प्रेम कोई कृत्य नहीं है, यह मन की एक अवस्था है जिसमें कोई द्वंद्व नहीं है, विरोध नहीं है, पूर्णत: स्वीकार भाव है।, मन जब तरंगित तो हो पर उद्वेलित ना हो, उत्साह से भरा हो पर उत्तेजित ना हो। आतुरता तो हो पर किसी कार्य को अथवा बात को ऐसे ही होना चाहिये, ऐसी अकुलाहट ना हो। मन की इस शांत अवस्था का नाम ही प्रेम में होना है। शांति के उपवन में ही प्रेम का फूल खिलता है और इस पुष्प से आनंद की सुगंध विसर्जित होती है। सुख इस फूल की कली अवस्था का नाम है। ऐसे में मन में न दीनता रहती है न हीनता, अर्थात स्वयं की शक्ति का पूर्ण ज्ञान होता है । कोई विकार भी वहाँ ठहर नहीं पाता।
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Sunday, January 9, 2022
Friday, May 22, 2020
बीज ध्यान का बोया जिसने
ध्यान एक बीज के रूप में हमारे भीतर प्रकृति द्वारा प्रदान किया जाता है. जन्म के साथ ही शिशु को यह उपहार मिलता है, इसमें वह संभावनाएं छुपी होती हैं जिन्हें वह भविष्य में प्राप्त कर सकता है. इस बीज को जब मन की भूमि में बोया जाता है, इसे श्रद्धा का जल मिलता है और विश्वास की धूप तो यह अंकुरित होने लगता है. धीरे-धीरे यह पौधे से वृक्ष बनता है एक दिन इस पर प्रेम और भक्ति के पुष्प लगते हैं, जिनकी सुवास से मन का कोना-कोना भर जाता है. ध्यान का यह बीज अनेकों के जीवन में बिना अंकुरित हुए ही रह जाता है, तब जीवन रूखा-सूखा ही रहता है. हो सकता है ऐसे लोग बुद्धि के द्वारा श्रेष्ठ पदों को प्राप्त कर लें पर उनके अंतर में बसंत नहीं आता, बाहर से उसे लाने के उपाय करने पड़ते हैं. जीवन में कृत-कृत्यता का अनुभव नहीं होता, वह सन्तोष नहीं आता जिसे पाकर सब धन फीके लगते हैं. गुरुजन ध्यान की इतनी महिमा इसीलिए करते हैं, इसके नियमित अभ्यास से हमारे भीतर के द्वार खुलने लगते हैं, एक गहन शांति और स्थिरता का अनुभव मन को होता है. इस अनिश्चतता भरे वातावरण में यदि मन सदा डांवाडोल होता रहे तो मानव को चैन कैसे मिल सकता है. इसलिए क्यों न आज से ही हम ध्यान को हम अपने जीवन का एक हिस्सा बनाएं.
Tuesday, July 2, 2019
शुभता का जब कुसुम खिलेगा
यदि कोई सत्य की राह में चलता है तो उसे अस्तित्त्व से अपने आप मार्ग मिलने लगता
है. यदि कोई सिर बन्दगी में झुकता है तो आशीर्वाद उसी तरह अपने आप बरसने लगते हैं,
जैसे खाली जगह देखकर हवा कहीं से चली ही आती है. इस सृष्टि में हरेक के लिए अवसर
है. इस जीवन से हम क्या चाहते हैं, यह भर हमें तय करना है. हृदय की गहराई से निकली
हर चाह अपनी पूर्ति के लिए ऊर्जा साथ लेकर ही उत्पन्न होती है. जैसे एक बीज में
फूल बनकर खिलने का पूरा सामर्थ्य है वैसे ही हर शुभ इच्छा एक बीज ही है जो एक न एक
दिन खिलने वाली है. हमारा आज वही तो है जो कल हमने चाहा था, आने वाला कल भी हमें एक
खाली कैनवास की तरह मिला है, जिसमें रंग भरने की हमें पूरी आजादी है.
