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Monday, June 29, 2020

जाग गया है जो भी जग में


बुद्ध को जब ज्ञान हुआ तो उन्हें प्रफ्फुलित और आभावान देखकर एक व्यक्ति ने पूछा, क्या आप कोई देवता हैं ? क्या आप गन्धर्व हैं ? क्या आप मानव हैं ? हर बार उन्होंने इंकार किया, आखिर उसने पूछा, आप कौन हैं ? बुद्ध ने कहा मैं जागा हुआ हूँ, मैं जागृत हूँ ! उस व्यक्ति ने कहा होगा, मैं भी इस समय जगा हूँ, सो तो नहीं रहा, आप यह किस जागरण की बात कर रहे हैं? युग-युग से सभी सन्त व शास्त्र इसी जागरण की बात कहते आ रहे हैं, जिसमें व्यक्ति सौ प्रतिशत वर्तमान में ही रहता है. मनसा, वाचा, कर्मणा वह प्रतिपल सचेत रहता है. वह सत्य के प्रति भी सदा जागृत है अर्थात निरन्तर परिवर्तनशील इस जगत को नाशवान मानता है. वह जानता है कि इस जगत में सभी कुछ एकदूसरे पर आश्रित है. देह व मन की गहराई में स्थित शून्य अवस्था का भी उसे ज्ञान है. उसकी प्रज्ञा जग गयी है, वह घटनाओं के पीछे छिपे कारण को भी देख लेता है, इसलिए उनसे प्रभावित नहीं होता. व्यक्तियों के व्यवहार के पीछे कारण को भी समझने वाला वह किसी भी व्यक्ति के व्यवहार से सुखी-दुखी होना छोड़ देता है. वस्तुओं के संग्रह की उसे आवश्यकता नहीं, जितना और जब आवश्यक हो उतना ही ग्रहण करने की आशा वाला वह लोभ को त्याग देता है. देह को साध्य नहीं साधन मानकर वह ध्यान के लिए उसे स्वस्थ रखता है.  

Tuesday, October 1, 2019

थम कर पल भर बैठा हो जो



हम साध्य और साधन का भेद नहीं कर पाते इसलिए सदा असंतुष्ट बने रहते हैं. हमारे लिए जगत साध्य है और परमात्मा उसे प्राप्त करने का साधन, जबकि संसार को साधन बनाकर हमें स्वयं और परमात्मा के पास पहुँचना है. इस जगत में हम जो कुछ भी करते हैं वह कुछ न कुछ बनने अथवा पाने के लिए करते हैं. जो हमारे पास है, जैसे हम हैं, वह पर्याप्त नहीं है. यह दौड़ कभी खत्म होती नजर नहीं आती, संत कहते हैं यदि कोई थम जाये और जैसा वह है, जो उसके पास है, उसका मूल्यांकन करे अथवा तो कुछ भी न करे बस तटस्थ होकर रहे तो धीरे-धीरे वह प्रकट होने लगता है जो उसका मूल स्वभाव है. अपने स्वभाव में विश्राम पाते ही लगता है वह तो पहले से ही मिला हुआ है, जिसकी उसे तलाश है. इस ठहरने में एक बात और घटती है जो आवश्यक बदलाव है वह अपनेआप ही होने लगता है.

Monday, October 20, 2014

भक्ति अति निराली घटना

मार्च २००७ 
परम सत्य की प्राप्ति का कोई भी मार्ग हो तो उसका अंत भक्ति में ही होता है, अर्थात ज्ञान का फल भी भक्ति है और कर्मयोग का फल भी भक्ति ही है. भक्ति स्वयं ही साधन है और स्वयं ही साध्य भी. भक्ति का अर्थ है सत्य से प्रेम...परम से प्रेम ! विष्णु की भक्ति करें या राम की, शंकर की अथवा कृष्ण की, सभी एक को ही पहुँचती है. यदि कोई अनपढ़ हो, शास्त्र न पढ़ सकता हो या समझ सकता हो, स्तुति न गा सकता हो, वह एक बात तो कर ही सकता है. वह ईश्वर से प्रेम कर सकता है. उसके किसी भी नाम को भज सकता है. उसको स्मरण कर सकता है. उसका प्रेम ही उसको तार देगा.  

