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Wednesday, April 18, 2018

जाना है उस पार सखी


१८ अप्रैल २०१८ 
जीवन एक नदी की धारा की तरह बहता जाता है. जिसके दो किनारे हैं, पहला है संसार और दूसरा है ईश्वर, अथवा पहला है शरीर और दूसरा है आत्मा. मन इन दोनों किनारों को जोड़ने वाला पुल है. मन यदि सदा संसार में ही उलझा है तो अशांत रहेगा. प्रकृति के विधान के द्वारा निद्रा में हम हर रात्रि दूसरे किनारे पर जाते हैं और सुबह जब उठते हैं तो उस की याद मन में रहती है, तभी भोर में मन शांत रहता है. संत का मन सदा ही दूसरे किनारे को स्पर्श करता रहता है सो मस्त रहता है. योग की साधना के द्वारा हम भी ऐसा कर सकते हैं कि नित्य उस पार जाकर वहाँ की शीतल हवाओं को भीतर समो लें और एक दिन ऐसा भी आये कि उन्हें जगत में बाँट भी दें.

Friday, May 2, 2014

ऊधो मन नाहीं दस बीस

जनवरी २००६ 
मन यदि एक बार ईश्वर को अर्पित कर दिया तो फिर लाख कोशिश करने पर भी वापस नहीं मिलता, बार-बार उसी की ओर लौटना चाहता है. मन आखिर क्या है क्या ? मन एक रास्ता है संसार से ईश्वर की ओर जाने का रास्ता ! यह एक पुल है बाहर से भीतर जाने का अथवा भीतर से बाहर आने का. मन सत्पथ है, प्रेम पथ है जो प्रभु के पास हमें ले जाता है ! मन यदि आत्मा से जुड़ा रहेगा तभी स्वस्थ रहेगा. मन जब आत्मा में विश्राम पाकर लौटता है तो सबल हो जाता है. आत्मा उसका घर है और संसार उसका कर्मक्षेत्र है. बुद्धि भी तभी प्रज्ञावान होती है, जब आत्मा से पोषित होती है. 

Tuesday, December 25, 2012

मानव होना सीखें हम


दिसंबर २००३ 
मानव एक पुल है, जिसके एक ओर पशुता है और दूसरी ओर देवत्व, चुनाव उसके हाथ में है, क्रोध, हिंसा उसे पशु के समान बनाते हैं, प्रेम, उदारता देवों के समान. ऊर्जा भीतर एक ही है, दिशा भिन्न है, हर पल उसे दोनों में से चुनाव करने का अवसर मिलता है, यही तनाव उसे व्यथित किये रहता है, पशुता में उसका आकर्षण है क्योंकि वहाँ कोई जिम्मेदारी नहीं, देवत्व उसे चाहिए पर कीमत चुकाए बगैर, इसी कशमकश में मानव कहीं भी नहीं पहुंच पाता. नशा करके वह इस चुनाव से मुख मोड़ लेता है, यह नशा मादक द्रव्य का भी हो सकता है, धन, पद या यश का भी. वह अपनी एक मनमोहक छवि बना लेता है, और स्वयं ही धोखे में आ जाता है. इस पुल से निजात पाने का एक उपाय है, एक नई दिशा की तलाश, केवल मानव होने की आकांक्षा, जहां है वहीं रहकर स्वयं में टिक जाने का प्रयास, अपने भीतर जाने का प्रयत्न, तब चुनाव से परे होकर जीना होगा, जब जो मिले उसे सहज ही स्वीकारना, अमृत हो या विष दोनों को समता की भावना से ग्रहण करना. न कुछ पाने की चाह हो न कुछ त्यागने की, ऐसा मन ही परमात्मा की निकटता को अनुभव कर सकता है.