो प्रभु उसे स्वीकार कर लेते हैं.