Wednesday, November 20, 2013

कितना सुंदर पथ है उसका

अप्रैल २००५ 
भक्त वही है जिसका मन ईश्वरीय भावों से लबालब भरा हुआ है, भीतर एक प्रकाश फैला है जो उसके अस्तित्त्व के कण-कण को भिगो रहा है. शास्त्रों में लिखी बातें उसके लिए सत्य सिद्द हो गयी हैं. आकाश व्यापक है पर आकाश भी भगवान में है, अगर कुछ पल भी उस भगवद् तत्व में कोई टिक जाये तो कभी विषाद नहीं होता. सन्त कहते हैं, स्वस्थ देह, पावन भाव और शुद्ध बुद्धि यह तीन तो साधना के अंग हैं और चौथी अवस्था 'साध्य' है. उसका अनुभव होने पर सुख-दुःख का असर नहीं होता, मन निर्लिप्त हो जाता है, हर परिस्थिति में समता बनाये रखना सम्भव हो जाता है. अपनी स्मृति को बनाये रख सकते हैं. इस पथ पर दूर से ही साध्य की सुगंध मिलने लगती है. उस स्थिति की कल्पना ही कितनी सुखद है, जब हमें  भी वह अनुभव होगा, जो नानक का अनुभव है मीरा का अनुभव है. कई बार हमें भी उसकी झलक मिली है पर अभी बहुत दूर जाना है. मन के दर्पण को मांजना है, पात्रता हासिल करनी है.

Friday, December 28, 2012

साध्य ही जब बनता साधन


दिसंबर २००३ 
हमारा प्राप्तव्य यदि ऊँचा होगा तो साधन भी उत्तम अपनाएंगे. साध्य और साधन जब एक हो जाते हैं, तब जीवन में समता आती है. हृदय जब समभाव में स्थित रहता है तब कर्मों के बंधन नहीं बंधते. लक्ष्य यदि विस्मृत हो गया तो जीवन में पुलक नहीं रहती, रंग नहीं रहता और ऐसा जीवन भारस्वरूप ही होता है खुद के लिए और अन्यों के लिए भी. मृत्यु का सामना करने की तैयारी यदि हमने नहीं की तो सिवाय पछताने के कुछ हाथ नहीं आयेगा. उस समय जो हमारे साथ जायेगी वह  हमारी चेतना होगी, प्रज्ञावान चेतना...प्रज्ञा तभी जगेगी जब जीवन में ध्यान होगा, मन स्थिर होगा, उसके लिए ज्ञान चाहिए, ज्ञान भक्ति के बिना नहीं टिकता. भक्ति तभी मिलेगी जब सुमिरन होता रहे औए सुमिरन तभी होगा जब परम ही हमारा लक्ष्य हो, उसे जानने व पाने की चाह भीतर उठे. मन रूपी चरखे में जब श्वास रूपी धागा काता जाता है, और उन श्वासों में उसके नाम की गूंज उठती है तब जो चादर बिनी जाती है वही प्रज्ञा है. तब अंतर में आनंद का स्रोत छलकता है, उस सोते में सारे शिकवे-शिकायतें, चाहते डूब जाती हैं, रह जाती है मात्र शीतलता और सहजता.

