नरेन से स्वामी विवेकानंद बनाने की गाथा से कौन भारतीय अपरिचित है।भारत के युवाओं के खोए हुए आत्मविश्वास को पुनः लौटने के लिए जितना बड़ा योगदान विवेकानंद ने किया है, वह अतुलनीय है। उनके ओजस्वी भाषण पढ़कर आज भी हज़ारों युवा मन आंदोलित होते हैं। ”उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्त वरान्नि बोधत” का संदेश देकर उन्होंने भारतीय होने के मूल उद्देश्य को स्वर दिए हैं। अनंत काल से जिस दिव्य वाणी का उद्घोष हमारे वेद करते आ रहे हैं, उसे भुलाकर जब देशवासी दासता, अशिक्षा, कुरीतियों और अंधविश्वास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए थे, तब उनके रूप में जैसे नव आशा का बिगुल बजा हो या आकाश में कोई सूर्य दमका हो। उनके इस महान कार्य को संपादित करने में उनके गुरू की भूमिका से भी सभी परिचित हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के दिव्य ईश्वरीय प्रेम और दिव्य शक्तियों के कारण वह उनकी ओर खिंचते चले गए और उन्हीं के ज्ञान व उपदेशों को आत्मसात करके जगत में दिव्य संदेश देने निकल पड़े। आज उन्हीं महापुरुष की जयंती है।
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Tuesday, January 11, 2022
Friday, July 3, 2020
चैतन्य: आत्मा -शिव सूत्र
शिव कहते हैं जिस आत्मा को तुम ढूंढ रहे हो वह चैतन्य है. यह संसार जड़-चेतन दोनों से बना है, इसमें जहाँ-जहाँ चेतना हो वहाँ मुझे खोज लेना. एक धूल के कण और एक जीवाणु में कौन चेतन है ? एक जगे हुए और एक सोये हुए व्यक्ति में कौन ज्यादा चेतन है ? हमारा मन जब निद्रा और तन्द्रा से भरा हो या किसी खतरे को देखकर सौ प्रतिशत सचेत हो तो दोनों में से कौन ज्यादा चेतन है ? यह चेतना जब किसी बुद्ध पुरुष में उस तरह खिल जाती है जैसे कोई कमल का फूल तो वहीं शिव प्रकट हो जाते हैं. मन जब अतीत के कारण पश्चाताप से भरा हो, भविष्य की चिंता से भरा हो या वर्तमान में तुलना से भरा हो तो चेतना पर एक आवरण छा जाता है. इसी को अहंकार कहते हैं जो शिव से जुदा रखता है. गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, शिव आदि गुरु हैं.
Sunday, July 28, 2019
गुरू की महिमा कौन बखाने
शब्द
अधूरे हैं, अल्प सामर्थ्य है शब्दों में. भाव गहरे हैं, अनंत ऊर्जा है भावों में, किंतु गुरू
के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी हो तो भाव भी कम पड़ जाते हैं. वहाँ तो मौन ही शेष
रहता है. जब उसके हृदय से साधक का हृदय जुड़ जाता है तो मौन में ही संवाद घटता
है. गुरू के शब्द और कर्म प्रेम से ही उपजे हैं. वह नित जागृत है, करुणा, प्रेम और
जीवन के प्रति उत्साह के भाव उसके हृदय में लबालब भरे हैं. उसका ज्ञान एक पवित्र
जल धारा की तरह साधकों के मनों को तरोताजा कर देता है. उसके हृदय का वृक्ष शांति,
सुख और आनंद के फलों से लदा है, जो वह बेशर्त प्रदान करता है. उसकी आँखों में
प्रेम की मस्ती है, आत्मा में बेशकीमती खजाना है, जो वह लुटा रहा है. वह साधकों के
अंतर में साधना का बीज बोता है, जो भी व्यर्थ है उसे उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित
करता है, जो भी अच्छा है, उसे बाड़ लगाकर सहेजने के लिए कहता है. उसके भीतर से
जो स्वर्गिक संगीत निकलता है, उसे सुनकर साधक जीवन के सुन्दरतम रूप को देखते हैं.
उसकी आत्मा के प्रकाश में भीग कर उनमें भी भीतर जाने की ललक जगती है, पावों में
पंख लग जाते हैं, मन जीवन के प्रति तीव्र चाह से भर उठता है.
Monday, July 8, 2019
आशीषें ही जो देते हैं
'मातृ देवो भव', 'पितृ देवो भव', 'गुरू देवो भव' और 'अतिथि देवो भव' का अतुलित
संदेश वेदों में दिया गया है. गुरू में दिव्यता का अनुभव हम कर सकते हैं, क्योंकि
वह ईश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, अतिथि में भी हम दिव्यता की धारणा कर सकते हैं,
किंतु जिसने माँ और पिता में दिव्यता के दर्शन कर लिए उसके जीवन में सहजता अपने आप
आ जाती है. शिशु जब छोटा होता है वह पूरी तरह से माँ-पिता पर व परिवार पर निर्भर
होता है, जैसा वातावरण और शिक्षा उसे मिलती है, उसके मन पर वैसी ही छाप पड़ने लगती
है, पूर्व के संस्कार भी समुचित वातावरण पाकर ही विकसित होते हैं. इसमें माता-पिता
की बड़ी भूमिका है. जो पीढ़ी अपने बुजुर्गों का सम्मान करना भूल जाती है, वह अपने
भविष्य के लिए अंधकार का निर्माण ही कर रही है. आयु में अथवा पद में चाहे कोई
कितना भी बड़ा हो जाये, जब तक सिर पर कोई स्नेह भरा हाथ हो, तब तक एक रसधार भीतर
बहती है. निस्वार्थ प्रेम का जो वरदान माँ-पिता से मिलता है, उसका कोई विकल्प नहीं
है.
