आज के समय में लोग बाहर इतना उलझ गये हैं कि अपने भीतर जाने की राह नहीं मिलती। कहीं कोई प्रकाश का स्रोत मिल जाये तो वे उसके पास जमा हो जाना चाहते हैं। आश्रमों में भीड़ बढ़ती जा रही है। कथाओं, मंदिरों, सत्संगों में भी भीड़ ज्यादा है। जनसंख्या बढ़ती जा रही है यह कारण तो है ही, पर सामान्य जीवन में इतना दुख, इतनी अशांति है कि लोग कुछ और पाना चाहते हैं। संत कहते हैं, साधना करो, भीतर जाओ, अंतर्मुखी बनो, पर ऐसा कोई-कोई ही करते हैं। अधिकतर तो भगवान को भी बाहर ही पाना चाहते हैं। कोई प्रार्थना की विधि पूछते हैं तो कोई भगवान पर भी मानवीय गुणों को आरोपित कर उसे बात-बात पर क्रोध करने वाला बना देते हैं। कुछ रिश्तों के जाल में उलझ गये हैं। वे उससे बाहर नहीं निकल पाते, कोई जाति, धर्म, लिंग भेद में धंस गये हैं । स्त्री-पुरुष के मध्य समानता के नारे लगाये जाते हैं, पर स्त्रियों के प्रति होने वाले अपराधों की संख्या बढ़ती जा रही है।ऐसे में जब तक योग व अध्यात्म को जीवन का एक आवश्यक अंग बनाकर उसकी शिक्षा नहीं दी जाती, मानव जीवन में अशांति को दूर नहीं किया जा सकता।
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Monday, June 19, 2023
Wednesday, March 11, 2015
जहाँ मिले विश्राम वही घर
मई २००८
बाहर हमें
जो भी मिलता है वही हमारा प्राप्य है पर भीतर का क्षेत्र हमारा अपना है, जहाँ हम
जो चाहे पा सकते हैं. वहाँ आत्मा का साम्राज्य है, वह कल्पतरु है, जो माँगो उससे
मिलता है. वहाँ मौन है, शांति है, आनंद है, प्रेम है, सुख है, ज्ञान है और शक्ति
है. भीतर की दुनिया अनोखी है, जहाँ विश्रांति है, जहाँ मन ठहर जाता है, बुद्धि
शांत हो जाती है, जहाँ चित्त डूब जाता है. जहाँ कोई उद्वेग नहीं है, कोई लहर नहीं
है, जहाँ अनोखा संगीत गूँजता है, जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है. जहाँ जाकर लौटने की
इच्छा नहीं होती. वह हमारा अंतरस्थल ही हमारा आश्रय स्थल है. वही हमारा घर है.
बाहर तो जैसे कुछ देर के लिए हम घूमने जाएँ या बाजार जाएँ या किसी से मिलने जाएँ
अथवा तो दूसरे शहर या दूसरे देश जाएँ !
Thursday, December 11, 2014
भीतर जिसको मिला ठिकाना
जुलाई २००७
‘रहो भीतर, जीओ बाहर’ यह ध्यान का
सूत्र है. आत्मज्ञान होने पर साधक भीतर रहना सीख जाता है. ‘भीतर’ हमें सारे दुखों
से मुक्त करके आश्रय देता है. जब तक भीतर कोई केंद्र नहीं है, कोई वहाँ टिके भी तो
कैसे. हम वास्तव में परमात्मा का अंश हैं इसे भुलाकर मन, बुद्धि तथा देह को ही
सत्य मानकर उनके सुख-दुःख में लिप्त होते रहते हैं. वे हमें साधन रूप में मिले
हैं, पर हम इन्हें ही साध्य मान लेते हैं, उनको संतुष्ट करना ही अपना लक्ष्य बना
लेते हैं. जबकि आत्मा ही साध्य है. इस संसार में जो कुछ भी हमें मिला है, कर्मों
के अनुसार ही मिला है, उनमें राग-द्वेष करने से हम नये कर्म बांधेंगे, यदि समता में
रहेंगे तो शांति से उन कर्मों को करेंगे जो हमारे प्रारब्ध में हैं तथा नये कर्म
करने पर कर्ता भाव से मुक्त रहेंगे.
Tuesday, February 25, 2014
आँख मिचौली खेलें आ
अगस्त २००५
ध्यान
में पहले-पहल स्थूल सत्य प्राप्त होते हैं, धीरे-धीरे मन जब सूक्ष्म हो जाता है,
सूक्ष्म सत्य भी मिलने लगते हैं. इन्हीं सत्यों को देखते-देखते परम सत्य तक जाया
जा सकता है. मन अद्भुत है, हमें उसकी शक्ति
का ज्ञान ही नहीं है, ईश्वर ने कैसी अद्भुत रचना मन के रूप में की है, वह स्वयं भी
वहीं रहता है, वह चाहता है कि हम उसे खोजें. मन ही वह साधन है जिसके द्वारा हम
धीरे-धीरे भीतर जाते हैं और जाते-जाते एक दिन उस सच्चाई को पा लेते हैं जो जानने
योग्य है और दुखों से सदा के लिए मुक्त करने वाली है.
Friday, December 27, 2013
सत्यं परम धीमही
जून २००५
हमारा भीतर
जब तक बिगड़ा है, बाहर भी बिगड़ा रहेगा. झुंझलाहट, अहंकार, कठोर वाणी, अवमानना तथा
प्रमाद ये सारे अवगुण बाहर दिखाई देते हैं पर इनका स्रोत भीतर है, भीतर का रस सूख
गया है, सत्संग का पानी डालने से भक्ति की बेल हरी-भरी होगी फिर रसीले फल लगेंगे
ही. संसार का चिन्तन अधिक होगा तो उसी के अनुपात में तीन ताप भी अधिक जलाएंगे.
प्रभु का चिन्तन होगा तो माधुर्य, संतोष, ऐश्वर्य तथा आत्मिक सौन्दर्य रूपी फूल
खिलेंगे. कितना सीधा-सीधा हिसाब है. अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष तथा अभिनिवेश आदि
क्लेश हमें सताते हैं. आत्मज्ञान न होना, अहंकार, मृत्यु से भय तथा मोह इन्हीं के
कारण हैं. बुद्धि जब तक सात्विक नहीं होगी, दृढ निश्चय वाली नहीं होगी तब तक इनके
शिकार हम होते ही रहेंगे. ईश्वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारी बुद्धि को
प्रकाशित करे.
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