वर्तमान समय, जीवन जब एक तरफ कोरोना के कारण आपदा में घिरा है तो दूसरी ओर मानवीय शक्ति और क्षमता को परखने का स्वर्ण काल भी है. जीवन को किस तरह बचाएं इसके लिए दुनिया भर में वैज्ञानिक शोध कार्य कर रहे हैं. कम साधनों में किस तरह जीवन चलाएं इसके प्रति भी लोग सजग हो रहे हैं. भौतिकता को त्याग सादा जीवन उच्च विचार की परिपाटी पर चलने का समय भी यही है. कितने ही व्यवसाय बन्द हो चुके हैं, साथ ही कार्य के नए - नए क्षेत्र भी खुल रहे हैं. निराश होकर उदास होने का समय नहीं है, यह सजग और सतर्क रहकर जीवन को इस प्रकार जीने का समय है कि कम से कम ऊर्जा की खपत हो और अधिक से अधिक साधन बचाये जा सकें. वैज्ञानिकों की मानें तो कोरोना काल अभी लम्बा खिंचने वाला है. देश को अधिक दवाइयों, स्वास्थ्यकर्मियों व अस्पतालों की जरूरत होगी, साथ ही देशवासियों को अधिक मनोबल और मानसिक शक्ति की भी जरूरत होगी. नियमित जीवनशैली अपना कर, जिसमें योग, ध्यान हो, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले आहार हों तथा समाज व देश के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने की ललक हो तो हम इस विपदा काल में भार नहीं बनेंगे बल्कि भार वाहक बन सकते हैं.
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Sunday, July 19, 2020
Tuesday, July 14, 2020
जीवन का जो पाठ पढ़ेगा
जीवन एक पाठशाला ही तो है, यहाँ हर दिन, हर किसी को, कोई न कोई परीक्षा देनी होती है. जब कोई देख न रहा हो तब भी कोई देखता है कि जब करुणा दिखाने का वक्त था तो हम कितने उदार थे. अचानक कोई विपदा आ पड़ी तो हमने कितनी शीघ्रता से उसका समाधान ढूंढ लिया. सामने वाला हमसे सहमत न हो रहा हो तो झट उसके दृष्टिकोण से हम वस्तुओं को भांप सकते हैं या नहीं इसकी भी परख होती है. जब देह को कोई रोग सताये तो हम कितनी जल्दी साक्षी भाव में आकर स्वयं को दर्द से बचा ले जाते हैं. जीवन में आ रहे परिवर्तन को कितनी आसानी से हम स्वीकार कर लेते हैं और दृढ़ता से उसका सामना करते हैं. कुछ भी हो जाये हमारी आशा की डोर टूटी तो नहीं, इसकी भी परीक्षा होती है. परमात्मा के प्रति आस्था और श्रद्धा में रंच मात्र भी कमी तो नहीं आती, कृतज्ञता की भावना ने हमारे अंतर को आप्लावित तो कर दिया है न. असीम धैर्य और आत्मविश्वास की पूंजी घट तो नहीं रही. जैसा जीवन हम चाहते हैं उसी के अनुरूप हमारे कर्म भी हो रहे हैं या नहीं. ये सभी छोटी-छोटी बातें यदि जीवन में हैं तो अवश्य ही हम जीवन की पाठशाला से सफल होकर जाने वाले हैं.
Thursday, August 8, 2019
अति का भला न बरसना
"अति का
भला न बोलना, अति की भली न चूप, अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप" अति
किसी भी वस्तु की हो हानिकारक होती है. आज देश में वर्षा की अति हुई लगती है,
दक्षिण के सभी राज्य बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे हैं. उससे पूर्व बिहार और असम भी
इस विपदा का शिकार हुए. गुजरात व महाराष्ट्र के कितने ही जिले पानी में डूब गये,
जब शहरों में इतनी बुरी हालत है तो गांवों की तो कल्पना ही की जा सकती है. जब घरों
में पानी भर जाता है, लोगों की बरसों की जमापूंजी, सामान, घर-बिस्तर सब कुछ नष्ट
हो जाते हैं. इस प्राकृतिक विपदा का सामना यूँ तो हर वर्ष ही करना पड़ता है, किंतु
इस साल यह महामारी की तरह सब जगह फ़ैल गयी है. बरसात न हो तो सूखे की सी स्थिति हो
जाती है, अब भूमि में जल का स्तर निश्चित रूप से बढ़ जायेगा. बाढ़ के साथ आई ताजी
मिटटी खेतों को उपजाऊ कर देगी. उम्मीद है सरकार और देशवासियों के सहयोग से इस
विपत्ति का सामना मानव की जुझारू प्रवृत्ति किसी न किसी तरह कर ही लेगी और बरसात
का मौसम थमते ही थमते गाड़ी पटरी पर आ जाएगी. किंतु उस समय का उपयोग यदि जिला
प्रशासन व्यवस्था पक्के नाले बनाने में करे, प्लास्टिक का उपयोग कम से कम हो,
जिससे पानी का निकास न रुके. जल को संचित करने के लिए बड़े जलाशयों का निर्माण हो
तब अगले वर्ष बाढ़ आने की नौबत शायद नहीं आये, यदि अधिक बरसात हुई भी तो उसका ज्यादा
असर नहीं होगा.
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