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Wednesday, December 25, 2013

हर राह उसी तक लाती है

मई २००५ 
“पहाड़ के नीचे की घास बनकर रहो, आंगन में उगा चमेली का वृक्ष बन कर रहो, मुसीबत आने पर पत्थर की चट्टान बन कर रहो और दीन-दुखियों के लिए शक्कर और गुड़ बन कर रहो”

एक महान कन्नड़ सन्त की सूक्तियां हैं ये. पहाड़ के नीचे की घास का अर्थ है अहंकार रहित होकर जीना, अहंकार युक्त मन ही प्रभु से दूर ले जाता है. चमेली का बिरवा अपने घर के साथ-साथ बाहर भी सुगंध फैलाता है. मन हमें उससे दूर ले जाता है जब हम अपने सुख में किसी अन्य को शामिल नहीं करते. मन यदि स्वार्थी है तो ही भीरु भी है, निडर, संवेदनशील मन जो दया से भरा हो किसी भी परिस्थिति में समता बनाये रह सकता है. जितना सम्भव हो सके स्वयं को सबके लिए उपलब्ध करा सकें तो जीवन अपने आप ही मधुर हो जायेगा, जो स्वयं के लिए गुड़ है वही तो अन्यों के लिए भी हो सकता है. परमात्मा की राह पर चलने वाले साधक को तो इतना सजग रहना ही होगा.

Monday, March 18, 2013

एक प्रार्थना ऐसी भी


जून २००४ 
यदि कोई बेचैन नहीं होता, हर परिस्थिति को समता से स्वीकार करता है, तभी समझना चाहिए कि वह प्रेम में है, प्रेम किया नहीं जाता यह एक अवस्था है, इसका प्रमाण है हमारे भीतर की अथाह शांति.. हम पहाड़ के नीचे की घास बन जाएँ, अर्थात निरभिमानी हो जाएँ, तो ही शांति का अनुभव कर सकते हैं. दुःख आने पर हम पत्थर बन जाएँ अर्थात दृढ रहें, एक आत्मीयता का भाव भीतर रहे. ज्ञान की अग्नि अशुभ संकल्पों को जला दे पर हृदय इतना तप्त न हो कि हम अकेले-अकेले ही अपने भीतर के सुख को पाना चाहें, हम अपने आंगन में चमेली का पौधा बन जाएँ जो भीतर रहने वालों और बाहर गुजरने वाले लोगों को सुगंध से भर देता है. जब किसी को प्रेम का प्रसाद मिल चुका हो तब उसके जीवन का और कोई उद्देश्य नहीं रह जाता सिवाय इसके कि वह अपनी ऊर्जा बाँटें, आनंद, शांति और प्रेम की ऊर्जा.