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Monday, June 12, 2023

सत्व बढ़ेगा जब जीवन में

सृष्टि का आधार सच्चिदानंद है, अर्थात् जो सदा है, ज्ञान स्वरूप है और आनंद से परिपूर्ण है। जड़-चेतन जो भी पदार्थ हमें दृष्टिगोचर  होते हैं, वे रूप बदलते रहते हैं; किंतु उनका कभी नाश नहीं होता। यहाँ पदार्थ ऊर्जा में और ऊर्जा पदार्थ में निरन्तर बदल रही है।हम जो भोजन करते हैं उसका सूक्ष्म अंश ही मन बन जाता है, इसलिए सात्विक भोजन का इतना महत्व है। राजसिक भोजन मन को चंचल बनाता है और तामसिक भोजन प्रमाद से भर देता है। शरीर में आलस्य, भारीपन  तथा बेवजह की थकान भी गरिष्ठ भोजन से होती है। इतना ही नहीं पाँचों इंद्रियों से हम जो भी ग्रहण करते हैं, मन पर उसका प्रभाव पड़ता है। यदि हम चाहते हैं कि मन सदा उत्साह से भरा हो, सहज हो तो इसे सत्व को धारण करना होगा और अंततः उसके भी पार जाकर अनंत में विलीन होना होगा। मन जब स्वयं को समर्पित कर देता है तो भीतर शुद्ध अहंकार का जन्म होता है, जो सदा ही पावन है। 


Monday, July 10, 2017

बने पथिक कोई उस पथ का

११ जुलाई २०१७ 
साधना का पथिक अपने भीतर सदा ही उस साम्राज्य में रहना चाहता है जहाँ एक रस शान्ति विराजती है. उसके अंतर से प्रेम की ऊर्जा किसी विशेष वस्तु, व्यक्ति अथवा घटना के प्रति प्रवाहित नहीं होती, वह निरंतर बहती रहती है जैसे जल से आप्लावित मेघ सहज ही जलधार बहाते हैं. जिस लोक में वह विचरना चाहता है, वह अग्नि सा पावन भी है और हिमशिखरों के समान शीतल भी. वहाँ तृप्ति की श्वास ही ली जा सकती है. जब किसी के भीतर इतनी सात्विक ऊर्जा भर जाये तो वह सहज ही श्रम करने का इच्छुक होगा, इस श्रम में कोई थकावट नहीं होगी, वह सहज होगा जैसे प्रकृति में सब काम सहज हो रहे हैं, क्योंकि प्रकृति सदा ही उस शांति से जुडी है. सेवा का फूल ऐसी ही भूमि में खिलता है. 

Monday, March 27, 2017

भीतर का आकाश मिले जब

२८ मार्च २०१७ 
एक शिशु अपने भीतर खाली आकाश जैसा मन लेकर पैदा होता है. वह सहज ही प्रसन्न होता है, यदि रोता भी है तो किसी न किसी कारण वश और जब कारण दूर हो जाये तो वह पल में हँसने लगता है. जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसका मन भरता जाता है. वस्तुओं, घटनाओं, सूचनाओं, संबंधों की एक कई परतें उसके अंतर आकाश को भरने लगती हैं, सहजता खोने लगती है. यदि घर का वातावरण सात्विक है, सुबह सवेरे भजन आदि कानों में पड़ते हैं, व्रत-उत्सव पर घर में ध्यान पूजा होती है, प्रकृति का सान्निध्य उसे प्राप्त होता है तो  मन को खाली होने का अवसर मिलता रहता है, और वह पुनः-पुनः नया होकर जीवन का अनुभव करता है. किन्तु आज के व्यस्त माहौल में किसी के पास आराम से बैठकर साधना करने का समय नहीं है.  मन को विसर्जित होने का समय  ही नहीं मिलता तब तनाव केअलावा क्या होगा. जिसे जीवन का सबसे सुंदर समय माना गया था, उस अध्ययन काल में  आज विद्यार्थी भी तनाव के शिकार हो रहे हैं, हम बड़ों को ही बैठकर  इसका समाधान खोजना होगा, जीवन में आत्मज्ञान को उसका स्थान देना होगा ताकि मन अपने मूल से जुड़ा रहे और हम बेवजह ही दुःख को अपना साथी न बनाएं.

Friday, February 15, 2013

चेतन ही है सारी सृष्टि


मार्च २००४ 
परमेश्वर को जान लिया, यह कहना ही गलत है क्योंकि परमेश्वर ज्ञेय वस्तु नहीं है, वह स्वयं ज्ञान है, वही वह शक्ति है जिससे जाना जाता है. वह स्थिति अनिर्वचनीय है. यदि हम कहें जिसे जानना था जान गए तो जड़ता का भय रहता है, जो अनजाना है उसे जानने की उत्सुकता ही हमें चेतन बनाये रखती है. ध्यान में हम जड़ शरीर से व मन, बुद्धि से भी स्वयं को परे देखने लगते हैं, द्रष्टा भाव में जब हम आ जाते हैं तो अपने मन के विचारों को भी देखना सीख लेते हैं, तब अपने चेतन स्वरूप का ज्ञान होता है. तब जीवन अहिंसामय होता है, सात्विक होता है. ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार आदि दोषों को भीतर देखना जब आ जाता है तभी तो उन्हें दूर कर सकते हैं, तभी जीवन सजगता पूर्वक जीने की कला आती है, भीतर की शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं, भीतर जो जड़ता थी वह समाप्त होने लगती है, तब प्रकृति में भी सजीवता का दर्शन होता है. कण-कण में उसी प्रभु की सत्ता का दीदार तब होता है. 

Friday, May 27, 2011

विपश्यना


मार्च २०००
मन की गहराईयों में जाकर सारे विकारों को दूर करने का नाम ही ‘विपश्यना है’. लेकिन मन के भीतर जाएँ कैसे, पहले विचारों को कम करना होगा, और वह तब संभव होगा जब जीवन में शील व सदाचार होंगे. आहार सात्विक होगा. सहज स्वाभाविक साँस को देखते रहना भी मन को एकाग्र करने का एक सरल उपाय है. सुख-दुःख, हानि-लाभ आदि में सम रहने से भी हृदय सहज ही शुद्द रहता है तथा भावनायें उद्दात हो जाती हैं. निस्वार्थ भाव से जब हृदय ज्ञान प्राप्ति की आकांक्षा करता है तो ईश्वर की कृपा होने लगती है. नियति यही चाहती है कि हर व्यक्ति उस ध्येय को प्राप्त करे जिसे पाकर मनुष्य कृत-कृत्य हो जाये, हमारे जीवन में आने वाली सभी परिस्थितियां हमें जाने-अनजाने सजग करने के लिये ही आती हैं, ईश्वर सा धैर्य शाली कोई नहीं वह अनंत काल तक हमारी प्रतीक्षा करने के लिये तैयार है.