धर्म के मूल में तीन बाते हैं, हम कहाँ से आये हैं, हम कहाँ हैं और कहाँ जाने वाले हैं? इनकी खोज ही हमें धर्म की ओर ले जाती है. संतों की वाणी सुनकर हमारे भीतर अपनी वास्तविक स्थिति का बोध जगता है. जिस क्षण कोई अपने सामने पहली दफा खड़ा हो जाता है, आमने-सामने..उसी क्षण वह सत्य को जान जाता है. उस क्षण उसके भीतर संसार से ऊपर उठने, जगने और व्यर्थ कामनाओं से मुक्त होने की चाह जगती है. वास्तव में हम उसी एक तत्व से आये हैं, उसी में हैं और उसी में लौट जाने वाले हैं. लेकिन लौटने से पूर्व हमें देखना है कि भीतर सुई की नोक के बराबर भी द्वंद्व न बचे, उसका मार्ग बहुत संकरा है, उसमें से एक गुजर सकता है। दुई मिटते ही सारा अस्तित्व हमारी सहायता को आ जाता है, आया ही हुआ है. बाहर से संत, शास्त्र व भीतर से दैवीय प्रेरणा मिलने लगती है और हम उसकी ओर बढ़ते चले जाते हैं. जहां वह है वहाँ सभी ऐश्वर्य हैं। वह हितैषी है, अकारण दयालु है, वह ही तो है जिसने यह खेल रचा है. अंतत: वह स्वयं ही तो इस सीमित जगत के रूप में दिखायी दे रहा है। जबकि वास्तव में वह अलिप्त है और अनंत है।
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Thursday, February 2, 2023
Sunday, January 20, 2019
साईं इतना दीजिये
२१ जनवरी २०१९
मन की गागर को
जितना भरें वह खाली ही रहती है, हर उपलब्धि कुछ दिनों बाद कम पड़ जाती है. हर अनुभव
कुछ दिनों बाद खो जाता है. भीतर एक रिक्तता का अहसास है कि जाता ही नहीं, एक तलाश
जैसे हर बार कुछ नया पाने को उकसाती है. एक खोज निरंतर चलती ही रहती है, और यही
खोज मानव को एक दिन उसकी असलियत से रूबरू करा सकती है. उसी असलियत को संत और
शास्त्र नये-नये उपायों से समझा रहे हैं, ज्ञान योग, भक्ति योग या कर्म योग उसी एक
मंजिल पर ले जाने के लिए है. यहाँ तक कि यदि कोई सजग होकर अपने सामान्य जीवन का भी
अध्ययन करे तो वह उसी निष्कर्ष पर पहुँच जायेगा. वास्तव में मन की गागर की कोई
पेंदी ही नहीं है, अतल है उसकी गहराई और अनंत है उसकी चाहने की क्षमता. एक जन्म तो
क्या हजार जन्म लेकर भी इस मन को तृप्त नहीं किया जा सकता, एक तरह से हम सभी एक
असाध्य कार्य में लगे हैं. कितना अच्छा हो कि अपने पुरुषार्थ द्वारा जो मिला है
उसमें संतुष्ट रहकर इस संसार को बेहतर बनाने में जितना हो सके योगदान करें. क्योंकि
देने की ख़ुशी ही वह शै है जो मन को तृप्त कर सकती है.
Sunday, June 18, 2017
जिन खोजा तिन पाइयाँ
२० जून २०१७
जीवन वास्तव में एक खोज का ही नाम है. बाहर की हर खोज के माध्यम से वास्तव में
मानव को अपनी ही खोज करनी है. यह सृष्टि कितनी पुरानी है, कोई नहीं जानता. यहाँ
कुछ भी नया नहीं है, फिर भी सब कुछ हर पल नया सा जान पड़ता है. वास्तव में सब कुछ
मानव पहले कितनी ही बार अनुभव कर चुका है, पर हर बार एक शिशु जब आँख खोलता है तो
उसके लिए यह जगत कितने रहस्यों से भरा होता है. पहले परिवार फिर विद्यालय उसकी
जिज्ञासाओं को शांत करता है, जिन्हें यह अवसर नहीं मिल पाता, वे बच्चे अविकसित ही
रह जाते हैं, उन्हें अपने भीतर की सम्भावनाओं को खोजने का अवसर ही नहीं मिल पाता.
हर किसी के भीतर एक न एक प्रतिभा छिपी है, जिसे अवसर की तलाश है, किन्तु उसका भान
किसी–किसी को ही हो पाता है. हम स्वयं से ही अपरिचित रह जाते हैं, और यही पीड़ा
विभिन्न रूपों में जीवन में कितनी बार नये-नये रूप लेकर आती है.
Tuesday, February 25, 2014
आँख मिचौली खेलें आ
अगस्त २००५
ध्यान
में पहले-पहल स्थूल सत्य प्राप्त होते हैं, धीरे-धीरे मन जब सूक्ष्म हो जाता है,
सूक्ष्म सत्य भी मिलने लगते हैं. इन्हीं सत्यों को देखते-देखते परम सत्य तक जाया
जा सकता है. मन अद्भुत है, हमें उसकी शक्ति
का ज्ञान ही नहीं है, ईश्वर ने कैसी अद्भुत रचना मन के रूप में की है, वह स्वयं भी
वहीं रहता है, वह चाहता है कि हम उसे खोजें. मन ही वह साधन है जिसके द्वारा हम
धीरे-धीरे भीतर जाते हैं और जाते-जाते एक दिन उस सच्चाई को पा लेते हैं जो जानने
योग्य है और दुखों से सदा के लिए मुक्त करने वाली है.
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