Tuesday, June 11, 2019
कोई जान रहा है सब कुछ
बगीचे से कोकिल की आवाज निरंतर
आ रही है. खिड़की से बेला के फूलों की गंध आकर सहज ही नासापुटों को आकर्षित करती
है. आँखें कम्प्यूटर की स्क्रीन पर लगी हैं तो कभी की बोर्ड पर. अभी भोजन का समय
नहीं हुआ है और कोई सम्मुख नहीं है, इसलिए मुख बंद है. पंखे की हवा का स्पर्श
त्वचा को शीतलता प्रदान कर रहा है. पंच इन्द्रियों के माध्यम से मन ही तो प्रकट हो
रहा है. मन ही सुन, सूँघ, देख, व महसूस कर रहा है. इसके साथ-साथ यह लेखन का कार्य
भी मन के द्वारा ही हो रहा है, जिसने तय किया है कि सुबह का यह समय लेखन के लिए
देना है. लिखने में कोई त्रुटी होने पर बुद्धि इसमें सुधार करवा देती है. किंतु मन
के पीछे बैठकर भी कोई यह सब देख रहा है, वह मौन है, पर सब जानता है, वह उस बुजुर्ग
की तरह है जो घर की बैठक में रहते हुए भी घर की सारी हलचल को भांपता रहता है और सदा सबके लिए
शुभ आशीषें देता रहता है. उस साक्षी को मन नहीं जान सकता, बुद्धि उसकी तरफ इशारा
कर सकती है, कुछ देर शांत होकर उसमें खो सकती है. तब वही रहता है और रहती है एक सरस
शांति. उस शांति का अनुभव करके बुद्धि जब लौट आती है तो पहले से ज्यादा सशक्त हो
जाती है. ध्यान का यही परिणाम है.
Friday, March 8, 2019
खिलकर ही जीवन मिलता है
सत्य समग्रता में मिलता है विश्लेषण में खो जाता है. हम एक फूल
को देखते हैं और उसकी सुन्दरता से मुग्ध हो जाते हैं, उस बीज का हमें स्मरण ही
नहीं आता जिसने इस फूल तक की यात्रा में क्या-क्या सहा है. बीज से फूल बनने को जो
एक क्षण में देख लेता है वही परमात्मा के जगत होने को भी स्वीकार कर सकता है. फूल
कोमल है, सुंदर है, सुगंध से भरा है, अपनी और खींचता है, लुभाता है, बीज में ऐसा
कुछ भी नहीं, कोई विशेषता नहीं कि हम उसे अपने घरों, मंदिरों या केशों में सजाएं. हाँ,
बीज के भीतर अंकुरित होने की शक्ति है जो समुचित आधार पाकर विकसित हो सकती है. ऐसे
ही जगत रंगीन है, अपने रूप, रंग, गंध, स्वाद और स्पर्श से आकर्षित करता है, परमात्मा
निर्विशेष है, उसे आप किसी को दिखा नहीं सकते, वह अदृश्य है. उससे ही सब कुछ हुआ
है. उसके साथ यदि कोई जुड़ जाता है तो सहज ही वह भी विकसित होने लगता है, उसका अहम
गल जाता है और आत्मा का जो बीज भीतर सुप्तावस्था में था, प्रस्फुटित होने लगता है.
Monday, February 11, 2019
जरा जाग कर देखे कोई
११ फरवरी २०१९
जीवन पल-पल बदल रहा है, अभी अभी जो फूल खिला था, देखते ही देखते
मुरझाने की तैयारी करने लगता है. अभी-अभी मन उत्साह से भरा था, किसी छोटी सी बात
से कुम्हलाने लगता है. हम इस खिलने और मुरझाने को ही सत्य मानकर कभी सुखी और कभी
दुखी होते रहते हैं. संत कहते हैं, जैसे सपने में कोई दुर्घटना का शिकार होता है
तो जगते ही राहत की श्वास लेता है. ऐसे ही जीवन के स्वप्न से जब कोई जग जाता है,
तो पहली बार राहत से भर जाता है. धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में
पहले और अंतिम दो पुरुषार्थ इसी जागरण की ओर ले जाने के लिए हैं. यदि साधक का
लक्ष्य उसके सम्मुख स्पष्ट हो, तब अर्थ और काम भी इसमें सहायक हो सकते हैं. यदि
कोई धर्म और मोक्ष को अपने जीवन में कोई स्थान ही न दे तो उसका सारा जीवन ही सुख-दुःख
से भरे एक स्वप्न की तरह भी बीत सकता है.
