Showing posts with label पशु. Show all posts
Showing posts with label पशु. Show all posts

Friday, February 15, 2019

प्रकृति सिखा रही है पल पल


१६ फरवरी २०१९ 
प्रकृति की अपनी एक भाषा है, उसे सुनने की कला यदि कोई सीख ले तो सारी कायनात उसके साथ संवाद करती हुई प्रतीत होती है. प्रकृति के पास अनंत धैर्य है, एक पत्थर हजार वर्ष तक पड़ा रह सकता है और एक दिन रेत का एक महीन कण बन जाता है, फिर किसी खेत में उसका रूप बदल कर वनस्पति बन जाता है, वह वनस्पति किसी पशु के पेट में जाकर उसका रक्त  भी बन सकती है और वही एक दिन मानव योनि में भी जन्म सकता है. पत्थर से मानव बनने में कितना समय लगेगा यह कोई नहीं जानता. किन्तु हम देख सकते हैं जो आज पत्थर है वह भविष्य का मानव है, यानि जो आज मानव है वह कभी पत्थर था. दोनों आज भी मौजूद हैं. जो दोनों को एक साथ देख सकती है वह चेतना है, जो न कभी जन्मती है न बदलती है, जो सदा एक सी है.   

Tuesday, December 25, 2012

मानव होना सीखें हम


दिसंबर २००३ 
मानव एक पुल है, जिसके एक ओर पशुता है और दूसरी ओर देवत्व, चुनाव उसके हाथ में है, क्रोध, हिंसा उसे पशु के समान बनाते हैं, प्रेम, उदारता देवों के समान. ऊर्जा भीतर एक ही है, दिशा भिन्न है, हर पल उसे दोनों में से चुनाव करने का अवसर मिलता है, यही तनाव उसे व्यथित किये रहता है, पशुता में उसका आकर्षण है क्योंकि वहाँ कोई जिम्मेदारी नहीं, देवत्व उसे चाहिए पर कीमत चुकाए बगैर, इसी कशमकश में मानव कहीं भी नहीं पहुंच पाता. नशा करके वह इस चुनाव से मुख मोड़ लेता है, यह नशा मादक द्रव्य का भी हो सकता है, धन, पद या यश का भी. वह अपनी एक मनमोहक छवि बना लेता है, और स्वयं ही धोखे में आ जाता है. इस पुल से निजात पाने का एक उपाय है, एक नई दिशा की तलाश, केवल मानव होने की आकांक्षा, जहां है वहीं रहकर स्वयं में टिक जाने का प्रयास, अपने भीतर जाने का प्रयत्न, तब चुनाव से परे होकर जीना होगा, जब जो मिले उसे सहज ही स्वीकारना, अमृत हो या विष दोनों को समता की भावना से ग्रहण करना. न कुछ पाने की चाह हो न कुछ त्यागने की, ऐसा मन ही परमात्मा की निकटता को अनुभव कर सकता है.