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Saturday, October 23, 2021

बहे काव्य की धारा अविरल

काव्य कल्पना की वायवीय उड़ान है तो गद्य वस्तविकता की ठोस भूमि पर चलना। दोनों के क्षण मानव के जीवन में आते रहते हैं। किसी अनोखे आनंद को पाकर, कुछ ऐसा जानकर जो पहले कभी  जाना नहीं गया था अथवा कुछ ऐसा जानकर जो इस जगत का भी जान नहीं पड़ता, मन उस अलौकिक लोक में विचरण करता है। उस रस को व्यक्त करना गद्य में सम्भव ही नहीं है। वह इतना सूक्ष्म है कि शब्दों में भी नहीं समाता, तब कुछ परिचित शब्दों में उसे बहाया जाता है जैसे भूमि पर कोई लकीर खींच दे और बहता हुआ जल उधर की तरफ़ बह जाए। कवि केवल उस अनाम अनुभव को एक रास्ता देता है और वह जो उसके मन को घेरे हुए था, वह ऊर्जा शब्दों के रूप में बह जाती है। शब्द ऊर्जा ही तो हैं, जिनमें भावों का परिवर्तन होता है,  फिर वे स्थित हो जाते हैं। गतिमय ऊर्जा स्थाई हो जाती है। दूसरी ओर जब भीतर का अनुभव स्थायी हो गया हो तो मन में वेग नहीं उठता और अब स्थायी ऊर्जा को गतिमान बनाना है तो गद्य का जन्म होता है। भीतर एक स्थिरता है, शांति है और भाव भी शांत हो गये हैं। कौतूहल अब पहले की तरह ज़मीन से उखाड़ नहीं देता आकाश में उड़ने के लिए, इसलिए शब्द थम- थम कर आते हैं। 


Tuesday, May 31, 2011

ईश्वर और मन


अप्रैल २००० 
पल भर भी सजग न रहें तो मन झट नीचे के स्तरों में चला जाता है. यह प्रयास रहे कि मन उद्ग्विन न हो, ऐसा नहीं कि जोर-जबरदस्ती की जाये, सहज स्वाभाविक स्थिति में यदि मन रहेगा तो शांत रहेगा. आतुरता तो हम ऊपर से ओढ़ लेते हैं, कोई बात मन से न निकलती हो तो जानना चहिये कि सजगता खो गयी. हर क्षण भूत या भविष्य का चिंतन न कर वर्तमान को सही परिप्रेक्ष्य में देखकर जागृति का अनुभव किया जा सकता है. एक सीमा तक ही बुद्धि हमारा साथ देती है, उसके बाद तो ईश्वर का ही आश्रय है. इस जग का जो भी नियंता है, वही हमें आत्म ज्ञान दे सकता है. आत्मा परमात्मा का ही प्रतिबिम्ब है, प्रतिबिम्ब में परिवर्तन करने के लिये वस्तु में परिवर्तन लाना होगा. ईश्वर से प्रेम करना, उसका चिंतन करना ही उसके गुणों को हममें प्रतिबिम्बित करेगा. वह आनंद स्वरूप है सो हमारी मनोदशा भी सहज सुखपूर्ण ही रहेगी.

Tuesday, May 24, 2011

वाणी

मार्च २०००
 मन यूँ तो शांत रहना चाहता है किन्तु उसे उद्वगिन बनाने के लिये पल भर की असजगता पर्याप्त है. वाणी का दोष सचेत न रहने पर ही घटता है, बिना किसी कारण के अभ्यास वश हुआ असत्य भाषण मन को दूषित कर जाता है, चाहे कितना ही छोटा या निर्दोष झूठ भी हो, हमारे मन की बेहोशी की खबर देता है.  टीवी पर जागरण में सुधांशु जी महाराज  बता रहे हैं कि “सबसे भयंकर हिंसा वाणी की हिंसा है. अपनी जिह्वा रूपी गाय को खूंटे से बांध कर रखना चाहिए क्योंकि यह दूसरों के हरे-भरे, मान रूपी बगीचे को तहस-नहस कर सकती है”. भाषा रुखी भी नहीं होनी चाहिए, नहीं तो मौन व्रत ही भला, इससे कितनी परेशानियों से हम बच सकते हैं.
मानव मन शरीर के सुख-दुःख से ऊपर उठना ही नहीं चाहता, इसीलिए मन से परे बुद्धि, बुद्धि से परे आत्मा को जानने की बात हमारे पूर्वजों ने की.     

Saturday, May 21, 2011

धर्म


मार्च २०००
मन को विकारों से मुक्त रखना ही धर्म है. धर्म मात्र बौद्धिक विलासता या तर्क-वितर्क का विषय नहीं है, धर्म तो अनुभव की चीज है, धारण करने से ही धर्म फलता है. ज्योंही मन में राग-द्वेष, अहंकार, मोह, लोभ या ईर्ष्या या अन्य कोई विकार जगता है त्यों ही कुदरत की ओर से फल मिलता है कि व्याकुलता और दुःख मन को घेर लेते हैं. विकारों से मुक्त मन सद्भावना, करुणा और मैत्री से भर जाता है, जिसका परिणाम होता है मन में शांति और आनंद. जो धर्म को जानता, मानता और उसका पालन करता है, वह मन को शुद्ध करने का प्रयास ही नहीं करेगा बल्कि सदा इसी चेष्टा में रहेगा. निर्मल मन का आचरण सदा दूसरों के लिये व अपने लिये सुख लाता है, अशुद्ध मन का आचरण सारे वातावरण को संतापित करता है, अपना व दूसरों का भी अमंगल लाता है. मन की चादर पर कोई दाग न लगे, वह कोरी की कोरी ही रहे इसके लिये हमें अंतर्मुखी होकर उस पर नजर रखनी होगी.