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Thursday, September 30, 2021

असलियत को जो पहचाने


मन परमेश्वर की स्मृति में सहज रूप से लगा रहे, उसे लगाना न पड़े तो ही जानना चाहिए कि अंतर में प्रेम का अंकुर फूटा है. चारों ओर उसी परमात्मा का वैभव तो बिखरा है, उसी की सृष्टि का उपयोग हम करते हैं पर उसे भुला बैठते हैं. जबकि वह हर क्षण साथ है, दूर नहीं है. बस एक पर्दा है जो हमें उससे अलग किये हुए है. वह हर क्षण श्रद्धा का केंद्र बन सकता है, हर श्वास उसकी कृपा है. मन यदि हर क्षण उसी को अर्पित रहे तो इसमें कोई विक्षोभ आ भी कैसे सकता है. संसार की बातें उत्पन्न करने वाला भी वही है. यही आराधना ही राधा है, जिसके माध्यम से कृष्ण को पाया जा सकता है. वह आत्मा रूप में सबके भीतर है, जिसके प्रसाद के बिना मन आधार हीन होता है। बाहर का सुख टिकता नहीं, यह अनुभव बताता है. उस एक से प्रीति हो जाने पर परम सुख और सुविधा मिलती है वह कभी छूटती नहीं, अपने उच्च तत्व का साक्षात्कार करना यदि आ जाये तो देह के अस्वस्थ या मन के दुखी होने पर स्वयं को अस्वस्थ या दुखी मानना छूट जायेगा. जैसी दृष्टि होगी यह जगत वैसा ही दिखेगा. अँधेरी रात में एक ठूँठ को एक व्यक्ति चोर समझता है, दूसरा साधू और तीसरा रौशनी करके उसकी असलियत पहचानता है. हमें भी इस जगत की वास्तविकता को पहचानना है. न इससे आकर्षित होना है न ही द्वेष करना है. तभी हम मुक्त हैं.


Wednesday, January 8, 2014

वंशीधर घट घट का वासी

जून २००५ 
धैर्य खोकर हम हमारे छोटे से दुःख को भी बड़ा बना लेते हैं और धैर्य रखकर बड़े दुःख को तिलमात्र का ! हम लोगों के बारे में एकतरफा राय बना लेते हैं और उसी के अनुसार उनसे व्यवहार करते हैं, यही माया है, चीजें जैसी हैं वैसी ही दिखने लगें तभी समझना चाहिए कि माया से मुक्त हुए. हम स्वयं को कुछ ज्यादा ही महत्व देते हैं, यह दुनिया हमारे बिना भी बेहतर ढंग से चल रही थी और हमारे न होने पर भी चलती रहेगी. जब तक हमें अपना पता नहीं है तब तक जो कुछ भी हमारे साथ होता है वह हमारे लिए उस परमपिता परमेश्वर ने ही ही रच है, इस भावना से यदि हम भावित रहें तो कोई द्वंद्व नहीं होगा. मृत्यु से पहले हमें खुद को जानना है यह लक्ष्य याद रहे तो समय का सदुपयोग होगा. हमारा जीवन प्रभु की अनमोल देन  है उसी की धरोहर है यह भाव दृढ होते ही वह हमारे, प्राणों में अपनी बांसुरी के स्वर भर देता है. नयनों में अपना प्रकाश. उससे मिले कई युग बीत गये हों पर वह कभी दूर गया ही नहीं. 

Friday, February 15, 2013

चेतन ही है सारी सृष्टि


मार्च २००४ 
परमेश्वर को जान लिया, यह कहना ही गलत है क्योंकि परमेश्वर ज्ञेय वस्तु नहीं है, वह स्वयं ज्ञान है, वही वह शक्ति है जिससे जाना जाता है. वह स्थिति अनिर्वचनीय है. यदि हम कहें जिसे जानना था जान गए तो जड़ता का भय रहता है, जो अनजाना है उसे जानने की उत्सुकता ही हमें चेतन बनाये रखती है. ध्यान में हम जड़ शरीर से व मन, बुद्धि से भी स्वयं को परे देखने लगते हैं, द्रष्टा भाव में जब हम आ जाते हैं तो अपने मन के विचारों को भी देखना सीख लेते हैं, तब अपने चेतन स्वरूप का ज्ञान होता है. तब जीवन अहिंसामय होता है, सात्विक होता है. ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार आदि दोषों को भीतर देखना जब आ जाता है तभी तो उन्हें दूर कर सकते हैं, तभी जीवन सजगता पूर्वक जीने की कला आती है, भीतर की शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं, भीतर जो जड़ता थी वह समाप्त होने लगती है, तब प्रकृति में भी सजीवता का दर्शन होता है. कण-कण में उसी प्रभु की सत्ता का दीदार तब होता है. 

