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Saturday, June 3, 2017

बँटती रहे ऊर्जा पल-पल

४ जून २०१७ 
जीवन प्रतिदिन एक नई सुबह का वरदान देता है. हर रात अपने साथ सारी थकान ही नहीं ले जाती, विश्राम के पलों में नई ऊर्जा से मन को भर देती है. जिसने हँसकर सुबह का स्वागत किया वह अपनी दोपहर में कुछ रचने ही वाला है, और उसकी संध्या भी अनंत के प्रति आभार से भर जाएगी. रात्रि का स्वागत भी वह एक तृप्त हृदय के साथ करेगा. जिसने आपने आनन्द को प्रकृति के साथ साझा करना सीख लिया प्रकृति भी उसके मार्ग में चमत्कार बुन देती है. प्रकृति पल-पल अपना सब कुछ बाँट रही है, हमें भी इस जीवन में जो कुछ भी मिला है, उसी से मिला है, उसी की भांति देने की कला जब किसी को आ जाये तो जीवन का हर पल नया लगता है. 

Thursday, January 5, 2017

जीवन जब वरदान बने

६ जनवरी २०१७ 
जीवन कितना अनोखा है. जब हम पल भर भी रुककर विस्तीर्ण गगन पर नजर डालते हैं या उगते हुए सूर्य की किरणों से चमक रही ओस की बूंदों पर हमारी दृष्टि टिकती है तो प्रकृति की भव्यता तत्क्षण मन्त्र मुग्ध कर लेती है. जब रोजमर्रा की बातों में ही इतना खो जाते हैं कि उषा की लाली और संध्या की सुरम्यता हमें छू ही नहीं पाती तो जीवन में एक नीरसता भर जाती है. हमारा मस्तिष्क कभी अति भावुक हो उठता है तो कभी बिलकुल रूखा-सूखा, दोनों ही व्यवहार परमात्मा से दूर ले जाते हैं. जब जीवन में एक समता का उदय होता है,  जीवन एक मधुर संगीत से भर उठता है. भीतर रहते हुए बाहर व्यवहार करना हम सीख जाते हैं. जैसे कोई दीप देहरी पर रखा हो तो वह अंदर बहर दोनों को प्रकाशित करता है ऐसा ही मन जब जगत में रहते हुए भी अंतर से जुड़ा रहता है तो चारों ओर का सौन्दर्य उसे हर क्षण अभिभूत किये रहता है.

Wednesday, January 9, 2013

शांति है जहां प्रगति है वहाँ


जनवरी २००४ 
शान्ति पूर्वक सहअस्तित्त्व हमारी पहली आवश्यकता है, तभी किसी भी तरह का विकास सम्भव है. अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना ही नहीं है, बल्कि हमें इसके सूक्ष्म स्वरूप को भी जानना होगा. क्रोध का कोई भी रूप हिंसा है, द्वंद्व भी हिंसा है, द्वन्द्वातीत हुए बिना मन शांत नहीं हो सकता. अहिंसा का प्रारम्भ सर्वप्रथम घर से होता है, आज समाज के बदले हुए वातावरण में घरेलू हिंसा का शिकार वृद्ध, महिलाएं, बच्चे, अशक्त सभी किसी न किसी रूप में हो रहे हैं, आये दिन जो समाचार तथा आंकड़े मिलते हैं, उन्हें देखकर आश्चर्य होता है कि क्या हम एक सभ्य समाज के नागरिक हैं? धर्म जब तक जीवन का एक मह्त्वपूर्ण अंग नहीं बन जाता, आचरण में नहीं उतरता, परिवर्तन नहीं होगा. घरों में नियमित संध्या, ध्यान तथा सद्ग्रन्थों का पाठ होता रहे तो बच्चों को संस्कार मिलते रहते हैं. आज पीढियों का अंतर बढ़ता जा रहा है इसे दूर करने का सबसे सुंदर उपाय है धर्म तथा अध्यात्म, जहां किसी भी तरह का कोई भेद नही होता.