Wednesday, August 15, 2018
मार्ग उसे जिस पल देंगे हम
१६ अगस्त २०१८
आत्मा रूप से परमात्मा
हरेक के भीतर समान रूप से विद्यमान है. वह हमारे कर्मों द्वारा प्रकट होना चाहता
है. संत उसे मार्ग दे देते हैं और हम उसके मार्ग में अड़ कर खड़े हो जाते हैं. हमारी
कामनाएं उसके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं, ध्यान की गहराई में जब मन खो जाता है,
वही वह रह जाता है. प्रकृति उसे सहज रूप से अभिव्यक्त होने दे रही है, इसी लिए
इतनी आकर्षक प्रतीत होती है. नन्हे पंछी और शावक भी उसी को अभिव्यक्त कर रहे हैं और
सुकोमल फूल भी. मानव का मन यदि स्वच्छ पानी की तरह निर्मल और हर पात्र में ढल जाने
वाला हो, नमनीय हो, तो परमात्मा उसमें से स्वयं को व्यक्त कर सकता है. हमारा
स्वभाव यदि पर्वत की तरह कठोर है, झुकना ही नहीं जानता हो तो श्वास से भी सूक्ष्म
परमात्मा उसमें से कैसे प्रकटेगा.
Monday, June 11, 2018
खिले सुमन सा मन जिस क्षण
११ जून २०१८
प्रकाश, हवा और जल के बिना एक नन्हा सा फूल भी आँखें नहीं खोल पाता, साथ ही उसे धरती
का आधार भी चाहिए और बढ़ने के लिए आकाश भी. मानव मन के संबंध में प्रकाश ज्ञान का प्रतीक
है, वायु सजगता का और जल प्रेम का, धरती है देह और आकाश है आत्मा. मन को यदि उड़ान
भरनी है तो देह को स्वस्थ व सबल रखना होगा. शास्त्रों और गुरुजनों द्वारा बताए गये
ज्ञान का अनुसरण करना होगा, अंतर में प्रेम को पनपने का अवसर देना होगा, यानि
भावपक्ष भी सबल हो और बुद्धि पक्ष भी तभी मन आत्मा के आकाश में ऊपर और ऊपर जा सकता
है, जहाँ जाकर सारे भेद समाप्त हो जाते हैं. जैसे एक बीज फूल बनकर तृप्त होता है,
मन भी जब पूरा खिल जाता है, तभी तृप्ति का अनुभव करता है.
Monday, December 5, 2016
मन है छोटा सा
६ दिसम्बर २०१६
जैसे हम अपने घर में वस्तुओं का संग्रह करते रहते हैं, न केवल आवश्यक वस्तुओं का बल्कि कई बार तो ऐसी वस्तुओं का भी जिनकी आवश्यकता कभी नहीं पड़ती अथवा तो पुरानी वस्तुएं जिनकी उपयोगिता भी नहीं रही ; उसी तरह हम मन में विचारों का भी संग्रह करते चले जाते हैं, मन जो एक उपवन बन सकता था उसे अस्त-व्यस्त जंगल बना देते हैं जहाँ यादों के जाल हैं और मान्यताओं और विश्वासों के कैक्टस भी. जहाँ फूल खिलने के लिए सूर्य की रौशनी को पहुँचने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है. आस-पास का वातावरण खुला-खुला हो, जरूरतें कम हों तो मन भी हल्का रहता है और इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि इस दुनिया से रुखसत करते समय हमें अल्प पीड़ा होगी क्योंकि जो छूट रहा होगा वह थोड़ा सा ही होगा।
Monday, May 18, 2015
तृष्णा मिटेगी परम प्रेम से
फरवरी २००९
हर
संवेदनशील व्यक्ति को एक न एक दिन खुद को पहचानने की यात्रा शुरू करनी होगी, तन
मिट्टी से बना है, मन ज्योति से बना है. मन को भरना इस संसार से सम्भव नहीं हो
सकता, वह विराट चाहता है, अनंत ही उसकी प्यास को बुझा सकता है. हमारा मन जब अपने
मूलरूप को पहचान लेता है, घर लौट आता है तो उसका आचरण, उसका बाहरी दुनिया से
संपर्क का तौर-तरीका ही बदल जाता है. प्रेम, शांति और अपनापन वह परमात्मा से पाता
है सो बाहर लुटाता है, जितना वह लुटाता है उतना-उतना परमात्मा उसे भरता ही जाता
है. स्वयं की पहचान उसे सभी मानवों से जोड़ती है सभी जैसे उसी के भाग हैं, कोई पृथक
नहीं, सभी का भला ही उसकी एकमात्र चाह रह जाती है, उसके जीवन में मानो फूल ही फूल खिल
जाते हैं !
