जीवन में सामंजस्यऔर समरसता की साधना करने के लिए शरीर का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है. शरीर का यदि पूरा ज्ञान हो और शरीर के अंगों पर ध्यान किया जाये तो अपने आप ही सामंजस्य की भावना भीतर आने लगती है. शरीर के विभिन्न अंग मिलजुल कर मस्तिष्क की सहायता से काम करते हैं, उसी प्रकार हम समाज में तथा परिवार में रहकर सामंजस्य बना सकते हैं, सबसे जरूरी है हमारा अपने साथ सम्बन्ध अर्थात हमारे मन, बुद्धि का आत्मा के साथ सम्बन्ध, फिर हमारा अपने निकटवर्ती जनों के साथ सम्बन्ध. जब हमारे शरीर की शक्ति का बोध हो जाता है तो प्रमाद, जड़ता तथा आलस्य नहीं रहता, भीतर एक स्फूर्ति का उदय होता है, वह स्फूर्ति हमारे सम्बन्धों में झलक उठती है, तब मन हर क्षण नया-नया सा रहता है, सम्बन्धों में बासीपन नहीं आता, कोई दुराग्रह नहीं रहता, मन तब एक अनोखी स्वतन्त्रता का अनुभव करता है, मन की ऐसी स्थिति कितनी अद्भुत है, कहीं कोई उहापोह नहीं, विरोध नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, बिना किसी प्रतिकार व अपेक्षा के द्रष्टा भाव में जीना आ जाता है.
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Friday, October 8, 2021
Thursday, September 6, 2018
टिका रहे उत्साही मन जब
७ सितम्बर २०१८
जगत परिवर्तनशील है,
मन भी परिवर्तनशील है. सदा सत, रज और तम में डोलता रहता है. प्रारब्ध के अनुसार कभी
भीतर सत प्रबल रहता है कभी रज या तम. पुरुषार्थ करके इसे सदा सत में स्थित रखना
है, और फिर इसके भी पार निकल जाना है. पुरुषार्थ प्रतिदिन करना होगा, जैसे घर में
रोज ही सफाई होती है, तन का नित्य ही स्नान होता है, ऐसे ही मन को सत में टिकने का
प्रयास भी सतत करना होता है. मन किस अवस्था में है इसका भान साधक को तत्क्षण हो
जाता है, जब भी भीतर असहजता का भान हो, स्वर में हल्की सी भी तल्खी आ जाये, तो समझ
में आता है तमस या रजस बढ़ा हुआ है. किसी दिन सुबह नींद से जगने के बाद भी भीतर
स्फूर्ति का अनुभव न हो तो भी जानना चाहिए कि तमस की अधिकता है, और अधिक सावधान
रहने की आवश्यकता है, वरना कर्मों और संबंधों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा. संबंध दर्पण
की तरह हमारे मन का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करते हैं. जिस दिन ऐसा लगे कि मधुरता खो
रही है, सजग होकर सत्व में टिकने का प्रयास करना चाहिए. जीवन का सौन्दर्य एक क्षण
के लिए भी मिटता नहीं है, बस उसे निहारने वाली चेतना चंचलता या जड़ता से धूमिल हो
जाती है.
Tuesday, May 30, 2017
स्वयं से जब संबंध बने
३१ मई २०१७
अहंकार दुःख का भोजन करता है. किसी पल यदि मन में दुःख है तो अहंकार है, यदि कोई
पूर्ण सुख में है तो उस क्षण में अहंकार रहता ही नहीं. हमारा अहंकार जितना बड़ा है
उतने ही बड़े हमारे दुःख होंगे. जब भीतर से अहंकार चला जाता है तब जो खालीपन भीतर
आता है वही शांति है, आनन्द है. ‘मैं’ और ‘मेरे’ से बने सारे संबंध दुःख का कारण
हैं, चाहे वे किसी वस्तु से हों, व्यक्ति से या परिस्थिति से. वास्तव में आत्मा
शून्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं, इसीलिए संत कहते हैं सारे संबंध मिथ्या हैं, मिथ्या
का अर्थ यह नहीं कि वे हैं ही नहीं, वे हैं पर जिस रूप में हम उन्हें संबंध मानते
हैं, उस रूप में नहीं हैं. जब तक हमारा स्वयं के साथ संबंध हमें स्पष्ट नहीं होता
तब तक हम अन्यों के साथ अपने सच्चे संबंध को जान ही नहीं पाते.
Monday, January 26, 2015
एक आँख भीतर को खोलें
जो निकट से भी निकट है
उसे जानना कठिन है, पर क्यों कठिन है ? जो हम स्वयं हैं, उससे विस्मृति कैसे हो
गयी? हम स्वप्न में जी रहे हैं. स्वप्न में ही मिथ्या संबंध जोड़ लेते हैं तभी
वास्तविक संबंध को पहचान नहीं पाते, वह संबंध जो हमारा अपने साथ है. इसी को अध्यास
कहते हैं. हम देह को ही मैं मानते हैं क्योंकि हम इसे बाहर से ही देखते हैं, जब हम
इसे भीतर से देखते हैं तत्क्षण आसक्ति छूट जाती है. वह आँख हमें पैदा करनी है
जिससे हम भीतर झाँक सकें, देह का ठीक-ठीक बोध होते ही देह पर पकड़ ढीली होने लगती
है तब दृष्टि चैतन्य की ओर जाती है. सत्य जानने से ही हम मुक्ति का अनुभव करते
हैं. जब देह से दूरी बढ़ने लगती है तो परमात्मा से निकटता होने लगती है.
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