जीवन में यदि सत्य नहीं है तो हृदय में सत्यनारायण का वास कैसे होगा। हम कई बार मन में कुछ और होने पर अन्यों से कुछ और ही कहते हैं, इस तरह हम दूसरों को ही नहीं स्वयं को भी धोखा दे रहे होते होते हैं। परमात्मा हर घड़ी हमारे माध्यम से प्रकट होने के लिए व्याकुल है। वह राह ही देख रहा है। मानव का अंतर झूठ की परतों इतना ढक गया है कि उस पावन को वहाँ आश्रय ही नहीं मिलता। हम उसके होने के प्रमाण खोजते हैं और वह हमारी शुद्धता की राह देखता है। कोरोना का वायरस मानवता को शुद्ध बनाने के लिए ही संभवत: आया है। धरती, पानी, हवा सभी को अशुद्ध बना चुका है मानव क्योंकि मन की शुद्धता ही कहीं दब गई है। प्रकृति शुद्ध होगी जब मन पवित्र होगा। मन शुद्ध होगा जब भीतर कपट नहीं रहेगा। प्रकट तथा कपट कितने मिलते-जुलते शब्द हैं पर कितना विपरीत अर्थ रखते हैं। जो प्रकट है अर्थात सम्मुख है वह परमात्मा है पर कपट भरे मन के लिए वह अप्रकट ही रह जाता है। जीवन में जितनी पारदर्शिता व सत्य हो उतना ही देवत्व प्रकट होने में देर नहीं करता।
Showing posts with label शुद्धता. Show all posts
Showing posts with label शुद्धता. Show all posts
Sunday, March 14, 2021
Tuesday, December 3, 2013
पार हुआ जो तीन गुणों से
अप्रैल २००५
ईश्वर
अकारण दयालु है, परम मित्र है, परम स्नेही है, सुह्रद है, हितैषी है, अपना है और
सदा हमारे साथ है. इतना सब होते हुए भी मानव दुखी है, यह कैसा विरोधाभास है, कैसे
विडम्बना है ? हम ईश्वर की तथाकथित भक्ति तो करते हैं पर उससे दूर-दूर ही रहते हैं
उससे डरते हैं, या तो अपने आप से डरते हैं या ईश्वर इतना शुद्ध है कि हमारे भीतर
की अशुद्धता उसके निकट जाते ही स्पष्ट
दिखाई देने लगती है, या हम ईश्वर से दूर-दूर का ही नाता रखना चाहते हैं, हम डरते
हैं कि प्रभु हमसे कुछ छीन न ले, हम निरे बच्चों का सा व्यवहार करते हैं उसके
सम्मुख ! हम नाटक करते हैं, स्वयं को धोखा देते हैं, क्योंकि उसे तो धोखा दिया ही
नहीं जा सकता. कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति अपने गुणों के अनुसार ही वर्तती है और गुणों
के वशीभूत हुए प्राणी भिन्न-भिन्न व्यवहार करते हैं, और यह गुण उन्हें कर्मों के
अनुसार मिलते हैं, हमारा अधिकार कर्म करने तक ही है. पूर्व आदतों के अनुसार ही यदि
कर्म करते रहे तो जीवन पूर्ववत ही बना रहेगा, ध्यान से हम संस्कारों को बदल सकते
हैं जिनसे सात्विक स्वभाव को प्रप्त होंगे. गुणों को बदलना हमारे हाथ है यह जानने
के बाद कौन है जो प्रकृति के वशीभूत होकर कर्म करेगा, सजग व्यक्ति अपना निर्माता
स्वयं होता है.
Tuesday, July 10, 2012
प्रेम पनपता है जब भीतर
मई २००३
मन की शुद्धता उसी के पास है, जो हरेक के भीतर उसी चैतन्य का दर्शन करता है, जो
सुख-दुःख में सम रहने की कला जानता है, जो धैर्यवान है, जो मिथ्या अहंकार का पोषण
नहीं करता. जो सत्य का पक्षधर है, जो प्रकाश की खोज करता है वह हृदय पावन होने
लगता है. जैसे कीमती पदार्थ रखने के लिये कीमती व सुरक्षित स्थान भी चाहिए, वैसे
ही ज्ञान के लिये भी पात्रता चाहिए. ज्ञान होने पर ही हृदय में प्रेम का उदय होता
है, प्रेम अपने आप में साधन भी है और साध्य भी, परम के प्रति प्रेम यदि दृढ़ है तो
साधक को और कुछ प्राप्य नहीं रह जाता. ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम ही साधना का
लक्ष्य है. प्रेम होने पर सारे सदगुण अपने आप प्रसाद रूप में मिल जाते हैं. तब कोई
उहापोह नहीं रहती, सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है.
Subscribe to:
Posts (Atom)