अक्तूबर २००४
आज का युग अभिनय का युग है. हम नित्यप्रति के अपने व्यवहार
में अभिनय करते हैं तो सत्य से, सहजता से दूर हो जाते हैं. वैसे तो किसी ने कहा
है, संसार एक नाटक शाला है पर नाटक में भी उसी का अभिनय सराहा जाता है जो सहज होता
है. धर्म कहीं हमारे लिए एक कृत्य न बन जाये वह
हमारे स्वभाव का अंग बनता जाये. जब हमें यह ज्ञात हो चुका है, जाना कहाँ है
तो चलना ही हमारे लिए उचित है. मनसा, वाचा, कर्मणा कोई भी कर्म हमारे लिए आवश्यक
या अनावश्यक न रहे, तो मन सहज रह सकता है, और तब यह जगत जैसा है वैसा ही दिखने
लगता है.