दूसरों
के दोष देखने से हमारा स्वयं का दोष दृढ हो जाता है क्योंकि हम अन्यों में दोष तभी
देख सकते हैं जब वे पहले हम में हों. भक्ति करने की पहली शर्त है कि अंतकरण शुद्ध हो, मन निर्मल हो. यह जगत ईश्वर का बनाया
है, इसलिए कि हम अपने शरीर को रख सकें, शरीर के उपयोग के लिए यह बना है न कि उपभोग
के लिए. हम इसमें आनन्द ढूँढ़ रहे हैं, इन भौतिक वस्तुओं में आनंद नहीं है, बल्कि
इसके पीछे छिपे चैतन्य में आनन्द है. जैसे पारस यदि डिबिया में बंद हो तो वह लोहे
को सोने में नहीं बदल सकता. सबके भीतर चैतन्य छिपा है उसे उजागर करना है. यहाँ कोई
भी दोषी नहीं है, सभी एक नाटक का पात्र बने हुए अपना अपने रोल निभा रहे हैं. हम कई
जन्मों में यह ज्ञान सुन चुके हैं पर हृदय में धारण नहीं कर पाए. कभी बौद्धिक
व्यायाम के लिए, कभी यश के लिए, कभी दिखावे के लिए हम आज तक भक्ति करते आये हैं.
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Friday, June 27, 2014
Wednesday, January 29, 2014
प्रेम ही पूजा प्रेम ही अर्चन
जुलाई २००५
ध्यान
प्रार्थना की पराकाष्ठा है, जिस प्रभु को हम अपने से दूर मानकर उसकी पूजा करते
हैं, ध्यान में वही हमारे भीतर उतर आता है. ऐसे तो वह सदा से वहीं है पर हमें इसका
ज्ञान नहीं है. ध्यान में उससे थोड़ी सी भी दूरी नहीं रह जाती. उसके और हमारे बीच
की दूरी केवल मन द्वारा मानी हुई है. मन में संकल्प-विकल्प न रहें तो जो बचता है
वह वही है. वह सागर है तो हम उसकी लहरें. वह है तो हम हैं, वही हम हुए हैं इसकी
अनुभूति जब भीतर जगती है तो प्रेम जगता है. शुद्ध प्रेम जब उतरता है तो उसका कोई
लक्ष्य नहीं होता वह सभी के लिए होता है बिना किसी भेदभाव के. चेतन-अचेतन सभी
प्राणियों, वस्तुओं के लिए. इस सृष्टि में सब कुछ प्रेम से ही उपजा है, जो भी
विकृति यहाँ दिखाई देती है , वह प्रेम में आई विकृति है. हमें पुनः शुद्ध प्रेम को
जगाना है, जो स्वयं में इतना परिपूर्ण है कि उसकी सारी शर्तें खो जाती हैं. पूर्ण
में यदि कुछ जुड़े तो भी पूर्ण ही रहेगा और कुछ घटे तब भी, परमात्मा ऐसा ही पूर्ण
प्रेम है.
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