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Wednesday, January 22, 2014

मुदिता की हम करें साधना

जून २००५ 
हमारे चित्त की जैसी चेतना है, कर्म का फल उसी के अनुसार मिलता है. शरीर के कर्म का फल नहीं मिलता. कर्म के पीछे की भावना ही प्रमुख है, पहले मन में ही कर्म उत्पन्न होता है. निर्मल चित्त से किया गया कर्म सुख का कारण बनेगा. सत्कर्म करते हुए मन मुदित होता है, यदि मुदिता का स्वभाव बनता जाये तो फल भी मोद के रूप में प्राप्त होगा. चित्त शुद्ध करने का कर्म भी एक बीज है जो वक्त आने पर सुख का ही फल देगा. हमारी गति हमारे ही हाथ में है, अवनति में दुर्गति तथा उन्नति में सद्गति है.