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Monday, September 10, 2018

कबीर मन निर्मल भया


११ सितम्बर २०१८ 
जीवन में प्रतिपल प्रसाद बंट रहा है, प्रसाद का एक अर्थ है प्रसन्नता. निर्मलता और कृपा भी इस उल्लास में शामिल हैं, यह प्रसाद बिना किसी पात्रता के बंटता है, सब पर समान रूप से, बशर्ते कोई इसके लिए उत्सुक हो. जब जीवन में सत्य को जानने की प्यास जगे, किसी जागे हुए संत के प्रति श्रद्धा का भाव जगे और स्वयं को सदा सर्वदा आनंदित देखने की चाह जगे तो समझना चाहिए कि इसी प्रसाद की तलाश है. सुबह से शाम तक हम कितने ही कार्य देह के लिए करते हैं, मन के रंजन के लिए भी हर कोई कुछ न कुछ समय निकाल ही लेता है, पर उसके लिए जो इस देह और मन को चलाता है, जिसके कारण ये दोनों हैं, जो देह के द्वारा जगत में कार्य करता है और मन के द्वारा चिंतन-मनन करता है, उसकी तरफ ध्यान ही नहीं जाता. उसी को इस प्रसाद की आवश्यकता है. नियमित योग साधना और ध्यान से हम उससे परिचित होने लगते हैं और एक दिन उस कृपा को अनुभव भी करते हैं जो प्रतिपल बरस रही है.   

Wednesday, April 25, 2018

हर पल याद रहेगा जब वह


२५ अप्रैल २०१८ 
जीवन में हमने कितने ही प्रसाद पाए हैं. न जाने कितनी बार हम आनंद से भर कर उस परम के प्रति कृतज्ञता के भाव से भर गये हैं. अनगिनत बार प्रकृति के सुंदर रूप देखकर मन आह्लादित हुआ है, स्वजनों के प्रेम में अभिभूत हुआ है. जीवन उत्सव और उल्लास के छोटे-छोटे पलों से मिलकर बना है. परमात्मा आनंद स्वरूप है, और वह हमें भी प्रसन्न देखना चाहता है. उषा का सुंदर वातावरण, उगता हुआ सूर्य, गाते हुए पक्षी और अलमस्त खेलते हुए बच्चों को देखकर किसका मन उत्साहित नहीं हो जाता. दोपहरी को दूर से आती कोकिल की आवाज और फूलों की गंध लिए खिड़की से आती बयार उर को एक नये ही लोक में ले जाती है. जीवन का स्पर्श इतना कोमल है और इतना सम्पूर्ण कि इसके सान्निध्य में होने पर हर चाह अर्थहीन ही है, किन्तु फिर भी हम इससे अपरिचित रह जाते हैं और छोटे-छोटे परिचित सुखों के आकर्षण में ही बंधे रहते हैं.

Thursday, March 26, 2015

जब भीतर का छंद जगे

जुलाई २००८ 
जब बुद्ध को ज्ञान हुआ तो वृक्षों में असमय फूल आ गये. हमें भी अपने भीतर इतनी संवेदनशीलता जगानी है कि फूलों की गुफ्तगू सुन सकें. प्रकृति के धीमे-धीमे स्वर हमें सुनाई दें. जब कोई भीतर के छंद को पा लेता है तो चारों ओर से परमात्मा उसे सहारा देने के लिए आ  जाता है. वह तो हर पल साथ है ही, हम ही बचते फिरते हैं, छिटके रहते हैं. जब हम प्रार्थना करना सीखते हैं, झुकना सीखते हैं, अहंकार को छोड़ देते हैं तब भीतर यह भाव पैदा होता है कि जो है वही होना चाहिए था. अहंकार हारता है पर लड़ने की प्रेरणा दिए जाता है. सम्मान की आकांक्षा ही अपमान को जन्म देती है. यदि हम कुछ होने की, कुछ पाने की जिद छोड़ दें तो जो है, जैसा है, वही प्रसाद सा लगने लगता है !