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Friday, December 30, 2016

संग संग वह हर पल रहता

३० दिसम्बर २०१६ 
परमात्मा सदा ही हमारे साथ है. किन्तु जैसे सूर्य उदित होने पर भी यदि हम घर के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद करके बैठे रहें तो उसका ताप व प्रकाश अनुभव में नहीं आता, वैसे ही परमात्मा और हमारे मध्य जब मन अथवा संसार रूपी दीवार आ जाती है तो उसका अनुभव नहीं होता. ध्यान में जब उसमें विश्राम करते हैं तब जगत का लोप हो जाता है. पुनः मन, बुद्धि में आने पर भी उसकी स्मृति बनी रहती है. वह तो तब भी हमें देख रहा होता है. उससे ही हमारा हर श्वास चलता है, उससे ही हर भाव उत्पन्न होता है, वह हमसे पूर्व ही उसे जानता है. चित्त जब केन्द्रित होता है उसकी ही शक्ति समाहित हो रही होती है, जब व्यर्थ के संकल्प-विकल्प उठाता है तब उसी की ऊर्जा व्यर्थ बह रही होती है. जैसे किसी घट में छेद हो तो पानी नहीं टिकता, वैसे ही अस्थिर मन में ध्यान नहीं टिकता. नये वर्ष में क्यों न हम नियमित ध्यान करें.

Friday, March 13, 2015

मुक्त हुए को मिलता है सुख


कृष्ण कहते हैं, सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी इन्द्रियों द्वारा अनुभव किये जाते हैं. आत्मा पर इनका असर नहीं होता. पर हमारा अनुभव है कि जैसे ही कोई नकारात्मक भाव जगता है, भीतर तक सब तपने लगने लगता है. ध्यान में जाते ही यह तल्खी समाप्त हो जाती है. संस्कारों के वशीभूत होकर ही ऐसा होता है. मुक्त आत्मा तो प्रेम व शांति से भरी है. जब भी भीतर असहजता का अनुभव हो तो यह पाप है. जब भी भीतर दुःख हो, क्रोध हो तो अहंकार ही इसका कारण है. जब भीतर शांति हो, सुख हो, प्रेम हो तो मानना होगा कि आत्मा में स्थिति है. जब भीतर ताप होता है तो देह की कोशिकाओं पर इसका असर होता है. चेहरे पर क्रोध के भाव जितनी बार भी पड़ते हैं, अपनी छाप छोड़ते चले जाते हैं. तभी तो संतों का मुखड़ा कितना प्यारा लगता है और अहंकार से भरा व्यक्ति दुखी प्रतीत होता है.


Thursday, November 13, 2014

तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई

अप्रैल २००७ 
जिस तरह मिट्टी अग्नि में तपकर प्याला बन जाती है और उपयोग में आती है, वैसे ही हमारा यह माटी का तन जब ईश्वर की लगन रूपी लौ में तप जाता है तब यह उसके हाथों का उपकरण बन जाता है और काम में आता है. ईश्वर की लगन भी क्रमशः तीव्रतर होती जाती है, पहले राख में छिपी अंगारे की तरह जो ऊपर से दिखायी भी नहीं देती, हमारे भीतर छिपी रहती है, फिर तपते हुए लाल अंगारे की तरह जो प्रकाश भी देता है व ताप भी, फिर गैस की नीली लपट की तरह और फिर माइक्रोवेव ओवन की तरह जो नजर भी नहीं आती बस चुपचाप अपना काम करती रहती है. ज्ञान पा लिया है साधक को यह अहंकार भी छोड़ना होगा पर नहीं मिला है, सदा यह संदेह भी नहीं रखना है. मध्यम मार्ग पर चलना श्रेष्ठ है. आत्मा का परमात्मा से नित्य का संबंध है, हमें बनाना नहीं है, हम स्वयं आत्मा हैं यह बात जितनी भीतर दृढ़ हो जाएगी तो उतना ही हम परमात्मा से अभिन्नता अनुभव कर सकेंगे, और तब शेष ही क्या रहा ?


Wednesday, August 1, 2012

बन जाये वह मीत हमारा


जून २००३ 
वर्षा होती है तो सब ओर शीतलता छा जाती है और ग्रीष्म का ताप कहीं दूर चला जाता है.ऐसे ही जब हृदय में प्रभु प्रेम के बादल छा जाते हैं और भक्ति रूपी वर्षा होने लगती है, प्यास से तृषित मानस धरा पर जब बूंदें बरसती हैं, तो तीनों तापों से मुक्ति मिल जाती है. मन सौम्यभाव में स्थित हो जाता है, सुख-दुःख रूपी पक्षी भी शांत हो जाते हैं. यह जगत एक अनवरत चलने वाली चक्की की तरह है, रात और दिन जिसके दो पाट हैं. हम सभी एक न एक दिन इसमें पिस जाने वाले हैं, कुछ रहस्य ऐसे हैं, जिन पर पड़ा पर्दा ईश्वर उठाना नहीं चाहते, लेकिन वह इतनी कृपा अवश्य करते हैं कि उनका सान्निध्य एक ऐसा भाव जगाता है जिसके सम्मुख मृत्यु भी नहीं टिक पाती, तब जीवन और मरण दोनों एक से प्रतीत होते हैं, अभय प्रदान करती है भक्ति, तब इस देह से उतने ही कार्य मन लेता है जो आवश्यक हों, तब हृदय अनंत का घर बन जाता है, जब प्रेम के अतिरिक्त कोई भावना हमारे किसी कार्य, विचार या शब्द के पीछे नहीं होती, तब परमात्मा हमारा मीत बन जाता है.