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Sunday, August 2, 2026

हर विभूति का स्रोत एक है

एक चित्रकार, लेखक, कवि या शिल्पी मूलतः सृष्टा होता है। उसके लिए कला का सृजन कर पाना ही अपने आप में मुख्य बात है, न कि उससे किसी तरह का लाभ, नाम, यश या धन कमाना। सभी कलाएँ कलाकार के माध्यम से प्रकट भर हो रही हैं, उनके पीछे प्रेरक तत्व तो एक वही है। कलाओं का सृजन एक उसी स्रोत से होता है। कृष्ण भगवद् गीता में कहते हैं, जगत में जो कुछ भी सुंदर, शक्तिशाली, ज्ञानवान या श्रेष्ठ है, वह उन्हीं का अंश है। किसी व्यक्ति में नेतृत्व क्षमता या कला सृजन की क्षमता है तो वह ईश्वर की दिव्य शक्ति का ही एक रूप है। हर किसी की योग्यता ईश्वर द्वारा दिया गया एक उपहार है। इस धारणा के अनुसार चलने से मन में समता की भावना बढ़ती है।व्यक्ति के अहंकार का नाश होता है और वह सुख-दुख के पार चला जाता है। मन में सागर की तरह ज्वार-भाटा उठते रहते हैं किंतु आत्मा सदा असंग है। मन चंद्रमा की तरह घटता-बढ़ता है पर आत्मा आकाश की तरह निरंजन है। 

Wednesday, October 28, 2020

मानव जन्म अमोल है

 

संतों से हम सभी सुनते आए हैं, मानव जन्म अनमोल है। मानव ही कर्म करके अपना भाग्य बदल सकता है। मानव से इतर सभी योनियाँ केवल भोग के लिए हैं। यदि हमारा जीवन मात्र सुख-सुविधा को बढ़ाते जाना है तो हम अपनी क्षमता का विकास नहीं कर सकते। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उससे काम लेना, व्यायाम करना आवश्यक है तो मन को स्वस्थ रखने के लिए ध्यान साधना। प्राणों को सबल बनाने में प्राणायाम की बहुत बड़ी भूमिका है और बुद्धि को तीव्र करने हेतु अध्ययन, मनन, श्रवण और चिंतन की। आनंद को बढ़ाने के लिए संगीत, कला अथवा प्रात: व सांय काल का भ्रमण, प्रकृति का सान्निध्य आवश्यक है। यदि हमारी दिनचर्या इन सबके अनुकूल ढली हो तो व्यर्थ की चिंता अथवा किसी समस्या के लिए स्थान ही नहीं रह जाता। भारत की संस्कृति इतनी दिव्यता से परिपूर्ण है कि शास्त्रों में लगायी छोटी सी डुबकी भी भीतर तक तृप्त कर देती है। भारत का ज्ञान और योग आज सारे विश्व का मार्ग दर्शन कर रहा है। मानव धर्म सिखाने वाला सनातन मार्ग हमें सहज ही पूर्णता की ओर ले जाता है।

Friday, February 15, 2019

प्रकृति सिखा रही है पल पल


१६ फरवरी २०१९ 
प्रकृति की अपनी एक भाषा है, उसे सुनने की कला यदि कोई सीख ले तो सारी कायनात उसके साथ संवाद करती हुई प्रतीत होती है. प्रकृति के पास अनंत धैर्य है, एक पत्थर हजार वर्ष तक पड़ा रह सकता है और एक दिन रेत का एक महीन कण बन जाता है, फिर किसी खेत में उसका रूप बदल कर वनस्पति बन जाता है, वह वनस्पति किसी पशु के पेट में जाकर उसका रक्त  भी बन सकती है और वही एक दिन मानव योनि में भी जन्म सकता है. पत्थर से मानव बनने में कितना समय लगेगा यह कोई नहीं जानता. किन्तु हम देख सकते हैं जो आज पत्थर है वह भविष्य का मानव है, यानि जो आज मानव है वह कभी पत्थर था. दोनों आज भी मौजूद हैं. जो दोनों को एक साथ देख सकती है वह चेतना है, जो न कभी जन्मती है न बदलती है, जो सदा एक सी है.   

