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Tuesday, June 11, 2013

निज स्वभाव में टिक जाता जो

अक्तूबर २००४ 
आज का युग अभिनय का युग है. हम नित्यप्रति के अपने व्यवहार में अभिनय करते हैं तो सत्य से, सहजता से दूर हो जाते हैं. वैसे तो किसी ने कहा है, संसार एक नाटक शाला है पर नाटक में भी उसी का अभिनय सराहा जाता है जो सहज होता है. धर्म कहीं हमारे लिए एक कृत्य न बन जाये वह  हमारे स्वभाव का अंग बनता जाये. जब हमें यह ज्ञात हो चुका है, जाना कहाँ है तो चलना ही हमारे लिए उचित है. मनसा, वाचा, कर्मणा कोई भी कर्म हमारे लिए आवश्यक या अनावश्यक न रहे, तो मन सहज रह सकता है, और तब यह जगत जैसा है वैसा ही दिखने लगता है.

Sunday, September 2, 2012

मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब टूट


जुलाई २००३ 
“मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब टूट” जब कोई आग्रह नहीं बचता, मात्र उसी को पाने का आग्रह हो, तब एक ही क्षण में सदगुरु दृश्य रूपी मैल दूर कराने की क्षमता रखते हैं, पर हमें उसके लिये स्वयं को तैयार करना है. सकाम भाव से कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश हो, मन तुलना न करे, अच्छे-बुरे की भावना से भी ऊपर उठे, सिर्फ कार्य को नहीं कारण को भी देखे, और दोनों से निर्लिप्त रहे. यह जगत एक स्वप्न की नाई ही है जो प्रति पल गुजर रहा है. फिर इस गुजरने वाले दृश्यों को द्रष्टा की नाईं देखने में ही जीवन जा रहा है, ज्ञान दृश्य और द्रष्टा दोनों को शांत करता है, फिर मात्र एक आत्म सत्ता ही शेष रहती है, जिसके कारण यह जगत दृश्य मान है, हमें इस स्वप्न में अभिनय करना है, सो सजग होकर करेंगे कि यह सब तो अभिनय ही है, वास्तव में हम न करते हैं न भोगते हैं, शरीर करता है और मन भोगता है, हम न मन हैं न शरीर, सो व्यर्थ ही अधिक करने और अधिक पाने की इच्छा अपने आप शांत हो जाती है, मन में समता की भावना दृढ़ हो जाती है, भटकन तत्क्षण समाप्त हो जाती है. आत्मा की झलक हमें मिलने लगती है जो भव्य है.