Tuesday, July 10, 2012

पल पल जागा रहता साधक


मई २००३ 
साधक का लक्ष्य है पल-पल सचेत रहना, क्योंकि सचेत मन स्वयं को स्पष्ट देखता है, हमें हमारी बड़ी कमियां भी जब छोटी सी भूल मालूम होती हैं तो मन सोया हुआ है. वह पीड़ा जो कठोर वाणी के बाद स्वयं को ही दंश देती है परमेश्वर की कृपा ही है, यह असंतोष की भावना जो साधक को कचोटती है परम सत्य को पाने के लिए तत्पर होने का संदेश ही देती है. साधना का पथ कभी-कभी सांप-सीढी के खेल की तरह प्रतीत होता है, मंजिल तक पहुंचने का आनंद मिलने ही वाला होता है कि हम गहरे गड्ढ में धकेल दिए जाते हैं. किसी संत से सुना कि जब शुभकर्मों का उदय होता है तो ईश्वर का अनुग्रह होता है और उसकी निकटता मिलती है जब अशुभ कर्मों का उदय होता है तो उसकी कृपा होती है अर्थात उसका वियोग होता है. जैसे रात और दिन का क्रम चलता है वैसे ही साधना में जब तक पूर्व जन्मों के बंधन नहीं कटते सुख-दुःख लगे ही रहेंगे. पर नए कर्मों के बंधन न बनें, नयी गांठ न पड़े इसके लिये तो सजग रहना होगा. पूरी तरह शरणागत हो जाएँ तो पुराने कर्मों के बंधन भी धीरे-धीरे कटने लगते हैं.


Monday, April 9, 2012

सब तुझमें हैं तू ही सबमें


जनवरी २००३ 
सदगुरु हमें बार-बार चेताते हैं, हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है, उसे हमें कैसे पाना है. वह इतने सरल शब्दों में अपने अंतर के सम्पूर्ण प्रेम को उड़ेंलते हुए, हमारा हित चाहते हुए कहते हैं कि हमें जीवन को कैसे जीना चाहिए ताकि मन का परिष्कार हो, बुद्धि का विकास हो, आत्मा का प्राकट्य हो. उस परम लक्ष्य की स्तुति हम कैसे करें, उसे कैसे सराहें और सत्य के अधिकारी कैसे बनें. यह सभी वह हमें पुनः पुनः समझाते हैं. उनके भीतर ज्ञान का एक असीम खजाना है, हम यदि उसका एकांश भी अपना लें तो जीवन पथ पर शीघ्र आगे बढ़ सकते हैं. सर्वव्यापी परमेश्वर में सभी को और सब में उसे देखना है. वही एक है जो अनेक होकर विस्तृत हो गया है. तो सभी समान हुए, कोई छोटा बड़ा नहीं. हमें सभी का सम्मान करना है, वह अखिल ब्रह्मांड स्वामी जैसे सब कुछ करते हुए भी अकर्ता है, हम भी साक्षी भाव से मन व इन्द्रियों को अपने अपने गुणों में वर्तते हुए देखें, उनमें लिप्त न हों. व्यर्थ के कामों से बचे, व्यर्थ के प्रलाप से बचें औए व्यर्थ के चिंतन से भी बचें. जिससे हमारी ऊर्जा ध्यान तथा स्वयं को जानने में लग सके. अपने भीतर उतरने के लिये बहुत ऊर्जा की आवश्यकता है. यदि हम स्वयं को इच्छाओं के जाल से मुक्त कर लें तो वह हमारा सुह्रद हमारी जरूरतों को जैसे अब तक पूरा करता आया है भविष्य में भी करेगा. 

Thursday, July 28, 2011

मैं कौन हूँ


july 2001
साधक के जीवन में एक स्थिति ऐसी भी आती है जब परमेश्वर की स्मृति में उसका मन सहज रूप से लगने लगता है, उसे लगाना नहीं पड़ता, अर्थात वह अपने वास्तविक रूप को पहचान लेता है. बस एक झीना सा पर्दा है हमारे और उसके बीच. जब तक यह पर्दा है हमें उसकी पूजा करनी पड़ती है जबकि वह हर क्षण हमारी श्रद्धा का केन्द्र है ही. वही ‘मैं’ का आधार है, आत्मा के आधार के बिना मन कैसे टिक सकता है. बाहरी सुविधाओं के पीछे हम भागते रहते हैं पर कोई न कोई कमी रह ही जाती है और इसी में जीवन पूरा हो जाता है. उस एक से प्रीति होने पर परम सुविधा मिलती है जो कभी छूटती नहीं. हम वास्तव में क्या हैं यह न जानने के कारण ही सारा भ्रम है, एक अँधेरी रात में एक ठूंठ को एक व्यक्ति चोर समझता है दूसरा साधु और तीसरा रोशनी करके उसकी असलियत जान लेता है. हमें भी इस जगत की असलियत जाननी है, न ही यह हमारे राग के योग्य है न ही द्वेष के, तभी हम मुक्त हैं और वही हम हैं.