Monday, November 26, 2018
छिपा सांत में है अनंत भी
२६ नवम्बर २०१८
अध्यात्म हमें देहाध्यास
से छुड़ाकर आत्मा में स्थित होने की कला सिखाता है. जन्म के साथ ही सबसे पूर्व हमारा
परिचय अपनी देह के साथ होता है. एक प्रकार से देह को ही हम अपना स्वरूप समझने लगते
हैं. जैसे जैसे शिशु बड़ा होता है, उसका परिचय अपने आस-पास के वातावरण व संबंधियों
से होता है. उसका नाम उसे सिखाया जाता है, धर्म, राष्ट्रीयता और लिंग के आधार पर
उसे उसकी पहचान बताई जाती है. जीवन भर यदि कोई व्यक्ति इसी पहचान को अपना स्वरूप
समझता रहे तो वह जीवन के एक विराट सत्य से वंचित रह जाता है. गुरू के द्वारा जब यह
पहचान दी जताई है, तब उसका दूसरा जन्म होता है, इसीलिये ब्राह्मण को द्विज कहा
जाता है. यह पहचान उसके वास्तविक स्वरूप की है, जो एक अविनाशी तत्व है. स्वयं के
भीतर इसका अनुभव करने के लिए ही गुरू के द्वारा साधना की एक विधि दी जाती है. सभी
साधनाओं का एकमात्र लक्ष्य होता है साधक को देहाध्यास से मुक्त कराकर अपने असीमित
स्वरूप का भान कराना. यही अध्यात्म विद्या है और यही भारत की जगत को सबसे बड़ी देन
है.
Friday, August 25, 2017
अँधा अंधे ठेलिए दोनों कूप पडंत
२६ अगस्त २०१७
अंधश्रद्धा मानव को किस कदर
विवेकहीन बना देती है इसका उदाहरण हरियाणा और पंजाब में हो रहे घटनाक्रम को देख कर
मिल रहा है. राष्ट्र की सम्पत्ति को हानि पहुँचाने वाले इतना सा सच भी नहीं देख पा
रहे हैं कि अंततः वे अपनी ही सम्पत्ति को नष्ट कर रहे हैं. जो साधना उनमें इतना सा
भी विवेक जागृत नहीं कर सकी, उसका न होना ही अच्छा है. गुरू का काम है शिष्यों के
जीवन से अज्ञान का अन्धकार दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाये, किंतु आज तथाकथित
गुरू लोगों की श्रद्धा का लाभ उठाकर अपने स्वार्थ के लिए उनका उपयोग करते हैं.
आश्चर्य होता है जब पढ़े-लिखे लोग भी उनकी चाल में फंस जाते हैं. आज भारत के लिए
कितना दुखद दिन है जब हिंसा और आगजनी की घटनाएँ एक अपराधी को बचाने के लिए हो रही
हैं. सभी जागरूक लोगों को ऐसे अंधभक्तों से भारत को बचाना होगा.
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Saturday, July 8, 2017
गुरू हमारे मन मन्दिर में
९ जुलाई २०१७
जीवन में गुरू का पदार्पण एक अद्वितीय घटना है, इसे एक महान घटना भी कहा जाये तो
कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. जब किसी के मन में सत्य के लिए, गुरू के लिए प्यास जगती
है तो परमात्मा की व्यवस्था से गुरू का आगमन होता है. यह सही है कि शिष्य ही गुरू
को नहीं खोजता गुरू भी किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा शिष्य तक पहुँच जाते हैं. जब
तक जीवन में गुरू की सच्ची आवश्यकता महसूस नहीं हुई है तब तक हम उसके महत्व को समझ
नहीं पाते, लेकिन उसकी इतनी कृपा है कि अपने ज्ञान और प्रेम के बल पर वह हमारे मन
में उस चाह को भी जगाता है. इसलिए चाहे अभी हमें गुरू के महत्व की जानकारी हो या न
हो, गुरू के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने की ललक भीतर जगाएं और व्यास
पूर्णिमा के इस सुंदर पर्व पर अपने जीवन को सुंदर दिशा दें.
