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Tuesday, February 24, 2015

दूर भी तू पास भी तू

जनवरी २००८ 
हमें जीवन से जो भी चाहिए वह हमारे पास पहले से ही मौजूद है. जीवन के लिए जो भी चाहिए वह भी हमारे पास है, तो भी हम जीवन से क्या चाहते हैं कि सारी उमर बीत जाती है और हमारी तलाश खत्म नहीं होती. शायद इसलिए कि हमें इस बात का पता ही नहीं है कि जो खजाना हमारे पास है वह हमने गहरे गाड़ दिया है और ऊपर इतनी घास उग आयी है कि अब लगता ही नहीं कभी यहाँ खजाना रहा होगा. सत्संग के औजार से घास हटाने का कम शुरू होता है, झलक मिलने लगती है. भीतर शांति, आनंद व प्रेम का अनुभव होने लगता है, पर मजा तो तब है जब हम इन्हें संसार में बाँट सकें. अनंत खजाना है तो अनंत शक्ति भी होनी चाहिए. अध्यात्म की यात्रा कितनी विचित्र है, यहाँ विरोधाभास ही विरोधाभास है. एक पल में लगता है मंजिल करीब है फिर अगले ही पल लगता है अभी तो चलना शुरू ही किया है.  

Monday, March 18, 2013

एक प्रार्थना ऐसी भी


जून २००४ 
यदि कोई बेचैन नहीं होता, हर परिस्थिति को समता से स्वीकार करता है, तभी समझना चाहिए कि वह प्रेम में है, प्रेम किया नहीं जाता यह एक अवस्था है, इसका प्रमाण है हमारे भीतर की अथाह शांति.. हम पहाड़ के नीचे की घास बन जाएँ, अर्थात निरभिमानी हो जाएँ, तो ही शांति का अनुभव कर सकते हैं. दुःख आने पर हम पत्थर बन जाएँ अर्थात दृढ रहें, एक आत्मीयता का भाव भीतर रहे. ज्ञान की अग्नि अशुभ संकल्पों को जला दे पर हृदय इतना तप्त न हो कि हम अकेले-अकेले ही अपने भीतर के सुख को पाना चाहें, हम अपने आंगन में चमेली का पौधा बन जाएँ जो भीतर रहने वालों और बाहर गुजरने वाले लोगों को सुगंध से भर देता है. जब किसी को प्रेम का प्रसाद मिल चुका हो तब उसके जीवन का और कोई उद्देश्य नहीं रह जाता सिवाय इसके कि वह अपनी ऊर्जा बाँटें, आनंद, शांति और प्रेम की ऊर्जा.