Saturday, May 16, 2015
मन सुमन हुआ जब महकेगा
हमारे भीतर
परमात्मा पल रहा है, जिसके अंतर में एक बार भी परमात्मा के लिए प्रेम जगा है मानो
उसने उसे धारण कर लिया, अब जब तक परमात्मा बाहर प्रकट नहीं हो सकेगा, हम चैन से
नहीं बैठ सकेंगे. हमारा दुःख इसलिए नहीं है कि हम उससे दूर हैं वरन इसलिए कि वह
भीतर ही है और हम उसे खिलने नहीं दे पा रहे. कली जो फूल बनना चाहती है पर बन नहीं
पाती, कितनी पीड़ा झेलती होगी. हम भी जो अहंकार, मान, मोह, लोभ और कामनाओं द्वारा
दंश खाते हैं इसलिए कि आनंद, प्रेम, शांति और सुख जो भीतर ही हैं, पर ढक गये हैं,
लेकिन एक गर्भिणी स्त्री जिस तरह अपने बच्चे की रक्षा करती है वैसे ही हमें अपने
भीतर उस ज्योति की रक्षा करनी है, एक न एक दिन उसे जन्म देना ही है. हमारी चाल-ढाल,
रहन-सहन खान-पान ऐसा होना चाहिए मानो एक कोमल निष्पाप शिशु हमारे साथ-साथ
जगता-सोता है, हमारी भाषा हमारे विचार ऐसे हों कि उसे चोट न पहुंचे क्योंकि उसका
निवास तो मन में है. भीतर जो कभी-कभी असीम शांति का अनुभव होता है वह उसी की कृपा
है और वह परमात्मा हमें चुपचाप देखा करता है हमारे एक-एक पल की खबर रखता है. वह
स्वयं बाहर आना चाहता है पर हमारी तैयारी ही नहीं है, उसका तेज सह पाने की तैयारी
तो होनी ही चाहिए. वह भीतर से आवाज लगाता है, कभी हम सुनते हैं कभी दुनिया के
शोरगुल में वह आवाज छुप जाती है.
Tuesday, May 5, 2015
मन जब उपवन बन जाता
जनवरी 2009
जिसके भीतर
अस्तित्त्व उतरता है, उसके भीतर फूल खिलते हैं, महोत्सव उतर आता है. ऐसे अपूर्व
महोत्सव से कोई बुद्ध बरसने निकल पड़ता है, महावीर बांटने को निकल पड़ता है. उसकी
नजर दूसरे पर नहीं, वह भीतर अपने केंद्र पर टिका है. वह जान लेता है, दूसरों को न
तो सुख दे सकते हैं न दुःख दे सकते हैं. दूसरों पर साधक की नजर रहती ही नहीं, वह
तो अपने होने को साधता है, वह करने न करने से ऊपर उठ जाता है.
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Monday, March 16, 2015
बीत न जाये फिर बसंत यह
जुलाई २००८
हम जो
पाना चाहते हैं वह ठीक है लेकिन जिस राह से चल कर पाना चाहते हैं, वह राह गलत है.
हमारी हर खोज व्यर्थ हो जाती है क्योंकि जिसे हम खोज रहे हैं वह संसार दे नहीं
सकता. हमरा मन कहीं बैठना ही नहीं चाहता क्योंकि वह हर वक्त किसी न किसी तलाश में
रहता है. परमात्मा के बिना उसका कोई ठौर नहीं, वह संसार में भी उसी को खोज रहा है,
पर संसार के पार ही वह मिलता है. हम जिसे
फूल बनकर चाहते हैं वह काँटा बनकर चुभने लगता है. भक्त संसार के सौन्दर्य को भी
परमात्मा का ही मानता है. यह जीवन तो बसंत है और सारा जगत उल्लास से भरा है, पर हम
सो रहे हैं. एक बार यदि हम जग जाएँ तो वह बसंत जीवन में आ सकता है जो परम है. साधना
में कुछ नया नहीं करते, बस दिशा बदलनी है. हम जिस प्रेम भरी नजर से इस संसार को
देखते हैं उसी नजर को हमें परमात्मा को देखने में भी लगाना है. हमारे भीतर प्रेम
का जो छोटा सा झरना है उसी को एक दिन सागर से मिलाना है. जीवन कब गुजर जायेगा पता
ही नहीं चलेगा, हमारी असली सफलता इसी में है कि भीतर के अमृत से जुड़ जाएँ, अपने
असली प्रियतम को रिझा लें. हमारे चित्त का पंछी उसी अमृत का पान करना चाहता है,
उसी सखा से मिलना चाहता है, हम संसार में लगाने के लाख उपाय करें यह वहाँ नहीं लग
सकता. यह तो शाश्वत को ही चाहेगा. चित्त की बेचैनी का अर्थ है कि वह अपने घर जाना
चाहता है.
