जब तक हमारे जीवन में
राग-द्वेष हैं, तब तक हमें कर्म करने ही पड़ेंगे, साधना करते-करते जब मन खाली हो
जायेगा, तब अस्तित्त्व हमारे द्वारा काम कराएगा. जैसे मैले कपड़े को तब तक धोया
जाता है जब तक उसमें मैल रहता है ताकि वह स्वच्छ होकर पुनः इस्तेमाल किया जा सके,
वैसे ही मन जो विषादग्रस्त हो गया है, उसे जगत की परिस्थितियाँ पटक-पटक कर निर्मल
करती हैं, सुख-दुःख दोनों इसलिए आते हैं कि हम उन्हें त्याग कर आगे निकल जाएँ,
खाली मन में प्रेम का उदय होता है, जिससे वह आत्मकल्याण की बात सोचता है, भीतर की
भलाई की बात सोचता है. ऐसा मन अन्यों के लिए उस औषधि की तरह हो जाता है जो ऊपर से
तो कड़वी होती है पर उसका असर लाभप्रद होता है. वह बदले में किसी से कुछ नहीं
चाहता, कोई अपेक्षा उसे जगत से नहीं रहती, लेकिन कोई भी वास्तविक अर्थों में
निरपेक्ष होकर नहीं रह सकता, शरीर के निर्वाह के लिए तो उसे जगत का आश्रय लेना ही
होगा, समाज का, शास्त्रों का गुरु का ऋणी भी होना पडेगा, समाज उसे सुरक्षा प्रदान
करता है, परिवार उसे स्नेह देता है, गुरु उसे ज्ञान देते हैं, तब जाकर वह इस योग्य
बनता है कि निर्भय होकर स्वयं को स्वालम्बी घोषित कर सके, और यदि उसे एक बार
सार्मथ्य मिल जाता है, उसका आत्मबल बढ़ जाता है तो उसे अपनी सारी क्षमता का उपयोग
क्या अब उनकी सेवा में नहीं लगाना चाहिए जिनके कारण वह यहाँ तक पहुंचा है, यहीं
अस्तित्त्व उसे अपना उपकरण बना लेता है.
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Friday, March 29, 2013
Friday, August 3, 2012
जो कर्ता है वही भोक्ता है
जून २००३
हम ईश्वर का आधार ग्रहण करते हैं तो वह हमें अपना निमित्त बनाते हैं, हम जो भी
कार्य करते हैं उसमें कर्ता भाव नहीं होता, कोई अहं नहीं बचता, क्योंकि तब हम जो
भी कर्म करते हैं वह वास्तव में हम नहीं कर रहे, इसका ज्ञान हो जाता है. अज्ञान ही
हममें कर्ता भाव भरता है. सदगुरु हमें उस परमपिता से मिला देते हैं और तब तमस जीवन
से लुप्त हो जाता है, एक अवर्णनीय शांति से अन्तःकरण भर जाता है, वह शांति, आनंद
पहले से ही हमारे भीतर थे, उसे कहीं से लाना नहीं होता ज्ञान भी हम सभी के भीतर है
पर जैसे आँख में पड़ा एक कण पर्वत को लुप्त कर देता है अज्ञान ने इसे ढका हुआ था. कृपा
मिलते ही शीतल, मधुर, रसमय प्रकाश छा जाता है, गुणात्मक रूप से आत्मा व परमात्मा
में कोई भेद नहीं, आत्मा अपने तन-मन का सुख-दुःख अनुभव करती है, पर जब हम सुख-दुःख
की सीमा के पार जाकर उस परमात्मा का आश्रय लेते हैं तो हमें भी असीमता का अनुभव
होता है, अनंत प्रेम, अनंत शक्ति, अनंत ज्ञान, जो वास्तव में हम हैं, का अनुभव
होता है. उसकी उपस्थिति भीतर-बाहर सभी जगह दिखाई देती है, अनहद नाद हमारे रस को
बढ़ाता है, परम का आश्रय हो तो वह हमारा अपनाआप होकर प्रकट हो जाता है.
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