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Sunday, September 2, 2012

मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब टूट


जुलाई २००३ 
“मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब टूट” जब कोई आग्रह नहीं बचता, मात्र उसी को पाने का आग्रह हो, तब एक ही क्षण में सदगुरु दृश्य रूपी मैल दूर कराने की क्षमता रखते हैं, पर हमें उसके लिये स्वयं को तैयार करना है. सकाम भाव से कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश हो, मन तुलना न करे, अच्छे-बुरे की भावना से भी ऊपर उठे, सिर्फ कार्य को नहीं कारण को भी देखे, और दोनों से निर्लिप्त रहे. यह जगत एक स्वप्न की नाई ही है जो प्रति पल गुजर रहा है. फिर इस गुजरने वाले दृश्यों को द्रष्टा की नाईं देखने में ही जीवन जा रहा है, ज्ञान दृश्य और द्रष्टा दोनों को शांत करता है, फिर मात्र एक आत्म सत्ता ही शेष रहती है, जिसके कारण यह जगत दृश्य मान है, हमें इस स्वप्न में अभिनय करना है, सो सजग होकर करेंगे कि यह सब तो अभिनय ही है, वास्तव में हम न करते हैं न भोगते हैं, शरीर करता है और मन भोगता है, हम न मन हैं न शरीर, सो व्यर्थ ही अधिक करने और अधिक पाने की इच्छा अपने आप शांत हो जाती है, मन में समता की भावना दृढ़ हो जाती है, भटकन तत्क्षण समाप्त हो जाती है. आत्मा की झलक हमें मिलने लगती है जो भव्य है.

Thursday, July 28, 2011

मैं कौन हूँ


july 2001
साधक के जीवन में एक स्थिति ऐसी भी आती है जब परमेश्वर की स्मृति में उसका मन सहज रूप से लगने लगता है, उसे लगाना नहीं पड़ता, अर्थात वह अपने वास्तविक रूप को पहचान लेता है. बस एक झीना सा पर्दा है हमारे और उसके बीच. जब तक यह पर्दा है हमें उसकी पूजा करनी पड़ती है जबकि वह हर क्षण हमारी श्रद्धा का केन्द्र है ही. वही ‘मैं’ का आधार है, आत्मा के आधार के बिना मन कैसे टिक सकता है. बाहरी सुविधाओं के पीछे हम भागते रहते हैं पर कोई न कोई कमी रह ही जाती है और इसी में जीवन पूरा हो जाता है. उस एक से प्रीति होने पर परम सुविधा मिलती है जो कभी छूटती नहीं. हम वास्तव में क्या हैं यह न जानने के कारण ही सारा भ्रम है, एक अँधेरी रात में एक ठूंठ को एक व्यक्ति चोर समझता है दूसरा साधु और तीसरा रोशनी करके उसकी असलियत जान लेता है. हमें भी इस जगत की असलियत जाननी है, न ही यह हमारे राग के योग्य है न ही द्वेष के, तभी हम मुक्त हैं और वही हम हैं.