Tuesday, March 3, 2015
अमन हुए को वह मिलता
फरवरी २००८
जो स्वरूप
को प्रकट करे वह कला है, और जो ब्रह्म को जान ले वही कलाकार है. ऐसा कोई बिरला ही
होता है, और कोई जान भी ले तो दूसरों को जना नहीं सकता, वह तो और भी बिरला है. सभी
ब्रह्म होने का बीज लिए आते हैं पर बीज लिए ही चले जाते हैं, ऐसे बीज और कंकर में
अंतर ही क्या ? बीज जब अंकुरित हो और फूल खिलाये तभी परमात्मा के दरबार में जा
सकता है. जैसे बीज को मिटना होता है वैसे ही मन को भी मिटना होता है, तभी ब्रह्म
का फूल खिलाना सम्भव होता है. ब्रह्म की झलक मिल भी जाती भी है पर उसे टिकाये रखना
कठिन है. ‘मैं’ भाव छोड़ने को जो तैयार हो जाये वही मन से अमन में चला जाता है.
जिन्होंने त्यागा उन्होंने भोगा. ऋषियों ने इस सत्य को जाना और पाया कि परमात्मा
के सिवा और कुछ यहाँ है ही नहीं !
Sunday, July 6, 2014
असली याद वही करता है
सितम्बर २००६
भक्त
परमात्मा की कृपा को हर क्षण अनुभव करता है. गुरू के वचन उसके लिए अमृत के समान
होते हैं जो भीतर की सारी पीड़ा को धो डालते हैं. वह सद् मार्ग पर चलने के लिए
प्रेरित करते हैं. उनकी दी हुई शक्ति से भर कर वह भविष्य के प्रति आशावान रहता है
और वर्तमान के प्रति सजग. भक्त कभी उसे याद न भी करे तो वह स्वयं अपनी याद दिलाता
है. कभी-कभी जो भक्त के भीतर आनन्द के फूल बेवजह ही खिलने लगते हैं, गीत स्वतः
झरने लगते हैं तो उसी ने किसी रूप में पुकारा होता है. उसकी महिमा के गीत यूँही ही
तो नहीं गाए गये. वह क्या है यह तो शायद वह स्वयं भी नहीं जानता.
Monday, June 16, 2014
सुरभि समान सहज सुख राशि
अप्रैल २००६
सच्चा
सुख वह है जो शाश्वत है. वह व्यक्ति, वस्तु, स्थान से मिल ही नहीं सकता क्योंकि ये
सभी प्रतिपल बदल रहे हैं. जब तक हमारी दृष्टि में द्वैत है, वह सुख हमें नहीं मिल
सकता. अद्वैत का अनुभव होते ही दोष दृष्टि मिट जाती है, मन व वाणी का तप तब सहज ही
घटता है. तब यह प्रतीति होने लगती है कि जीवन प्रभु के प्रेम से भरपूर है, उसी तरह
जैसे फूलों में खुशबू. एक अखंड शांति तब साये की तरह हर क्षण साथ रहती है.
Thursday, February 20, 2014
एक चेतना दिप दिप जलती
अगस्त २००५
मानव वास्तव
में मन से परे एक दिव्य चेतना है. अबदल, अचिंतनीय चेतना जो परमात्मा का अंश है.
जहाँ कोई द्वंद्व नहीं है, संकल्प-विकल्प नहीं है, कोई दुःख, कोई नकारात्मकता नहीं
है. वह एक ही तत्व है जो सारे संसार में व्याप्त है. ऐसी चेतना के सान्निध्य में
जब बुद्धि काम करती है तो जगत के साथ सम्बन्ध आत्मीय हो जाते हैं और उतना ही तीव्र
वैराग्य भी भीतर जगता है. आत्मा का जिसे बोध हुआ है वह एकांत में भी प्रसन्न है और
भीड़ में भी. वह कालातीत, भावातीत और शुभ-अशुभ से परे है. उसे जगत से कोई स्वार्थ
नहीं साधना है. वह एक फूल की तरह हो जाता है, जो बस खिलना चाहता है, खिलना जानता
है और अपनी सुगंध बिखेर कर चुपचाप झर जाता है. वह कुछ होना नहीं चाहता वह ‘हो’ गया
है.
