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Wednesday, August 13, 2014

चैतन्य को मीत बनाएं

जनवरी २००७ 
जब भीतर सत्संग की चाह जगे, निर्मोहता बढ़े, प्रेम जगे तो मानना चाहिए कि हरिकृपा बरस रही है. किसी ने कहा है,
इन्सान की बदबख्ती अंदाज से बाहर है
कमबख्त खुदा होकर इन्सान नजर आता है

कृष्ण कहते हैं कि जो चैतन्य के साथ स्वयं को जोड़ता है वह अपना मित्र है जो जड़ के साथ जोड़ता है वह अपना शत्रु है. नश्वर वस्तुओं को पाने में हम स्वयं को बड़ा मानते हैं तो यह छोटापन है, उनके खोने से दुखी हो जाते हैं यह भी दुर्बलता है. क्रोध, मान, माया, लोभ, मोह सभी जड़ हैं, किन्तु कोई दोष हममें है यह मानने से दोष दृढ़ हो जाता है. हमें उसे अपने में न मानकर प्रकृति में मानना है जो परिवर्तन शील है, वह दोष भी बदलने वाला है, जो उत्पन्न हुआ है वह नष्ट होने ही वाला है. अपने दोषों को देखना भर है साक्षी भाव में आते ही दोष मिटने लगते हैं.  

Wednesday, July 27, 2011

भीतर-बाहर


अहंकार रूपी पवन हमारी मन रूपी तरंग को संसार सागर के तट से टकराती रहती है. जो हम इस दुनिया को बांटते हैं, वही हमें वापस मिलता है. सारा ब्रह्मांड एक प्रतिबिम्ब है एक प्रतिध्वनि है. हम जैसा दिखाना चाहते हैं, देखना चाहते हैं, वही हमें दिखाई पड़ता है. जो कुछ बाहर है वही भीतर है और जो कुछ भीतर है वही बाहर है. बाहर की सच्चाई को हम बुद्धि के स्तर पर समझ सकते हैं पर भीतर के सत्य को अनुभूति के स्तर पर समझना होगा. प्रतिपल अंतर को साक्षी भाव से देखने की कला विकसित करनी है. जो भी स्फुरणा जगे उसके प्रति सजग होकर संवेदना को देखना है. धीरे धीरे संवेदना शांत होती जाती है और स्फुरणा भी शांत होती जाती है.