Tuesday, December 19, 2017

माया के जब पार हो सकें

२० दिसम्बर २०१७ 
मन ही माया है. सृष्टि जैसी है वैसी ही यह देखने नहीं देता. जैसे सावन के अंधे को हर जगह हरा ही हरा दिखाई पड़ता है वैसे मन के द्वारा छली गयी आत्मा को जगत में दोष ही दोष दिखाई पड़ते हैं. मन अपनी मान्यताओं और कल्पनाओं के जाल में उलझ कर जगत को वैसा ही दिखाता है जैसा वह देखना चाहता है. ध्यान है मन के पार जाने की कला, स्वयं को अपने मूल रूप में जानने और कुछ पलों के लिए उसमें स्थित होकर शक्ति पाने की कला. भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, मेरी माया के पार जाना हो तो मेरी शरण में आना होगा. कृष्ण की शरण में ध्यान में ही जाया जा सकता है. स्तुति, जप अथवा श्वासों पर मन को टिकाना, किसी भी विधि का उपयोग करके मन को स्थिर किया जा सकता है और शांत और एकाग्र हुआ मन ही स्वयं में विश्राम कर पाता है. विश्राम के क्षणों में प्राप्त हुई शांति उसे सुकृत्य के लिए प्रेरित करती है. 

Sunday, July 23, 2017

इस क्षण में ही मिल सकता वह

२४ जुलाई २०१७ 
केवल वर्तमान का यह नन्हा सा पल ही सत्य है. यही क्षण अपने भीतर अनंत को छुपाये है. जैसे एक परमाणु में असीम शक्ति छिपी है वैसे ही एक क्षण में अनंत समय छिपा है. वर्तमान में रहने की कला ही ध्यान है. यदि कोई इस कला को सीख लेता है तो वह कभी समय की कमी महसूस नहीं करता. वास्तव में वर्तमान के सिवा कोई समय ही नहीं है, सब कुछ इसी क्षण में है और इसी वक्त है. अनंत काल जो बीत गया और अनंत काल जो आने वाला है, वह इसी क्षण में है अन्यथा नहीं है. जो आज अतीत बन गया है, वह तो अभी है नहीं, जो भावी है वह भी अभी नहीं है. धर्म का अनुभव वर्तमान में ही हो सकता है. 

Tuesday, February 11, 2014

आनन्दित हो जाए हर पल

अगस्त २००५ 
जीवन प्रभु का दिया अमूल्य उपहार है, आनन्द से इसका एक-एक क्षण भरा है, जो डूबता है इसमें वही उबरता है. इसमें छिपे खजाने को पा लेता है, वही जीवन के रहस्य को जान जाता है. इतना सुखमय जीवन क्यों किसी के लिए दुःख का कारण बना रहता है ? परम तत्व को पाए बिना जो जीवन बीतता है वह अधूरेपन का शिकार रहता ही है ! मन को यदि एकाग्र करना आता नहीं तो विकारों से मुक्त नहीं हो सकते. साधना से यह कला सीखी जा सकती है, जीवन में सत्संग, सेवा, स्वाध्याय और ध्यान के फूल खिलने लगते हैं और जीवन एक उत्सव बन जाता है. ऐसे जीवन में ही परम का अवतरण होता है.

Monday, February 20, 2012

वैराग्य महासुख है


दिसम्बर २००२ 
मन में जब तक दरिद्रता रहेगी, अभाव रहेगा तो जीवन में समृद्धि कैसे आयेगी. मन में समृद्धि का बीज बोना है तब ही जीवन में भी पूर्णता का अनुभव होगा. तृष्णा जब समाप्त होगी तभी वैराग्य टिकेगा. वैराग्य ही हमें दृढ़ता प्रदान करता है, स्वतंत्र व पूर्ण बनाता है. मन तब तृप्त हो जाता है. जो कुछ हमें मिला है उसका सम्मान करते हुए तृप्ति का अहसास बना रहे तभी वैराग्य जीवन में खिलता है. अपने ‘स्व’ का विस्तार भी तब होता है. परम से नाता जुड़ता है, हर वस्तु, यह सम्पूर्ण सृष्टि हमारा कर्मक्षेत्र बन जाती है, पर उस में बंधन नहीं है एक अलिप्तता है, बाहर कार्य करते हुए भी भीतर से बिल्कुल अछूते रहने की कला तभी आती है.