Friday, November 22, 2013
श्रद्धावान लभते ज्ञानम्
अप्रैल २००५
आनन्द
की राशि, परमात्मा हमारे भीतर है तो हमें उदास होने की क्या जरूरत है, यह तो ऐसा
ही हुआ कि फूलों के ढेर हमारी गोद में हैं और खुशबू हमसे दूर रहे. भीतर जब
जिज्ञासा और श्रद्धा का जन्म होता है तो पहले प्रेम फिर ज्ञान का उदय होता है और
आनन्द का स्रोत भीतर फूट पड़ता है. भय का नाश हो जाता है, मन झुक जाता है, भीतर
खाली हो जाता है, जैसे जन्मों का बोझ उतर गया हो. भक्त को पंख मिल जाते हैं, वह कौतुक
से भर जाता है, सरल, सहज हो जाता है. उसके भीतर का आनन्द बाहर भी प्रवाहित होने
लगता है. वह अन्यों के मन के भाव पढ़ने लगता है. जगत के साथ उसके सम्बन्ध पारदर्शी
हो जाते हैं.
Thursday, October 10, 2013
खाली मन झलकाए उसको
मार्च २००५
हमारे
मन में न जाने कितने प्रकार के भय छिपे हैं, चेतन मन के भय दिख जाते हैं, अचेतन मन
के भय जो छिपे रहते हैं कभी-कभी उभर कर सताते हैं. मृत्यु का भय तो मूल है. हम
जानते नहीं कि जन्म के साथ ही मृत्यु शुरू हो जाती है, धीरे-धीरे हम सभी उसका
ग्रास बनने की तैयारी में हैं, यह जीवन जो ऊपरी तौर पर स्थायी प्रतीत होता है,
कहाँ स्थायी है, हर क्षण बदल रहा है, हमारी सोच भी बदलती है. प्रियजनों से बिछड़ने
का भय हो या अकेलेपन का भय उसी को सताता है जो अपने भीतर नहीं गया, भीतर प्रेम का
एक अजस्र स्रोत बह रहा है उसे पा लेने के बाद जगत में रहकर भी साधक अपने आप में
रहता है, आत्मा में ही संतुष्ट रहता है. जगत उसके लिए कुछ करे ऐसी उसकी आकांक्षा
नहीं रहती, वह स्वयं जगत के लिए क्या करे, यही भाव उसमें प्रबल रहता है. उसका होना
एक फूल के समान होता है, उसमे सिर्फ लुटाने की चाह है, अपना सब कुछ खाली कर देने
की चाह, क्योंकि खाली मन में ही उसके प्रियतम का आगमन होगा, वह सदा प्रतीक्षारत
रहता है जगत की नहीं जगदीश की.
Saturday, July 27, 2013
जग जाये जब प्रीत पुरानी
नवम्बर २००४
ईश्वर से यदि हमें प्रेम है तो यह सबसे सहज कार्य है, यह
तो होना ही है, इसमें प्रयास करना पड़े तो हम असहज हो जाते हैं. ईश्वर है और हम
हैं, और हममें प्रेम ही प्रेम है. जैसे सूरज है, दिन है, प्रकाश है. हमारा होना
उतना ही सहज हो जाये जैसे साँस का आना-जाना तो हमें कोई अभाव नहीं रहता निज स्वभाव
में रहते हैं, और प्रेम करना उसी तरह हमारा स्वभाव है जैसे कोयल का गाना और फूलों
का खुशबू फैलाना. हमारे भीतर से दिव्य संगीत का फूटना भी उतना ही स्वाभाविक है और
बंद आँखों को प्रकाश का दर्शन होना भी. स्वभाव में टिकते ही कुछ करना नहीं होता सब
कुछ होने लगता है. कर्ता भाव नहीं रहता तो थकान का नाम भी नहीं रहता. अहंकार ही
हमें विषाद ग्रस्त करता है, थकाता है दूसरों से पृथक करता है. अहंकार शून्य होते
ही हम निर्भार हो जाते हैं फूल की तरह, हवा की तरह, आकाश की तरह. तब कोई प्रतिवाद
नहीं, प्रतिरोध नहीं, आक्षेप नहीं, हम तब हम प्रकृति से अभिन्न हो जाते हैं.
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