Thursday, June 22, 2017
सहज मिले अविनाशी
२३ जून २०१७
हमारे मन की गहराई में एक अवस्था ऐसी भी है जहाँ किसी भी बाहरी घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जो आदि काल से एकरस है और जो अनंत काल तक ऐसी ही रहेगी. सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है मन की वह अवस्था, जो जीवन का स्रोत है. विचार का भी स्रोत है. जब तक मन अपनी उस स्थिति से एक नहीं हो जाता, वह अभाव का अनुभव करता ही रहेगा. योग का उद्देश्य मानव को उसी स्थिति का अनुभव कराना है. उस अवस्था तक पहुँचने के लिए ही हम साधना के पथ पर कदम रखते हैं, और जो पहले वहाँ पहुंचा हुआ है वह गुरू ही हमें वहाँ तक ले जा सकता है. उसने वह मार्ग भली प्रकार देखा है, वह मन को भीतर-बाहर से अच्छी तरह समझ गया है. उसके निर्देशन में साधना करते हुए हम सहजता से अपने मूल तक पहुंच जाते हैं. गुरू के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति प्रेम हमारे मार्ग को रसमय व सुंदर बना देते हैं.
Friday, December 19, 2014
जब जागो तभी सवेरा
जुलाई २००७
“जब जागें तभी सवेरा” हम
सोये हुए हैं, स्वप्न ही देखकर अपना जीवन बिता रहे हैं. शास्त्र व गुरू कहते हैं
हर पल सजग रहना है. मन, वचन, काया से हमसे किसी को उद्वेग न हो. यदि कभी किसी का
दिल दुःख ही जाये तो प्रायश्चित करना चाहिए, जैसे हर दिन तन को स्वच्छ करते हैं वैसे
ही हर रात सोने से पूर्व दिन भर की भूलों का स्मरण करके मन को धो डालना चाहिए. हर
परिस्थिति में सम भाव में रहने का तप करने से भी विकार नष्ट हो जाते हैं.
Tuesday, December 2, 2014
हर बाधा को पार करे मन
जून २००७
साधना के
पथ पर आगे बढने में कुछ बाधायें हैं – व्याधि, आधि, प्रमाद, आलस्य, उत्साह हीनता,
विषयों में रूचि, अनुभव में न टिक पाना, कर्मों का असर ! सबसे पहले तो मानव जन्म
मिले, साधना में रूचि मिले, गुरू मिलें, अनुभव भी हों, साधना करने की सुविधा मिले,
इसका शुक्रिया अदा करना चाहिए. जीवन साधना के पथ पर चलने के लिए ही है ऐसा दृढ
निश्चय हो जाये. गुरू पर अगाध श्रद्धा हो और जीवन की कद्र हो. सच्ची संतुष्टि हो,
सत्य के प्रति भक्ति हो जो तभी मिलेगी जब भीतर कोई कामना न हो, स्पर्धा न जगे,
देने का भाव हो, न दे सके तो भी असंतोष न हो. जीवन में प्रमाद न हो. शरण में गये
बिना इससे छुटकारा नहीं. जप भी इन दोषों से
मुक्त करा सकता है. मन में जप चलता रहे तो मन प्रमादी नहीं होगा.
Sunday, July 6, 2014
असली याद वही करता है
सितम्बर २००६
भक्त
परमात्मा की कृपा को हर क्षण अनुभव करता है. गुरू के वचन उसके लिए अमृत के समान
होते हैं जो भीतर की सारी पीड़ा को धो डालते हैं. वह सद् मार्ग पर चलने के लिए
प्रेरित करते हैं. उनकी दी हुई शक्ति से भर कर वह भविष्य के प्रति आशावान रहता है
और वर्तमान के प्रति सजग. भक्त कभी उसे याद न भी करे तो वह स्वयं अपनी याद दिलाता
है. कभी-कभी जो भक्त के भीतर आनन्द के फूल बेवजह ही खिलने लगते हैं, गीत स्वतः
झरने लगते हैं तो उसी ने किसी रूप में पुकारा होता है. उसकी महिमा के गीत यूँही ही
तो नहीं गाए गये. वह क्या है यह तो शायद वह स्वयं भी नहीं जानता.
Monday, April 28, 2014
रहें भीतर जियें बाहर
जनवरी २००६
भगवान
की निकटता का अनुभव करना ही भक्त का धर्म है और मन जब उससे दूर जाये तो वही अधर्म
है. भगवान के वियोग में बहे आंसू ही भक्त की सम्पत्ति है, अर्थ है. भगवान की कामना
ही काम है. उसका सुमिरन ही मोक्ष है. उसकी निकटता का अनुभव गुरू कृपा से होता है,
तब धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अर्थ ही बदल जाते हैं. जीवन का उत्थान ही हमारा
ध्येय हो जाता है. सन्त कहते हैं, “रहो भीतर, जीओ बाहर”, उनके अनुसार विपरीत तत्व
जन्म से मृत्यु तक हमारे साथ रहते हैं. जीवन के हर पहलू पर वे हमें चिन्तन करना
सिखाते है. टुकड़ों में बंटी जिन्दगी से दूर एक पूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करते हैं. सद्गुरु
व परमात्मा के आश्रय में हम कितने सुरक्षित हैं. उनकी कृपा का जल मन की सूखी धरती
को हरा-भरा कर देता है.
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