Sunday, November 11, 2012

नई राह पर नया उजाला


हमें अपने भीतर नया दृष्टिकोण जगाना होगा, अभी मात्र आधा किलोमीटर ही चले हैं, अभी बहुत चलना है, अभी तो प्रारम्भ ही हुआ है, कदम अभी तो चलना ही शुरू कर रहे हैं, गति पकड़ना तो अभी शेष है. मन को उस स्तर तक ले जाना होगा कि ऐसा लगे कोई छलांग लगी है. कितनी ही बार हम ऐसा चिंतन करके जीवन को दिशा प्रदान करना चाहते हैं, पर बार-बार ऐसा क्यों लगता है कि हम कहीं पहुंच नहीं पा रहे हैं, या तो हमारी दिशा भटक गयी है या हमारी गति शिथिल हो गयी है. तब हम यह भूल जाते हैं कि भक्ति, ज्ञान या कर्म स्वयं में फलस्वरूप हैं, वे साधन भी हैं और साध्य भी. वे हमें अपने भीतर उजाले का दर्शन कराते हैं. पूर्ण समपर्ण ही भक्ति है, स्वयं को मात्र देह न मानकर चिन्मय तत्व जानना ही ज्ञान है और सहज प्राप्त कार्य को करना ही कर्म है. फिर जाना कहाँ और पाना क्या ? जब कोई अपेक्षा नहीं तो दुःख-सुख का भी प्रश्न नहीं है. हम तब संसार में रहते हुए भी कमल की नाईं संसार से परे रह सकते हैं. सदा सर्वदा अपने सत्य स्वरूप में स्थित. 

Thursday, October 18, 2012

एक वही न दूजा कोई


सितम्बर २००३ 
ईश्वर का नाम भक्त के हृदय को पवित्र करता है, उसे नाम जपने में कभी आलस्य नहीं होता. अच्छा लगता है और एक वक्त ऐसा भी आता है जब नाम सुमिरन के अतिरिक्त बात करना भी बोझ मालूम पड़ता है. सचमुच अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले निराले होते हैं. जगत से उल्टा होता है उनका व्यवहार, वे संसारिक बातों में दक्ष न हों पर अपने चिर सखा के सम्मुख सत्य में स्थित होते हैं. ईश्वर के सम्मुख वे अपने पूर्ण होशोहवास में प्रस्तुत होते हैं और तभी तत्क्षण उसकी उपस्थिति का अहसास भी करते हैं. उन्हें वह इतना प्रिय, प्रियतर, प्रियतम लगता है कि उसके सिवा सब कुछ फीका लगता है. लेकिन यह जगत भी तो उसी का प्रतिबिम्ब है, उसी के कारण आकाश में नीलिमा का आभास होता है और जल में हरीतिमा का. वही भीतर है और वही बाहर है. वही हमें सम्भालता है वही हमारी रक्षा करता है. वही धर्म है, वही न्याय है, वही ज्ञान है, वही सदबुद्धि है, वही मंगल है, वही शिव है, वही जीवन है, वही जीवनदाता है, वह एक है पर उसके नाम अनेक हैं, उसके रूप अनेक हैं, वह सुखमय है, वह रसमय है, वह सुखद है, अद्भुत है, नित्य है, चिरसखा है, अनंत है, आनंद है,  शांति प्रदाता है, वही साधना है, वही साध्य है, वही साधन है, वही श्रेय है वही प्रेय भी !

Tuesday, July 10, 2012

प्रेम पनपता है जब भीतर


मई २००३ 
मन की शुद्धता उसी के पास है, जो हरेक के भीतर उसी चैतन्य का दर्शन करता है, जो सुख-दुःख में सम रहने की कला जानता है, जो धैर्यवान है, जो मिथ्या अहंकार का पोषण नहीं करता. जो सत्य का पक्षधर है, जो प्रकाश की खोज करता है वह हृदय पावन होने लगता है. जैसे कीमती पदार्थ रखने के लिये कीमती व सुरक्षित स्थान भी चाहिए, वैसे ही ज्ञान के लिये भी पात्रता चाहिए. ज्ञान होने पर ही हृदय में प्रेम का उदय होता है, प्रेम अपने आप में साधन भी है और साध्य भी, परम के प्रति प्रेम यदि दृढ़ है तो साधक को और कुछ प्राप्य नहीं रह जाता. ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम ही साधना का लक्ष्य है. प्रेम होने पर सारे सदगुण अपने आप प्रसाद रूप में मिल जाते हैं. तब कोई उहापोह नहीं रहती, सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है.