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Wednesday, June 2, 2021

जाकी रही भावना जैसी

 श्रद्धा की पूर्णता तभी है जब हम स्वयं के प्रति पूर्ण आश्वस्त हो जाएँ, हम अपनी क्षमताओं के प्रति, अपने इरादों के प्रति तिल मात्र भी संदेह नहीं रखें। हमारा मन पूर्ण श्रद्धा से भरा है तो जगत का व्यवहार स्वयं ही बदल जाता है। यह सारा जगत एक ही तत्व  से बना है, यहाँ एक के प्रति किया गया संदेह पूर्ण के प्रति ही सिद्ध होता है। इसका आरम्भ स्वयं से ही होता है। अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते हुए जब हम जीते हैं तो संदेह कैसा ?स्वयं के प्रति किया अविश्वास ही जगत के प्रति हमारे संदेह का कारण है, और वही औरों के द्वारा हमारे प्रति किए गये व्यवहार में प्रतिफलित होता है। दूसरे हमारे साथ जो भी व्यवहार करते हैं, वह हमारे खुद के प्रति व्यवहार को ही दर्शाता है।


Sunday, November 30, 2014

नील गगन के पार चलें अब

जून २००७ 
जैसे ईश्वर सभी के हृदयों में निवास करता है वैसे ही प्रत्येक के अंतर में विश्वास भी होता है और संदेह भी. विश्वास बढ़ता रहे तो व्यक्ति भक्त हो जाता है, संदेह बढ़ता रहे तो जिज्ञासु हो जाता है. लेकिन जहाँ विश्वास न बढ़े तो अंधविश्वासी और संदेह न बढ़े तो अज्ञानी रह जाता है. भक्त और जिज्ञासु एक दिन स्वरूप में ही पहुंच जाते हैं. जब अपनी खबर मिलने लगती है तो परिवर्तन शुरू होने लगता है. भक्ति और ज्ञान दो पंख हैं जिनसे हम अनंत आकाश में उड़ सकते हैं. भक्ति जीवन का पंख है और ज्ञान मृत्यु का. मानव रूपी पक्षी को यदि नील गगन में उड़ान भरनी है तो जीवन के साथ मृत्यु का भी वरण करना होगा. दिन उजाला है तो मृत्यु रात्रि है, दिन के साथ रात न हो तो जीना कठिन हो जाये.

Saturday, May 17, 2014

एक भरोसा राम का

मार्च २००६ 
साधक को संदेह से अवश्य बचना चाहिए, हर कीमत पर बचना चाहिए, हम संदेह तो जल्दी कर लेते हैं पर भरोसा करने में बहुत देर लगा देते हैं, जिनको हम प्रेम करते हैं उन्हीं पर जब हम संदेह करते हैं तो हम स्वयं पर ही अविश्वास कर रहे होते हैं. एक बार जिसे अपने हृदय का स्वामी बना लिया, तब उस पर संदेह करना अपने हृदय पर संदेह करना ही हुआ. सत्य को कभी सिद्ध करना ही नहीं होता, जिसे परीक्षा से गुजरना पड़े वह सत्य नहीं है. सत्य तो स्वयं सिद्ध है और जब यह भीतर प्रकटता है तो सारे भ्रम मिट जाते हैं, एक सजगता भीतर रहती है जो किसी विवाद को प्रश्रय नहीं देती, तब सहज ही समाधान होने लगता है. साधक की दृष्टि चेतन पर होती है, तब स्वयं पर भरोसा होने लगता है, सभी के भीतर उसी सत्य को देख पाने की दृष्टि भी जगती है. जगत पर तब प्रेम ही उमड़ता है, दोष नहीं दीखता, तब जगत लीला के रूप में खुलता जाता है.

Thursday, March 15, 2012

सत्य और स्वप्न


जनवरी २००३ 
यह दुनिया स्वप्न की नाईं है यहाँ कुछ भी सत्य नहीं है, सत्य मात्र एक वही द्रष्टा है, हमें उसी का चिंतन करना है, जन्म और मृत्यु शाश्वत सत्य हैं, इस संसार के रास्ते पर जो भी हमें दिख रहा है वह सब बदलने वाला है, सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है. जिसका भी जानना होता है वह विनाश को प्राप्त होगा ही. जिसका भी जन्म होगा वह मरेगा ही. सभी कुछ काल के अधीन है. जाने-अनजाने सब उसी एक सत्य की खोज में हैं, कोई पहली सीढ़ी पर कोई पाँचवी तो कोई सौवीं पर पहुँच गया है. आसक्तियों की रस्सियाँ हमें इधर-उधर खींचती रहती हैं, हम पुनः इस मरणशील जग के पीछे ही चल पड़ते हैं. दम्भ को अपना लेते हैं, वाणी का संयम भूल जाते हैं, संदेह के बादल छा जाते हैं. लेकिन जब हृदय में भक्ति का प्रकाश होता है, तन-मन फूल की तरह हल्के हो जाते हैं. सब कुछ स्पष्ट हो जाता है. अंतर सौम्यता से भर जाता है. हमारी चेतना पवित्र है क्योंकि वह परमात्मा से जुड़ी है.