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Sunday, June 18, 2017

जिन खोजा तिन पाइयाँ

२० जून २०१७ 
जीवन वास्तव में एक खोज का ही नाम है. बाहर की हर खोज के माध्यम से वास्तव में मानव को अपनी ही खोज करनी है. यह सृष्टि कितनी पुरानी है, कोई नहीं जानता. यहाँ कुछ भी नया नहीं है, फिर भी सब कुछ हर पल नया सा जान पड़ता है. वास्तव में सब कुछ मानव पहले कितनी ही बार अनुभव कर चुका है, पर हर बार एक शिशु जब आँख खोलता है तो उसके लिए यह जगत कितने रहस्यों से भरा होता है. पहले परिवार फिर विद्यालय उसकी जिज्ञासाओं को शांत करता है, जिन्हें यह अवसर नहीं मिल पाता, वे बच्चे अविकसित ही रह जाते हैं, उन्हें अपने भीतर की सम्भावनाओं को खोजने का अवसर ही नहीं मिल पाता. हर किसी के भीतर एक न एक प्रतिभा छिपी है, जिसे अवसर की तलाश है, किन्तु उसका भान किसी–किसी को ही हो पाता है. हम स्वयं से ही अपरिचित रह जाते हैं, और यही पीड़ा विभिन्न रूपों में जीवन में कितनी बार नये-नये रूप लेकर आती है. 

Sunday, November 30, 2014

नील गगन के पार चलें अब

जून २००७ 
जैसे ईश्वर सभी के हृदयों में निवास करता है वैसे ही प्रत्येक के अंतर में विश्वास भी होता है और संदेह भी. विश्वास बढ़ता रहे तो व्यक्ति भक्त हो जाता है, संदेह बढ़ता रहे तो जिज्ञासु हो जाता है. लेकिन जहाँ विश्वास न बढ़े तो अंधविश्वासी और संदेह न बढ़े तो अज्ञानी रह जाता है. भक्त और जिज्ञासु एक दिन स्वरूप में ही पहुंच जाते हैं. जब अपनी खबर मिलने लगती है तो परिवर्तन शुरू होने लगता है. भक्ति और ज्ञान दो पंख हैं जिनसे हम अनंत आकाश में उड़ सकते हैं. भक्ति जीवन का पंख है और ज्ञान मृत्यु का. मानव रूपी पक्षी को यदि नील गगन में उड़ान भरनी है तो जीवन के साथ मृत्यु का भी वरण करना होगा. दिन उजाला है तो मृत्यु रात्रि है, दिन के साथ रात न हो तो जीना कठिन हो जाये.

Monday, June 27, 2011

उच्च जीवन


मारे मन में ये तीन वृत्तियाँ मुख्य होती हैं, इच्छा, प्रेम और जिज्ञासा. यदि इनका स्द्पुयोग करें तो मन शांत होता है. इच्छा अर्थात अनगिनत कामनाओं की पूर्ति की अभिलाषा, यदि ये कामनाएं सत्वगुण से प्रेरित होंगी तभी द्वंद्व मिटेगा अन्यथा बना ही रहेगा. प्रेम यदि ईश्वरीय गुणों, जैसे सत्य, अहिंसा, शांति, आदि से होगा तभी आनंद फलित होगा और जिज्ञासा की प्रवृत्ति यदि जीवित रहेगी तो एक न एक दिन अंतिम सत्य की प्राप्ति की सम्भावना रहेगी. लेकिन यदि खोजने की इच्छा नहीं है, जानने की उत्सुकता नहीं है, और हम एहिक कार्यों में ही जीवन बिता देते हैं, छोटे-छोटे सुखों-दुखों से ऊपर उठने की हममें न तो सामर्थ्य है न ही आवश्कता, तो हमारा जीवन भी सामान्य ही रह जायेगा.